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@dawriter

उम्मीदों की कश्ती-३

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अलखनंदा ने मेरी ओर देख कर कहा अगर सब बता दूँगी तो शायद मेरे हौसले कमज़ोर पड़ जायें क्यूंकि मेरा मानना है कि किसी भी सोच को बार-बार अगर सबके सामने ज़ाहिर करो तो आपके कार्य का वज़न कम हो जाता है। मैंने उसकी ओर देख अभी ताली पीटी ही थी कि कहने लगी- 'तुम्हारे पास लैपटॉप है क्या'? मुझे थोडा सा काम करना था, मेरा लैपटॉप मैं तोड़ चुकी हूँ और सिस्टम सही से चल नहीं रहा। मैंने उसकी ओर देखा और कहने लगा- है मेरे पास लैपटॉप और आप इस्तेमाल भी कर सकती हैं पर उसका चार्ज लगेगा। अलख ने कहा- कैसा चार्ज? मैंने कहा-आपको वादा करना होगा कि मुझे दि अलखनंदा जोशी की पूरी कहानी सुनाएंगी।

            उदासी भरे लहजे में बोली- क्या करोगे जानकार? मैंने कहा- मोहित वाला हिस्सा आप मुझे न भी बताएँ तो चलेगा पर मुझे आपकी एवरेस्ट फतह करने की कहानी सुननी है। मैं आपकी ज़िन्दगी का दर्द नहीं, वह लम्हा जानना चाहता हूँ जिसे याद कर आपकी आँखों में ख़ुशी आ जाती हो।मेरी ओर देख कर बोली पहले मैं अपना काम कर लूँ।

               मैं उसे लेकर यूथ हॉस्टल आ गया। मेरे कमरे को चारों ओर घूरा उसने। बुझी हुई सिगरेट के कई टुकड़े अलग-अलग जगह पर बिखरे थे।उन्हें देखती हुई बोली-ये फूँकनी बहुत नुकसानदायक होती है और आप तो वैज्ञानिक हैं। मैंने सर खुजाते हुए बस इतना ही कहा जानता हूँ पर बहुत सारी समस्याएं ऐसी होती हैं जिनका हल सिगरेट का कश लेकर उसका छल्ला बनाकर उड़ाने में ही मिलता है।तुम सब लड़के एक जैसे ही होते हो उसने जैसे ही कहा,तो मैं कहने लगा- हाँ पर तुम्हें देख मैं ये नहीं कह सकता कि सारी लड़कियां एक जैसी होती हैं।

             उसने लैपटॉप ऑन किया, नेट कनेक्ट कर किसी से अपने एडवांस्ड आर्टिफीसियल लेग पर डिस्कशन के बाद उसने अपनी बहन पद्मा को कॉल कर उसे ऑर्डर कलेक्ट कर अपने साथ लाने को कहा। मैं खिड़की के बाहर से ही बिलकुल किसी सीक्रेट एजेंट की तरह उसकी बातें सुन रहा था। उसने लैपटॉप पर कुछ फॉर्म फिल किये उसके बाद मुझे धन्यवाद् देकर जाने लगी तो मैं गाना गाने लगा- 'क्या हुआ तेरा वादा'।

              मुस्कराते हुए कहगई- कल सुबहझरने के पास आना, मिलवाती हूँ तुम्हें तुम्हारी दि अलखनंदा जोशी से।वह जब घर जाने लगी तो मैंने कहा- मैं तुम्हें घर तक छोड़ दूँ।वह कहने लगी- मुझे किसी सहारे की ज़रुरत नहीं है, मैं अकेले अपने घर जा सकती हूँ। मैं अपना कमरा बंद करते हुए कहने लगा- ओह हेल्लो मैडम, ग़लतफ़हमी में मत रहना कि मैं आपको सहारा दे रहा हूँ, मैं तो बस टहलने जा रहा था तो सोचा आपका साथ देता चलूँ,आपको भी थोड़ी देर के लिए इस बक-बक करने वाले इंसान का साथ मिल जायेगा।

       उसने कुछ नहीं कहा,चुपचाप चलने लगी। कुछ पल की ख़ामोशी के बाद बोली। जब मैं छोटी थी तो पापा गोरखा रेजिमेन्ट में असम में पोस्टेड थे। हिमालय की चोटियाँ बचपन से मुझे आकर्षित करती थी, ऐसा लगता था जैसे की वो चोटियाँ किसी चुम्बक का उत्तरी सिरा हों और मैं दक्षिणी सिरा। पढाई में कभी मन ही नहीं लगा, बस मौका मिलते ही घर से फुर्र हो जाती, कभी किसी चोटी पर बैठे मिलती तो कभी कहीं झरने के नीचे अपनी कॉपी किताबों की कश्तियाँ बनाकर उन्हें बहता देखती।पापा फौजी थे, इसलिए मुझे सजा भी उनके किसी रिक्रूट की तरह ही मिलती। एक दिन पापा ने मुझे बिठा कर पूछा आखिर तुम क्या करना चाहती हो?पढना लिखना है नहीं,कैसे काम चलेगा? मैंने डरते हुए कहा- मैं एवरेस्ट पर चढ़ना चाहती हूँ। उस वक़्त मेरी आँखों में पापा ने एक अजीब सी चमक देखी थी। उन्होंने मुझसे एक वादा लिया- ठीक है तुम किसी तरह अपनी पढाई भी पूरी करो साथ में मैं तुम्हें ट्रेनिंग भी दिलवाऊंगा।

 मैंने अपने रूम पर तेनजिंग शेरपा,बछेंद्री पाल, संतोष यादव जैसे कई सारे एवरेस्ट पर चढ़ने वाले और जीत हासिल करने वालों की तसवीरें लगायी थी। पापा समझ गए थे कि ये मेरा जुनून है।मेरी ट्रेनिंग की कमान पापा ने शेरपाओं और गोरखाओं को दे दी।पहले छोटे-छोटे पॉइंट्स पर जीत हासिल करना सिखाया उन्होंने। जब भी किसी पॉइंट पर सबसे पहले पहुँचती झंडा गाड़ देती। वहां खड़े होकर एवरेस्ट की ऊंचाइयों को देखती कि मंजिल अभी कितना दूर है, वहीँ दूर से एवरेस्ट को सलाम करते हुए कहती- बस कुछ दिन का इंतज़ार, एक दिन वहाँ भी झंडे गाड़ दूंगी।

                जब पहली बार एवरेस्ट के दल में शामिल होकर चढ़ाई शरू की मन में उत्साह था और पेट में तितलियाँ मचल उठी थीं कि अपना सपना जीने जा रही हूँ मैं। रोज़ सुबह दूरबीन से जब उस ऊँचे शिखर को देखती तो मन में सोचती थी कि एक दिन मैं भीवहाँपहुँचूँगी जहाँ पहुँचने के लिए सूर्य की रश्मियाँ भी लालायित होती हैं। कई दिन की ट्रेकिंग के बाद, कई सारे पड़ाव पार करने के बाद, मैगी के सहारे दिन गुज़ारते, माइनस डिग्री में रातें बिताते, कई बार बर्फीले तूफ़ान को झेलते, आखिर हम कुछ कदम दूर थे अपनी मंजिल से। सबके चेहरे पे ख़ुशी के साथ अजीब सा उतावलापन देखा था शिखर पर पहुँचने का। उस वक़्त पता नहीं था कि शिखर पर पहले पहुँचने वाले को दुनिया सलाम करती है।मुझे बच्ची समझ सबने किनारे कर दिया और मैं पागल सबकी तसवीरें कैद करती रह गयी। सबसे आखरी में चोटी पर पहुंची।

             जब अपनी पहली जीत की कहानी सुना रही थी अलख तो उसके आँखों में वही जीत की ख़ुशी और होंठों पर पहली बार ऐसी मुस्कराहट देखी थी जैसी मुस्कराहट सोते समय बच्चे नींद में लेते हैं। अलख भी नींद में ही थी शायद... और इस नींद में वो कई सालों बाद गयी थी। मैंने जैसे कहा- आगे क्या? तो कहने लगी आगे मेरा घर आ गया। मैंने कहा तुम ऐसे नहीं जा सकती मुझे सुनना है। मैं आज उससे किसी बच्चे की तरह ज़िद कर रहा था। उसने हल्की मुस्कराहट के साथ कहा- कर्नल साहब की बन्दूक नहीं देखी तुमने अभी, तुम पर तान दी अगर उन्होंने तो भागते नज़र आओगे। मैंने जैसे ही कहा पर आगे तो कहने लगी आगे कल...

 मैं इंतज़ार करूँगा कहकर मैं जैसे ही पलटा। उसकी आवाज़ आई सुनो... तुम उतने भी बुरे इंसान नहीं हो जितना मैंने तुम्हें समझा था... बस एक ही बुराई है तुममें... तुम्हारा नाम मोहित क्यों है?

वह चली गई और उसके इस सवाल ने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया। मेरा नाम मोहित क्यों है? मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था अपने माँ पापा पर यही नाम मिला था उनको रखने को जो सवाल मैं हमेशा अपने आप से करता था आज अलख ने भी कर दिया। क्यूँ है मेरा नाम मोहित, जब मुझे भी अलख ही की तरह  नफरत है इस नाम से।

सुबह आज मैं बहुत देर तक सजता रहा, वैसे लड़के सजते सँवरते नहीं पर मैं आज रोज़ की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही वक़्त लगा रहा था। झरने के पास जैसे ही पहुंचा तो देखा अलखनंदा पहाड़ी से उगते सूरज को और चारों और फैलती रक्तिम रश्मियों को अपने अन्दर समेट लेने के लिए अपने दोनों हाथ फैलाकर मुस्कराते हुए देखे जा रही थी। इतना खूबसूरत नज़ारा शायद मैंने कभी नहीं देखा था। चट्टान की ओट में छुपकर, मैं उसे और इस लम्हे को अपने कैमरे में कैद कर रहा था।

        मैं जैसे ही उसके पास पहुँचा तो कहने लगी- बहुत देर कर दी मेहरबान आते-आते। मैंने कहा- क्या बात है? आज मेरा इंतज़ार पहली बार किसी को बेसबरी से करता देख अच्छा लग रहा था तो उसे रुक कर देखने लगा।वह आश्चर्य से बोली- क्यूँ तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है।मैंने मुँह घुमाते हुए कहा नहीं।वह कहने लगी- कमाल है पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है। मैंने तुनकते हुए कहा- ज्यादा जले पर नमक मत छिड़को, अपनी सुनाओ।

 गहरी साँस लेते हुए बोली- पहली बार एवरेस्ट जीत कर जब लौटी, पापा मुझे पूरी रेजिमेंट में गोद पर उठा कर घूमे थे। जितना गर्व कोई अपने बेटे पर नहीं करता, उससे कहीं ज्यादा गर्व मैं अपने पापा की आँखों में अपनी उपलब्धियों के लिए देखती थी। कॉलेज पूरा किया 3 से 4 बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की, हर बार तीसरे या दुसरे नंबर पर आकर रुक जाती।मुझे इंस्टिट्यूट में हेड अपोइंट कर लिया गया। अब मैं लोगों को एवरेस्ट पर चढ़ने की ट्रेनिंग देने लग गयी थी।

      बहुत अच्छे से याद है,नेशनल डिसास्टर मैनेजमेंट के कुछ स्टूडेंट्स जो मेरे अंडर ट्रेनिंग के लिए आये थे, उनमें से एक था मोहित। मैंने उसके चेहरे की ओर देखा तो अपनी आँखें बंद कर ली थीं उसने और मुझसे कहने लगी- कभी कोई दोस्त नहीं थे मेरे पर पता नहीं कैसे उससे दोस्ती हो गयी थी। कई बार घर भी आता, मेरे घरवालों से लेकर इंस्टिट्यूट तक  में सबसे घुल-मिल गया था। मेरे साथ पहाड़ों की सैर पर जाता कई बार मेरे साथ झरनों पर कश्तियाँ बहाता। एक दिन अचानक उसने मुझसे कहा--

       होंठों का तकल्लुफ रहने दो बस आँखों से ही बात  करो।

मैं कल भी तुम्ही पे मरता था तुम आज तो ये इकरार करो।।

इजहार-ए-मोहब्बत की अपनी हम क्या सुनाएं दास्ताँ।

एक टूटा दिल डूबी कश्ती वीरां बस्ती और मुर्दा ज़हान।।

कुछ तुम भी अपनी बात करो कुछ तुम भी अपना हाल कहो।

यूँ बुत बनकर क्यूँ बैठी हो तुम आज तो ये इकरार करो।

               इसके आगे की लाइन्स वो भूल गया था और कहने लगा ये तुम्हें देखकर ही लिखा था किसी मोहित ने। मैं आश्चर्य से अलखनंदा को देख रहा थाऔर अपने होंठों पर आई मुस्कराहट को किसी तरह रोक लिया मैंने। अलख ने कहा- ये सब,कभी किसी ने नहीं कहा था मुझसे।कर्नल की बेटी हूँ,इसलिए भी लोग डरते थे शायद... मोहित की बातें पता नहीं कब अच्छी लगने लगीं। फिर एक दिन मोहित ने कहा- मेरा रिश्ता घरवालों ने ज़बरदस्ती तय कर दिया है। मुझे थोडा बुरा लगा,मैंने उसके साथ थोड़ी दूरियाँ बढ़ा ली थीं क्यूंकि किसी का रिश्ता टूटे मेरी वज़ह से मैं ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी।

           मोहित को मेरा इस तरह का व्यवहार अच्छा नहीं लगा।वह भरी बारिश में भीगते घर आया, पापा से बात की, पता नहीं उसने कैसे पापा को मना लिया।मोहित के घरवालों ने मिलकर उसका रिश्ता मेरे साथ तय कर दिया था, हमारी सगाई हो गयी थी।उससे पहले मैं एक बार एवरेस्ट पर जीत हासिल करना चाहती थी। मोहित ने भी उत्सुकता दिखाई चढ़ाई को लेकर। अपने साथ 25 लोगों का दल लेकर मैं चल पड़ी,अपने सबसे बड़े सपने को जीने।मोहित साथ था इसलिए मेरे लिए इस बार की जीत बहुत ज़रूरी थी। कई सारे पड़ाव पार करने के बाद महज़ 60 फ़िट दूर थी एवरेस्ट की चोटी। मेरा सपना मेरे सामने था पर अभी उसे पूरा होने में बहुत वक़्त था।अँधेरा हो गया था, हमने वहीँ अपने टेंट लगा लिए।सारी रात मैं अपने टेंट सेझाँककर सुबह होने का इंतज़ार करती रही पर सुबह तो जैसे मुझसे रूठ गयी थी, अचानक ऊपर से एक एवेलौंच आया बाकी के सब टेंट में थे, मैं दूसरी ओर थी, मैं चीख पड़ी जब तक सब बाहर आते वो एवेलौंच अपने साथ मुझे और मेरे सपनों को बहुत दूर लपेटे ले गया।किसी तरह हिम्मत कर एक मज़बूत चट्टान पकड़ ली मैंने। मैं उसके सहारे टिक गयी। सबको लगा वो एवेलौंच मुझे अपने साथ ले गया। मेरी खोज की सबने, मैं किसी को नज़र नहीं आई।जब कुछ शेरपा मेरी तलाश में रुके तो मोहित ने कहा पहले ये 60 फिट की दूरी तय कर लें, फिर आराम से खोजेंगे अलखनंदा मैडम को। कुछ शेरपा मुझे ढूँढते हुए,मुझ तक जब पहुँचे तो बहुत गहरा ज़ख्म था मेरे बाएँ पैर पर।वो जानते थे कुछ पल की देरी भी मेरे लिए खतरनाक हो सकती थी। मेरे शरीर में इन्फेक्शन न फैले उन्होंने अल्कोहल पैरों पर डाल दी और जल्द से जल्द मुझे बेस कैंप लाया गया। घर पर सूचित कर तुरंत मुझे कोलकाता के लिए वाया फ्लाइट भेज दिया गया। इधर मोहित सबसे पहले एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचकर फोटो सेशन करवा रहा था। नीचे लौटने पर उसे मेरे बारे में पता चला। सब लोग मुझसे मिलने आए पर मोहित नहीं आया।महीनो मैं हॉस्पिटल में रही पर उसका कोई कॉल भी नहीं आया। जिस दिन मुझे डिस्चार्ज किया जा रहा था उस दिन उसका कॉल आया कि मुझे हावड़ा स्टेशन पर मिलेगा वो।

           मैं उसका इंतज़ार करती रही। वो आया, मैंने उसे एवरेस्ट पर जीत हासिल करने की बधाई दी तो मुस्कराया वो और कहने लगा- अभी तो बहुत सारी बधाइयाँ देनी होंगी तुम्हें मुझे। मैंने हैरानी से देखा तो कहने लगा- इन पेपर्स पर तुम्हारे दस्तख़त चाहिए। मैंने गौर से देखा तो मेरे ही इंस्टिट्यूट के पेपर थे, उसे मेरी जगह नौकरी पर रख लिया गया था। उसे हमेशा से मेरी नौकरी पसंद थी और आखिर उसने उसे मुझसे छीन ही लिया,ठीक मेरे सपनों की तरह।मैंने चुपचाप साइन कर दिया। अपनी भरभराती आवाज़ को सँभालते हुए मैंने कहा- और भी कुछ लाए हो जिसे बदलने के लिए मेरे दस्तख़त चाहिए तुम्हें। अपनी जेब में हाथ डालकर उसने सगाई की अँगूठी वापस कर दी थी। जाते जाते कह गया कि उसकी माँ को लगता है कि 'रिश्ता बराबरी में हो तभी निभता है'।उस हादसे के बाद मैं और मोहित बराबर नहीं रह गए थे।मुझसे शादी कर मैं एक बोझ ही होती उस पर और अभी वो ऐसे किसी बोझ के लिए तैयार नहीं था। उसे अभी अपना कैरियर बनाना था। मैं उसे देखती रही और वह चला गया मेरे सपने,मेरे ओहदे सब कुछ मुझसे छीनकर।

            हर कोई स्टेशन पर मुझे दया की नज़रों से देख रहा था। पापा ने मुझे जब ट्रेन पर बिठाया तो बस एक ही शब्द कहा मैंने- अब वापस नहीं जाना पापा, कहीं दूर ले चलो, जहाँ से ये एवरेस्ट की चोटियाँ कभी दिखाई न दें।उसका गला भर आया था और मेरी आँखें। अपनी आँखों के कोरों को पोंछते हुए एक मुस्कराहट के साथ मैंने कहा 'दि अलखनंदा जोशी' तुम्हारे लिए एक सलूट तो बनता है बॉस।मैं उसे सलामी दे रहा था और उसकी आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

         कुछ देर बाद अपने हाथों से उसके आँसू पोंछे मैंने और कहने लगा- मैं इस रोतली अलखनंदा को नहीं जानता और सच कहूँ जानना भी नहीं चाहता। एक काम करें फिर से शुरू करते हैं। उसने हैरानी से मेरी ओर देखा तो मैं कहने लगा उस कमीने मोहित ने बहुत मज़े कर लिए अब हम उसे बताते हैं कि असली जीत क्या होती है। अलख ने कहा- अच्छा कैसे?

         मैं कहने लगा अपने इरादे किसी के सामने रखो तो उनका वज़न कम हो जाता है तुम कुछ दिन इंतज़ार करो, फिर मैं बताता हूँ।मैं हॉस्टल की ओर जाने लगा तो अलखनंदा ने कहा- घर चलो, मम्मी चाय अच्छी बनाती हैं और साथ ही पकोड़े भी। मैं उसके साथ साथ चलते चलते गाना गुनगुना रहा था- 'शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पर बुलाया है'।वो खिलखिलाती हुई अपनी छतरी से मुझे गोंचते हुए अपने घर ले जा रही थी।

क्रमशः

उम्मीदों की कश्ती-४
उम्मीदों की कश्ती-२
उम्मीदों की कश्ती- १

                                          अभिधा शर्मा।।



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