218
Share




@dawriter

उम्मीदों की कश्ती-४

0 61       

अलख के साथ जब मैं घर पहुँचा तो कर्नल साहब और तृप्ति जी मुझे हैरानी से देख रही थीं। नाश्ते के बाद मैं जब निकलने को हुआ तो अलख ने आवाज़ दी- सुनो कल व्यस्त हो क्या? मैंने कहा अच्छा हुआ आज ही पूछ लिया, नहीं तो अपॉइंटमेंट लेना पड़ता।उसने अपने हाथ सामने की ओर बाँधते हुए मुझे घूरा। मैं कहने लगा- कल मैं देहरादून जा रहा हूँ, कुछ पार्सल आ रहे हैं मेरे।अलख ने मुस्कराते हुए कहा- कमाल है,मुझे भी देहरादून जाना है, श्याम सिंह बीमार है गाड़ी ड्राइव करनी पड़ेगी। मैंने कहा- आपको शायद पता नहीं, मैं किसी और की गाड़ी नहीं चलाता, आपको मेरी गाड़ी में चलना होगा। अलख ने कहा तो फिर सुबह 5 बजे निकलेंगे, 6 बजे तक जोशी मठ के गेट भी खुल जायेंगे।मैं जाने के लिए जैसे ही मुड़ा तो आवाज़ आई 'सुनो' मैं पलटा, तो कहने लगी धन्यवाद् कहना तो रह ही गया।मैंने कहा किस बात के लिए। अलख की आँखें भर आई थीं।मुस्कराते हुए अपने हाथ आगे बढ़ाते हुए उसने कहा- क्या हम दोस्त बन सकते हैं?

            मैंने उसके हाथ थाम लिए और कहने लगा- अब जब दोस्ती की है तो दोस्त की बातें भी माननी होंगी।वो मुस्करा रही थी और मैं जैसे ही चलने लगा तो उससे कहने लगा- वैसे जब तुम मुझे 'सुनो' कहती हो तो अच्छा लगता है,जानती हो हमारे देश में महिलाएं सुनो कहकर किसे संबोधित करती हैं। वो हैरानी से मुझे देख रही थी, मैं हँसते हुए कहने लगा- जिनके वो नाम नहीं ले सकती उन्हें। खिलखिला कर हँसते हुए उसने मुझे अपनी छतरी दिखाई।

                 सुबह मेरे लिए बहुत खूबसूरत थी मैं बेफिक्री से सो रहा था।5 बज चुके थे, अलख मेरे यूथ हॉस्टल में आ गयी। मेरे कमरे को खटखटाया उसने।मैं घोड़ा बेंच कर सो रहा था।उसने ज़रा सा धक्का दिया और दरवाज़ा खुल गया। सरकारी अनुदान के दरवाज़े ऐसे ही होते हैं। उसने पानी का जग उठाया और मुझ पर डाल दिया।मैं भूत भूत चिल्लाता उठा तो हँसने की आवाज़ सुन कहने लगा- ओह आप हैं मैडम।

         मैंने घड़ी देख कर उससे कहा बस दस मिनट और दे दो।मैं जब आया तो कहने लगी नहा तो लेते।मैंने हँसते हुए कहा- अगर हम लड़के रोज़ नहाने लग जायें तो एक कलंक होगा हमारे ऊपर,हम तो खास होते हैं न इसलिए ड्राई क्लीन होते हैं।पहाड़ियों से मैं भागते हुए उतरने लगा, अचानक अलख का ध्यान आया और मैं उसके साथ चलने लगा। वो संभाल कर धीरे-धीरे क़दमों को बढ़ाते हुए चल रही थी। नीचे गोविन्द घाट की पार्किंग से मैंने अपनी गाड़ी निकाली।

                 हम देहरादून के लिए चल दिए। रास्ता बहुत लम्बा था।अलख ने कार से जब मैगज़ीन उठाई तो मैंने अपना सर पकड़ लिया। उसने देखा तो कई सारी पुरानी मैगज़ीन थी जिसमें उसका इंटरव्यू छपा था, उसकी तस्वीर के साथ, उसने चुपचाप मैगज़ीन किनारे रख दी।मैंने उसकी ओर देखा और कहने लगा- अलख ये जो हमारे साथ-साथ नदी चल रही है इसका नाम तो जानती हो न तुम। अलख ने हँसते हुए कहा- हाँ अलखनंदा नदी है। मैंने उससे पूछा तुम्हारा और तुम्हारी बहन पद्मा का नाम कर्नल साहब ने नदियों के नाम पर क्यूँ रखा है? कभी पूछा नहीं तुमने।अलख ने मेरी ओर हैरानी से देखा।

            कुछ देर की गहरी ख़ामोशी के बाद मैं बोला- गौर से देखो अलख, नीचे बहते अपने वेग को।अलख, घाटी से नीचे बहते अलखनंदा के तीव्र वेग को देखने लगी।मैं कहने लगा- 'कोई भी सभ्यता नदियों के किनारे ही पनपती है और नष्ट हो जाती है। अपने इस तीव्र वेग को देखो अलख रस्ते में आते पहाड़ को काट कर भी रास्ता बना लेती है। कोई भी नदियों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा करता है तो तुम तो जानती हो कि ये नदियाँ जब विनाश पर उतरती हैं तो कितना कहर बरपाती हैं।तुम्हे भी खुद की क़ाबलियत को समझना होगा अलख। उस अलख को जिसे तुम एवरेस्ट की चोटी पर छोड़ आई हो उसे दोबारा वापस लाना होगा।'

         हैरानी से मेरी ओर देखते हुए बोली- कैसे? मैंने उससे कहा- पद्मा के साथ-साथ तुम जिस पार्सल के लिए आई हो वैसा ही एक पार्सल मैं भी लेने जा रहा हूँ।यू एस से आया है,साथ ही हैं कुछ लोग भी जो तुमसे मिलना चाहते हैं। अलखनंदा ने मेरी ओर देखकर बोला तो तुम वैज्ञानिक नहीं हो। मैंने कहा- वैज्ञानिक भी हूँ मैं, और यहाँ अपनी जड़ी बूटियों की खोज के साथ किसी और वजह से भी आया था।अलख ने कहा और वो वज़ह क्या है? मैंने घबराते हुए कहा तुम, तुम हो वो वजह अलख।

          उसने अपनी आँखें बंद कर ली और आँसू बहने लगे उसकी आँखों से। मैंने कार अलखनंदा के किनारे लगा दी। थोड़ी देर बाद बोली- आखिर तुम भी मेरे  लंगड़े पन का अहसास दिलाने,मुझे अपाहिज महसूस कराने के लिए आये हो। मैंने उसकी ओर देखा और गुस्से से बोला- मेरी आँखों में देखो अलख,क्या इतने दिनों में तुम्हें कभी ऐसा लगा कि मैं तुम्हें अपने से कम समझता हूँ, मैंने तुम्हें हमेशा अपने से ऊपर ही दर्ज़ा दिया है एक टांग न होंने पर भी तुम मेरे लिए बहुत ऊपर हो अलख।जानती हो तुम लड़कियों के साथ परेशानी क्या है 'जब कोई लड़का सीधे और तुमसे सच बात करे तो वो तुम्हें पसंद नहीं आते और जो झूठ को चाशनी में लपेटकर बतियाते हैं वो तुम लड़कियों को ज्यादा पसंद आते हैं।'अलख ने जैसे ही कहा- ऐसा नहीं है। मैं कहने लगा-'अच्छा,अगर ऐसा नहीं था तो तुम क्यों आई मोहित की बातों में, क्यों आज भी नफरत ही सही एक रिश्ता तो आज भी है तुम्हारा उसके साथ, उसे अपनी ज़िन्दगी में जगह दे रखी है तुमने, हमेशा के लिए ख़त्म क्यों नहीं कर देती इस किस्से को।'

              मैंने अलख की ओर गाड़ी की चाबियाँ बढ़ाते हुए कहा- मेरा सर दर्द हो रहा है गाड़ी चलाई अगर तो भिड़ा दूँगा, लो चलाओ कार। अलख ने मुझसे कहा मैं कैसे...तुम जानते हो न। मैंने कहा- तुमने खुद को बेचारी बना रखा है अलख और सोचती हो कोई तुम पर दया न करे। खुद जब बेचारी बनना बंद करोगी न, तब लोग भी भेद करना छोड़ देंगे। मैंने अलख को कार से उतर ड्राइविंग सीट पर आने को कहा और खुद उसकी जगह पर चला गया।उसने डगमगाते हुए कदम आगे बढ़ाये। मेरी ओर पलटी और कहने लगी- मुझसे नहीं होगा। मैंने आँखें दिखाई तो ड्राइविंग सीट पर आ गयी।

            ड्राइविंग सीट पर बैठकर एक पाँव अपना उसने ब्रेक पर रखा दूसरा पाँव वो एकसीलेटर पर रख भी देती तो कुछ नहीं कर पाती,मेरी ओर देखा उसने तो मैंने अपना दायाँ पैर एक्सीलेटर पर रख दिया और उससे कहा- अब कोशिश करो।मासूमियत से बोली-'अगर गाड़ी और हम दोनों नदी में गिर गए तो।'उसकी आँखों में देखकर मुस्कराते हुए  मैंने कहा-'समझ लूँगा कि अलखनंदा में डूब कर मर गया।' कुछ किलोमीटर गाड़ी चलाने के बाद उसके चेहरे और आँखों पर अलग ही ख़ुशी थी। मुस्कराते हुए मुझसे बोली- तुम्हें कितना और किन किन बातों के लिए धन्यवाद् दूँ मैं।

               मैंने कहा- उसकी ज़रुरत भी नहीं,तुम्हारे आँखों की ये जो मुस्कराहट है न बस इसे अब बनाये रखना। सारे रस्ते उसके चेहरे पर बच्चों वाली ख़ुशी दिखाई दी, शायद इतनी ही खुश हुई होगी, जब उसने पहली बार एवरेस्ट को पास से देखा होगा। मैं कहीं खो गया था। उसने कहा सुनो। तो मैं कहने लगा इसे ऐसे भी तो कह सकती थी न तुम, अजी सुनते हो। मेरी और देख कर बोली- अब तो पक्के में गाड़ी भिडाती हूँ कहीं मैं।

            देहरादून में मैंने मेरी कंपनी में काम कर रहे कुछ विदेशियों को उनके साथ लाए उपकरणों के साथ एक अलग गाड़ी में अपने पीछे होटल आने को कहा जहाँ पद्मा ठहरी थी।मैंने अलख के मोबाइल से पद्मा को कॉल कर होटल की लॉबी में आने को कहा। उसने मुझे उस वक़्त पागल ही समझा था पर जब उसने अलख को कार चलाते देखा तो उसकी आँखें भी छलक ही गयी थीं।भाग कर अलख को गले लगा लिया उसने। अपने साथ लाये एडवांस्ड लेग को डॉ की सहायता से पद्मा अलख के पुराने पैरों की जगह लगवा रही थी। डॉ से अलख ने कहा- अब इससे मैं सब कुछ कर सकती हूँ न पहाड़ों पर भी चढ़ सकती हूँ न। डॉ ने जैसे ही नहीं कहा, अलख का चेहरा ऐसे उतरा जैसे फिर किसी ने उससे उसके सपनों को छीनने की कोशिश की हो। अलख ने वो पैर निकाले और फेंकते हुए बोली- तब ले जाइये इन्हें,ये मेरे किसी काम के नहीं और होटल के अपने कमरे में चली गयी। पद्मा ने अलख के व्यव्हार के लिए डॉ से क्षमामाँगी और उन्हें चलता किया। वो भी अपने रूम पर चली गयी।

           थोड़ी देर बाद मैंने अलख और पद्मा को होटल के कांफ्रेंस रूम में आने को कहा।वहाँ कई सारे लोग मौज़ूद थे। मैं अपने बनाये एडवांस्ड लेग पर प्रेजेंटेशन दे रहा था। किस तरह मेरा बनाया पैर सेंसर की मदद से काम करेगा, मैं दिखा ही रहा था और पद्मा ध्यान से देख रही थी, सुन रही थी पर पता नहीं अलख को क्या हुआ वो अपने कमरे में चली गयी।मेरी नज़रें उस पर ही थी,जब वो चली गयी तो मैं समझ गया था कि मुझसे नाराज़ होकर गयी है। मैंने जब प्रेजेंटेशन ख़त्म किया तो सब मुझसे पूछने लगे कि इसका ब्रांड एम्बेस्स्डर कौन होगा। मैं पता नहीं किस धुन में था और बोल गया अलखनंदा जोशी। पद्मा ने हैरानी से मुझे देखा और वो उस आर्टिफीसियल लेग के बारे में और जानकारी ले रही थी मेरे असिस्टेंट से।

          मैं उसके रूम की ओर भागा।अलख तकिये में मुँह छुपा कर, फूट कर रो रही थी। मैंने उसके सर पर हाथ रखा तो पलटकर कहने लगी- चले जाओ यहाँ से आखिर तुम भी सबकी तरह ही निकले मेरे लंगड़ेपन का मज़ाक बना रहे थे न सबके सामने, झूठ कहा था न तुमने कि तुम जड़ी बूटी की खोज में आये थे,तुम मुझ लंगड़ी की खोज में आये थे यहाँ।मैं सबसे दूर आकर यहाँ इसलिए बस गयी कि कोई कभी न जान सके कि मैं कहाँ हूँ? मैं पूरी दुनिया को अपना लंगड़ापन नहीं दिखाना चाहती। पूरी रिसर्च कर रखी है तुमने मेरे ऊपर, अब समझ आया मुझे, तुम मेरे ज़रिये अपनी इस खोज को बेचना चाहते हो।मेरा लंगड़ापन बेचने में तुम्हारा स्वार्थ है।आखिर तुम भी सबकी तरह ही निकले और निकलोगे भी क्यूँ नहीं...आखिरल तुम्हारा नाम भी तो मोहित है न...

 

जैसे ही अलख ने मोहित नाम की उलाहना दी मेरे कलेजे पर साँप लोट गया था। मैं गुस्से से चीख पड़ा- मोहित... मोहित... मोहित... पिछले चार सालों से भाग रहा हूँ मैं इस नाम से, जितनी नफरत तुम्हें उस मोहित से है,उससे कहीं ज्यादा नफरत मुझे इस मोहित नाम से है।

           अलख ने हैरानी से मुझे देखा, पद्मा कमरे के दरवाज़े पर आकर रुक गयी और मेरी बातें सुनने लगी। मैं अलखनंदा से कहने लगा- कॉलेज के बाद मुझे यू एस की फर्म ने एस अ रिसर्च असिस्टेंट अपोइंट किया था मैं यू एस में था जब तुम्हारे साथ वो हादसा हुआ था।जब मैं वापस लौटा तो तुम्हारे साथ हुए हादसे का मुझे पता चला।तुम अपना सब कुछ छोड़कर कहाँ गयी कोई नहीं जानता था।मैं निराश हो गया था, एक बार तुमसे मिलने की ख्वाहिश थी।मैं तुम्हें हताश और निराश होते नहीं देखना चाहता था। पता नहीं क्यूँ तुमसे बहुत दूर होकर भी तुम्हारे दर्द का अहसास था मुझे।मैंने जो ये पैर बनाये हैं वो सिर्फ तुम्हारी वज़ह से बनाये हैं अलख।मेरे कॉलेज में मेरे साथ पढने वाला हर व्यक्ति तुम्हें जानता है अलख।लोग फिल्मों में दिखाए जाने वाले हीरो और हीरोइन को फॉलो करते हैं, उनके पोस्टर दीवारों पर लगाते हैं पर हॉस्टल के मेरे कमरे की दीवार में तुम्हारी तस्वीर थी अलख। तुम मेरे लिए हीरो थी। तुम्हें तो याद भी नहीं होगा पर सात साल पहले एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए जो दो समूह गए थे।एक में तुम थी और दुसरे में मैं था। बर्फीले तूफ़ान की वज़ह से हमारे समूह को खाली हाथ लौटना पड़ा था पर तुम अपने समूह को ऊपर तक लेकर गयी थी अलख।जिस लड़की ने बड़े-बड़े तूफानों का सामना किया हो उसके लिए ये सब कुछ भी नहीं है एक बार देखो तो सही,मैंने तुम्हारे लिए बनाया क्या है?

              अलख ने धीरे से अपने कदम मेरी ओर बढ़ाये। मैं उसके सामने,भरी आँखों से मुस्कराहट के साथ अपनी खोज को रख रहा था।अब बड़ी ही उत्सुकता और अचरज से वो मेरी खोज को देख रही थी क्यूंकि अभी तक वो जैसे पैर पहन कर चलती थी ये उसकी तुलना में हलके लग रहे थे। मैंने उससे कहा अब इजाज़त है मुझे तुम्हें इसे पहनाने की।अलख की आँखों से आँसू छलक पड़े, उससे बोला नहीं जा रहा था, बस हाँ में सर हिला दिया उसने।

          मैं अपने उपकरणों की मदद से उसके पैर सही से लगाने लगा। उसके बाद मैंने उससे कहा- जानी अब अपने खूबसूरत पैरों को ज़मीन पर तो रख कर देखिये।ख़ुशी से मेरे गाल खींच दिए उसने और जब खड़ी हुई तो मैं उसे सेंसर के इस्तेमाल का तरीका समझा रहा था। अलख ने पद्मा से कहा- मुझे तो ये मेरे असली पैरों की तरह ही लग रहे हैं। ख़ुशी से गोल-गोल चक्कर काट रही थी,पूरे कमरे में तेज़ क़दमों के साथ चल रही थी ठीक वैसे ही,जैसे बच्चा पहली बार चलना सीखता है,तब सारा दिन चलता ही जाता है। पद्मा की आँखों में भी ख़ुशी के आँसू थे।

              अलख ने मुझसे कहा- इसकी कीमत क्या है? मैं कहने लगा तुम्हें इसकी कोई कीमत नहीं देनी होगी बल्कि इसके साथ तुम्हें एक चेक भी मिलेगा, इसकी ब्रांड एम्बेसडर बनने के लिए। अलख ने मेरी ओर देखकर कहा- पर मैं ही क्यूँ? मैंने उससे नज़रें चुराते हुए कहा- अभी इसका एक परीक्षण बाकी है।पद्मा ने हैरानी से कहा- कैसा परीक्षण?

                मैंने कहा अलख को इसे पहनकर एक बार फिर एवरेस्ट पर चढ़ना होगा।पद्मा ताली पीटते हुए बोली- तुमने मेरी बहन को चूहा समझा है क्या, जिस तरह चूहे पर दवाओं का परीक्षण होता है तुम मेरी बहन पर अपनी बनाई खोज का परीक्षण करना चाहते हो। मेरी बहन एक बार मौत केमुँह से वापस आई है, अब दोबारा वो तमाशा मैं नहीं चाहती,आप जा सकते हैं, कहकर उसने मुझे कमरे से बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया।

      मैं अलख से जाते-जाते कहने लगा- अलख मैं तुम्हारे उस सपने को पूरा करने आया हूँ, जिसे तुम कश्तियों में लिख कर बहाती हो। मुझे तुम्हारे उन पहाड़ों झरनों ने भेजा है अलख,अब फैसला तुम्हें करना है कि तुम ज़िन्दगी भर लोगों का सहारा पाना चाहती हो या अपने सपने पूरा करने के लिए मेरा साथ।

          पद्मा ने धक्के देकर मुझे कमरे से निकल दिया और गुस्से से दरवाज़ा बंद कर दिया।सारी रात मुझे नींद नहीं आई। अलख क्या फैसला लेगी यही सोचकर। सुबह जब मैं जागा और अलख के कमरे की ओर गया तो वो दोनों जा चुके थे।मेरे लिए मेरी बनायीं खोज का एक पार्सल रिसेप्शन में छोड़कर...

         एक बार फिर मेरे सपने धराशायी हो गए थे और इस बार उनके टूटने की वज़ह थी अलख।मैंने भी अपने मन में ठान लिया था कि अलख और उसके सपनों के बीच किसी को नहीं आने दूँगा।अपनी गाडी उठाई और चल पड़ा मैं।देव प्रयाग के आगे जैसे ही पहुँचा तो अलख और पद्मा गाडी के बाहर थे उनकी कार के टायर पंचर हो गए थे।मैंने उनकी ओर देख कर कहा- कार में बैठ जाओ फौजियों। पद्मा ने मुँह फेर लिया।मैं अपनी गाडी से उतर पद्मा से कहने लगा- इस तरह रोड में खड़े होकर इंतज़ार करने में तुम्हारी बहन को परेशानी हो रही है, ये नहीं दिख रहा तुम्हें। कुछ देर मेरे गाड़ी के हॉर्न बजाने पर दोनों आ गयीं।

              अलखनंदा को पीछे बिठाकर पद्मा आगे आ गयी। मैं भी चुपचाप कार चला रहा था हम तीनों के बीच शीत युद्ध की तरह हालात थे। मैंने गाड़ी में गाने चला दिए।मैं जब आगे गाने बढाने लगा तो आवाज़ आई 'सुनो' चलने दो मेहँदी हसन साहब पसंद हैं मुझे-

मैंने भी चलने दिया। कार में हमारी ख़ामोशी के बीच मेहँदी हसन साहेब गा रहे थे-

रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामाँ हो गए, पहले जाँ फिर जानेजां, फिर जानेजाना हो गये।

      मैं गाड़ी के मिरर में अलख की आँखों को देख रहा था और उन आँखों में मुझे उसके सपने तैरते दिखाई दे रहे थे।अलख गाड़ी के नीचे बहती अलखनंदा के तेज़ बहाव को देख रही थी और शायद उसे मेरी कही हुई बातें भी याद आ रही थीं। तभी अचानक से पद्मा ने मुझसे कहा- वैसे तुम्हारा नाम क्या है?

    मैंने उसकी ओर देखकर कहा छोडिये न नाम वाम वैसे भी शेक्सपियर ने कहा है न कि नाम में क्या रखा है।आपके पहाड़ों में लोग मुझे 'सुनो' के नाम से जानते हैं। अचानक से अलख हँस पड़ी। मैंने पीछे मुड़ते हुए कहा- क्यूँ जी ठीक कहा न मैंने।पद्मा चिढ़ गयी थी और अलख के चेहरे पर 360 डिग्री वाली स्माइल फ़ैल गयी थी।

         गोविन्दघाट की पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर हम ऊपर पहाड़ों की ओर बढ़ गए कर्नल साहब के भेजे लोगों ने सामान उठा लिया। पद्मा, अलख का हाथ पकड़कर चल रही थी पर तीन बार नकली पैर बदलने से अलख को दर्द और चलने में परेशानी हो रही थी। मैंने अलख को अपने कन्धों का सहारा दिया और मैं और पद्मा उसे ऊपर तक ले आये। उसे घर छोड़ने के बाद मैं जब अपने हॉस्टल की ओर जाने लगा- तो आवाज़ आई 'सुनो' मैं अब दोबारा कभी एवरेस्ट पर नहीं चढ़ पाऊँगी तुम किसी और को अपना ब्रांड एम्बेसडर बना लो। मैंने उसकी ओर बिना देखे कहा- वो तो तुम ही बनोगी अलख और चढ़ोगी भी अपने सपनों की सीढ़ियों को।

क्रमशः

उम्मीदों की कश्ती- १
उम्मीदों की कश्ती-२

उम्मीदों की कश्ती-३

उम्मीदों की कश्ती-५

अभिधा शर्मा।।



Vote Add to library

COMMENT