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@dawriter

उम्मीदों की कश्ती-२

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abhidha by  
abhidha

 

 

यूथ हॉस्टल पहुँचकर जूता एक तरफ फेंक केयर टेकर को आवाज़ दी- काका खाने में क्या है? वो बोला- साब,आज तो जीरा आलू, रोटी और दाल तड़का ही है। मैंने कहा-  सब चलेगा ले आओ। खाने के बाद बड़ी ही नज़ाकत से मैं उस कश्ती की एक-एक परत खोल रहा था।पूरा कागज़ जब खुला तो मैंने पाया उसमें एक ख़त था-

    प्रिय,

        मोहित,

           तुम्हारा यूँ चले जाना मेरे मन में कई सवाल छोड़ गया है। लोगों की नज़रें जब मुझ पर दया की तरह पड़ती हैं न तो नफ़रत होती है मुझे अपने आप से।सुनो ये जो बारिश है न बिल्कुल तुम्हारी तरह ही है।पहले तो आती नहीं और जब आती है तो वैसे ही तबाही मचा जाती है जैसे उस रात स्टेशन पर तुमने मचाई थी। कितनी आसानी से ये कहकर चले गए थे तुम कि अब यही मुनासिब है कि हम भूल जायें जो कुछ भी बीता हमारे बीच।मैं पहरों तुम्हारा इंतज़ार करती रही और तुम आए तो बरसाती बादल की तरह गरजते हुए, जमकर बरसे और कुछ ही देर में अपनी कार में बैठ फुर्र... एक बार भी नहीं सोचा तुमने कि स्टेशन में खड़ा हर शख्स मुझे किस तरह देख रहा था। कोनो सेझाँकते लोगहँस रहे थे हमारे ऊपर। हमारे नहीं... मेरे ऊपर...तुम्हारा क्या था... तुम तो चले गए थे, ट्रेन का इंतज़ार तो मैं कर रही थी उन लोगों के बीच घिरी।एक ही झटके में रिश्तों का मतलब समझा दिया था तुमने, आँखों से ग़लतफ़हमी का चश्मा अब उतार फेंका है मैंने। अब नहीं फटकने देती इश्क़, मोहब्बत जैसी किसी गर्द को मैं अपने आस-पास और जब भी ये गुमान होता है तो याद कर लेती हूँ उस बारिश को और न चाहते हुए भी याद आ जाते हो तुम, मेरे ख्यालों में उसी बरसाती बादल की तरह।तुम्हें तो अहसास भी नहीं होगा कभी... कितना कुछ तोड़ गए थे तुम उस रात को...बस... नहीं तोड़ पाए थे तो मेरे स्वाभिमान और मेरे आत्म सम्मान को।कहते हैं न मोहब्बत और ज़ंग में सब कुछ जायज़ है तो जो तुम नहीं तोड़ पाए वो तुम पे एक दिन बहुत भारी पड़ने वाला है, आखिर हो तो एक बरसाती बादल ही न, जिस दिन मैं सूरज की तरह बन गयी उस दिन तुम भी बादल की तरह ही भटकते नज़र आओगे।

           एक बार तुमसे मिलने की ख्वाहिश है, जो कुछ भी हमारे बीच अधूरा रह गया था उस दिन उसे ही मेरी अंतिम ख्वाहिश समझ पूरा करने के लिए कहीं से आ जाओ तुम।।

  नचाहते हुए भी लिखना पड़ेगा।

 तुम्हारी

अलखनंदा।।

      ख़त पढने के बाद ये लड़की मुझे और दिलचस्प लगने लगी,मेरा खोजी मन इसके बारे में बड़ी उत्सुकता से सब कुछ जान लेना चाहता था। पता नहीं क्यूँ मन में ख़त की पहली लाइन ही चल रही थी- प्रिय मोहित,मोहित... मोहित... मोहित... कितना दर्द दिया है इस नाम ने उसे, साथ ही ये नाम मेरे लिए भी एक दर्द से कम नहीं था। मेरी ज़िन्दगी में सबसे बड़ी दुखती रग़ थी मेरी और मोहित की दोस्ती। मेरा सबसे अच्छा दोस्त, जिससे मैं सबसे ज्यादा मोहब्बत करता था और आज भी करता हूँ पर जितनी मुझे उससे मोहब्बत है उतनी ही उसकी हरकतों से नफरत भी।उसे मैं जितना भूलना चाहता हूँ उतना ही हर मोड़ पर वो याद आ ही जाता है।जब कोई पूछता है मुझसे कि मेरा नाम क्या है-जैसे ही मैं कहता हूँ मोहित... तो सामने वाला जब आगे नाम पूछता है तो मोहित का वो गाना याद आ जाता है  " कर दे मुश्किल जीना मोहित कमीना"।

 मैं और मेरा परम मित्र मोहित, हम दोनों के नाम एक ही थे, बस सरनेम का अंतर था, मैं मोहित तिवारी तो वो मोहित त्रिपाठी। हम स्कूल से लेकर कॉलेज तक साथ ही पढ़े।एक ही बेंच पर बैठते और परीक्षा हॉल में भी आगे-पीछे। अलजेब्रा मैं पढ़ कर जाता तो जामेट्री वो।कैनेटिकस और मैगनेटिस्म यदि मेरी ज़िम्मेदारी होती तो इलेक्ट्रिसिटी उसकी।फिजिकल और इनोर्गानिक केमेस्ट्री मेरे हिस्से तो ओर्गनिक की मटकी उसके सर होती। जूलॉजी वो पढता तो बॉटनी मेरे हिस्से बस इसी तरह के सहयोग से पास होते गए हम।मेरी हर सेटिंग,स्कूल से लेकर कॉलेज तक उसने बर्बाद कर दी।अपनी वाली के लिए न जाने कहाँ-कहाँ से ढूँढकर मैं शब्द लाता और अपने लिखे ख़त को उसे पकड़ाता कि मेरे दूत की तरह जा और मेरा संदेशापहुँचा आ। कमीना जाता तो मेरा संदेशा लेकर पर ख़त में लिखे मेरे नाम मोहित के आगे त्रिपाठी लिख कर मेरी सारी मेहनत बर्बाद कर देता और मेरी ही सेटिंग के साथ कॉफ़ी हाउस में बैठा कॉफ़ी पी रहा होता। मन तो करता वही जूता फेंक कर मारने का पर नहीं मार पाता,जिगरी दोस्त था मेरा।दोस्त के लिए मेरा सब कुछ कुर्बान था और वो घर आकर मेरे सामने नाचता हुआ बस यही गाता- 'कर दे मुश्किल जीना मोहित कमीना'।अरे भाई ये तेरे लायक ही नहीं थी,तेरी वाली को तो मैं ढूँढ कर लाऊँगा और मैं खीझते हुए कहता- उसकी कोई ज़रुरत नहीं, मैं तो तेरी वाली को ही मंडप से उठाकर ले भागूँगा।

            सारी रात न चाहते हुए भी मोहित की ही यादों के साथ बीती।सुबह मुझे बड़ी ज़ल्दी थी जड़ी-बूटी की खोज के साथ अलखनंदा से भी मिलने की। मैं सर पर पाँव धरे बारिश में भीगता भागा।जन्तो के स्टाल के पास पहुँचा तो देखा वो बस कश्तियाँ बहाने ही जा रही थी। उसे देख मैं ज़ोर-जोर से गाने लगा- ' तुमने पुकारा और हम चले आये।' उसने मुझे घूरा तो अपने हाथों में एक कश्ती लहराते हुए, मैं कहने लगा- मेरे ही नाम की कश्तियाँ बहाती हो और जब मैं सामने हूँ तो ऐसा व्यव्हार। वो गुस्से से बोली- तमीज़ नहीं है तुममें, कभी किसी ने सिखाया नहीं कि किसी के ख़त नहीं पढ़े जाते। मैं उसके लिखे ख़त को लेकर ऊपर टीले पर चढ़ गया था और टीले पर बैठ मैं उसे पढने की कोशिश ही कर रहा था कि चीख पड़ी ये कहकर कि मेरा ख़त मुझे वापस दो। मैं ख़त लहराता हुआ उसे चिढाते हुए कहने लगा- ऊपर आओ और ले लो।वह नीचे से कहने लगी हमें मज़ाक पसंद नहीं।मैंने उससे कहा- कल बन्दर कहा था न तुमने मुझे तो आज तुम्हें ऊपर आना पड़ेगा,बंदरों की तरह उछल-कूद करते हुए, इस ख़त को लेने के लिए।

          अपने हाथ ऊपर की ओर बढ़ाकर वो ख़त तक पहुँचने की नाकाम कोशिश कर रही थी और मैं उसे बंदरों की तरह नचा रहा था। अचानक उसके एक पैर पर ज़ोर पड़ा और वह गिर गयी,साथ ही खुल गया उसका पैर से बंधा बेल्ट।वो ज़मीन पर गिर गयी थी और उसका एक पैर उससे बहुत दूर गिरा पड़ा था। मैं टीले से नीचे कूद पड़ा,उसके पैरों के पास।उसकी आँखों में आँसू थे साथ ही मेरे भी।मैंने भाग कर उसके आर्टिफीसियल पैर को उठाया और उसके सामने सर झुकाए कहने लगा- मुझे पता नहीं था माफ़ कर दीजिये। मेरी ओर देख उसने कहा किस बात की माफ़ीमाँग रहे हैं आप, लंगड़ी तो मैं हूँ न, ध्यान मुझे रखना चाहिए था। समझना चाहिए था मुझे, एक अपाहिज होने के बाद भी उस चीज़ को पाने की ख्वाहिश नहीं करनी चाहिए थी जिस तक मैं पहुँच न पाऊँ। आपने तो बस मुझे फिर एक बार मेरी जगह याद दिला दी।जन्तो की बीवी का सहारा लेकर वो उठी अपने पैरों को सही तरह से जमाया उसने और अपनी छतरी लेकर ऊपर की ओर चल दी।उसे जाता देख मुझे समझ आया कि छतरी बारिश से बचने के लिए नहीं बल्कि टेक कर चलने के लिए इस्तेमाल करती है वो। मैं ठगा सा खड़ा रह गया।

             अगली सुबह अपने क़दमों को कर्नल साहब के बँगले की ओर बढ़ा दिया मैंने। सुबह की रौशनी में बंगले पर लगी तख्ती जो उस रात मैं पढ़ नहीं पाया था पढने लगा। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- कर्नल वाई.एन.जोशी(रिटायर्ड कर्नल इन इंडियन आर्मी)। नीचे लिखा था अलखनंदा जोशी और नीचे आने पर लिखा था फ्लाइट लेफ्टिनेंट पद्मा जोशी।

             मैं बंगले के अन्दर गया कर्नल साहब और अलखनंदा दोनों सैर पर गए थे।तृप्ति जी ने मुझे बिठाया। मैं उनके ड्राइंग रूम को घूम घूम कर देख रहा था जहाँ चारों ओर अलखनंदा ही नज़र आ रही थी। ध्यान देने पर पता चला वो सारे मैडल और कप अलखनंदा के थे।मैं उन पर लिखे अक्षरों को पढ़ ही रहा था कि तभी तृप्ति जी चाय ले आईं। मुझे तसवीरें देखता पाया तो कहने लगीं।सब कुछ अलख का ही है। वो बताती जा रही थीं और मैं सुनता जा रहा था, कितना गर्व है उन्हें अपनी इस बेटी पर और होना भी चाहिए था... 15-16 साल की उम्र में जब हम अपने प्ले स्टेशन के साथ व्यस्त होते थे, तब अलख एवेरस्ट की चढ़ाई करने वाले समूह की सदस्या थी। हम सब तो किताबों में ही पढ़ते थे कि विश्व की सबसे ऊँची चोटी एवेरेस्ट है। कुछ लोग तो दूर से दूरबीन के सहारे उसे देख भी लेते पर कर्नल साहब की इस बेटी ने तो पाँच बार एवेरेस्ट पर चढ़ाई की थी,जिनमें से की तीन बार तो बस कुछ क़दमों से वह प्रथम नहीं आ पाई थी।

                अचानक तृप्ति जी का गला भर आया और कहने लगी माऊन्टेनरिंग इंस्टिट्यूट की उसे हेड बना दिया गया था। एवेरेस्ट पर चढ़ाई करने के लिए आने वाले सदस्यों को ट्रेनिंग देना,उन्हें अपने साथ अपनी ज़िम्मेदारी पर लेकर जाना और सुरक्षित लाना,अलख का जिम्मा था।एवेरस्ट चढ़ाई के दौरान आये एक एवलौंच ने हमेशा के लिए अलख का सबसे पहले ऊपरपहुँचकर तिरंगा लहराने का सपना तोड़ कर रख दिया और साथ ही तोड़ गया उसका हर किसी से रिश्ता और भर गया उसके मन में हमेशा के लिए ये भाव  कि अब उसका जीवन किसी काम का नहीं रहा। ससुराल वालों ने ये कहकर रिश्ता तोड़ दिया कि उनके वेल सेटल्ड बेटे के साथ एक लंगड़ी बहू अच्छी नहीं लगेगी।अब वह कोई ज़िम्मेदारी नहीं निभा पायेगी।अलख के साथ जो हुआ वह एक हादसा था, उस हादसे की हकीकत को अपना लिया था उसने पर लोगों के व्यव्हार ने, खासकर मोहित ने हमेशा के लिए उसके हर सपने को तोड़ दिया था।

          चारों ओर ख़ामोशी थी, मेरीआँखें भरी हुई थीं पर अलख की तस्वीर के सामने खड़ा होकर मैं जब ताली बजा रहा था तो तृप्ति जी ने मुझे हैरानी से देखा- मैं पलटा और उनसे कहने लगा- आपका बहुत बहुत शुक्रिया आंटी, जो आपने ऐसी बेटी को जन्म दिया। जो काम अच्छे-अच्छे लड़कों के बस का नहीं वो काम आपकी बेटी ने किया है और एक नहीं पाँच बार। ये एक हादसा उसे तोड़ नहीं सकता आंटी। जिन लोगों ने उसकी कदर नहीं की उसके पीछे रोने और पछताने का क्या फ़ायदा।

      कर्नल साहब और अलखनंदा के आते ही मैं चुप हो गया। मुझे देख अलख चुपचाप अपने कमरे की ओर जाने लगी। मैंने उससे कहा- आपसे माफ़ी माँगने आया तो पता चला, कल तक जिसे मैं पागल,सरफिरी, बचकानी हरकतें कर कश्ती बहाने वाली बेवकूफ लड़की समझता था वो तो 'दि अलखनंदा जोशी' निकली। जिसके बारे में कई पत्रिकाओं और समाचारों में पढ़ चूका हूँ मैं।अपनी आदत के अनुसार उसने मुझे घूर कर देखा और बोली उस 'दि अलखनंदा जोशी' को मैं दो साल पहले हावड़ा स्टेशन पर छोड़ आई हूँ।इतना कह अपने कमरे में चली गयी।

            मैंने भीवहाँ से चुपचाप निकलने में अपनी भलाई समझी। चुपचाप बुझे मन से मैं यूथ हॉस्टल लौट आया। खाना खाने का मन नहीं था आज मेरा। अलखनंदा का लिखा वो ख़त 100 दफ़ा पढ़ चूका था मैं और साथ ही अपने अन्दर उसके दर्द को महसूस कर रहा था। ऐसा पहली बार हुआ था मेरे साथ कि किसी का दर्द मुझे रुला रहा था।पता नहीं क्या सोचा मैंने और मन ही मन कहने लगा बस अब और नहीं अलख तुम्हें सामना करना होगा उस हकीकत का जिससे तुम भाग रही हो तुम्हें सामना करना होगा अपने सपनों का और अपने मोहित का।

                 अगली सुबह मैं फिर जन्तो के स्टाल पर अलख के आने का इंतज़ार कर रहा था।उसके आते ही मैं बोल पड़ा 'गुड मॉर्निंग दि अलखनंदा जोशी'।अपनी आदत अनुसार मुझे घूरती हुई झरने के पास जाकर कश्ती बहाने ही जा रही थी कि मैंने अपनी हाथ में थामी कश्ती उसे पकड़ा दी और कहने लगा- 'थक नहीं जाती तुम, दो सालों से कश्ती पर एक ही बात लिखकर रोज़ बहाते-बहाते। क्या मिलेगा इस तरह कश्ती बहाने से? उससे बात करो अलख, जितना भी गुस्सा है तुम्हें उसके ऊपर सब कहकर निकाल दो तुमने वो मूवी देखी है न जब वी मेट बस उसी तरह निकाल फेंको साले को अपनी ज़िन्दगी से।'

             थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद  बोली- दुनिया के सबसे आसान कामों में से एक काम है सलाह देना, कितना आसान होता है न सलाह देना;नहीं चाहते हुए भी बहुत से सलाह देने वाले मिल जाते हैं।तुम्हें क्या लगता है मोहित से मैं मिल नहीं सकती, बात नहीं कर सकती इसलिए ये कश्तियाँ बहाती हूँ तो गलत हो तुम। मैं हैरानी से उसे देख रहा था... वो कहने लगी मोहित का पूरा पता ठिकाना है मेरे पास। मैं ये ख़त मोहित के नाम पर ज़रूर लिखती हूँ पर कभी नहीं चाहती की उसे मिले,मैं तो ये ख़त उन पहाड़ों,नदियों और झरनों के लिए लिखती हूँ जिनके किनारे कभी मैं मोहित से मिली थी। जो साक्षी थे मेरे और मोहित के रिश्ते के। जिन्होंने मेरा मोहित से प्यार देखा है और मोहित का मेरे साथ धोखा देखा है। मैं ये ख़त इन झरनों पर बहाती हूँ ताकी मुझे हौसला मिल सके उस ज़ंग को जीतने का जो अभी मुझे उस मोहित के साथ लड़नी है।उस ज़ंग में ये सब मेरी मदद करेंगे।मैंने कहा कैसे?

क्रमशः      

उम्मीदों की कश्ती- १

उम्मीदों की कश्ती-३                                     

अभिधा शर्मा।



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