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@dawriter

उम्मीदों की कश्ती- अंतिम भाग

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बहुत दूर तक साथ चलते-चलते अब वक़्त हो चला था कि घर की ओर जाया जाए। अपनी आँखों में उदासी के घने बादल लिए हम दोनों अपने-अपने कमरे में पहुँच गए।अलख रसोई में जाकर आज खुद अपने हाथों से पकोड़े और अदरक वाली चाय बना रही थी मेरे लिए। थोड़ी देर बाद मेरे कमरे में दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोल तो मुस्कराते हुए बोली- दो दिन बाद जाना हैं न,तब तक का समय तो हम साथ में ख़ुशी-ख़ुशी बिता सकते हैं।

         बालकनी पर बैठकर हम दोनों पकोड़े खाते,दुनिया जहाँ की बातें करते रहे।अलख और मुझे इस तरह साथ और इतना खुश देख कर्नल साहब के मन में भी वही चल रहा था जो इस कहानी को पढ़ते समय आपके मन में भी चल रहा होगा।कहानी और वास्तविकता में कहीं तो अंतर होता है न।शाम को अलख के सम्मान में पार्टी रखी गयी थी प्रेस वाले भी आये थे।

            सबने अलख से उसकी उपलब्धि को लेकर सवाल पूछे।अलख ने सभी के अच्छे जवाब दिए पर जब अलख जाने लगी तो एक प्रेस वाले ने उससे पूछा- उस हादसे की वज़ह से आपका रिश्ता टूट गया था, अब आगे क्या सोचा है आपने।कर्नल साहब गुस्से से उस प्रेस वाले को देख ही रहे थे कि अलख ने उससे कहा- अगर कभी किसी रिश्ते में बंधना भी होगा तो उस रिश्ते से ही बन्धुंगी जो मुझे बगैर पैरों के अपने बराबर समझता हो,मेरे कार चलाने पर डरे नहीं, बल्कि हौसला बढ़ाते हुए मेरे बाजू में बैठा रहे,मुझे मेरे नाम के मतलब को समझाए और 'सुनो' से 'अजी सुनते हो' तक का सफ़र तय करने में थोड़ा वक़्त तो लगता है। खिलखिलाते हुए वह उनके बीच से निकल आई, पद्मा ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा, मैं खामोश था।खाना खाते समय एक बहुत प्यारे से बच्चे को अलख गोद में लिए चली आ रही थी। मैंने मुस्कराते हुए उसे खिलाते हुए पूछा ये कौन। बच्चा अपनी टूटी ज़ुबान में बस इतना ही बोल पाया मामा... मैंने अलख की ओर देखा तो वो उस बच्चे को मेरी गोद में देते हुए बोली- बच्चे से तो कोई नाराज़गी नहीं न तुम्हारी। मैंने उस बच्चे को चूम लिया और अपनी गोद में उछाल कर खेल रहा था कि मेरी नज़र पेड़ की ओट में खड़ी मौली पर पड़ी। वो जाने को हुई तो मैंने गुडिया कह कर आवाज़ दी उसे। भाग कर मेरे गले लग गई और कहने लगी- 'माफ़ कर दो न भैया और घर चलो, माँ पापा भी तुम्हारे घर आने का इंतज़ार कर रहे हैं।'मैंने उससे कहा- घर मैं जाऊँगा मौली पर बस एक दिन के लिए,उसके बाद हमेशा के लिए यू एस चला जाऊँगा।

           कुछ देर मौली से बात की मैंने, फिर अलख के साथ उसे उसके घर के बाहर तक छोड़ा।मैं जब आने लगा तो मौली ने अन्दर आने को कहा। उसके सर पर हाथ रख मैं कहने लगा- ये दहलीज़ मैं कभी नहीं पार करूँगा मौली। मैंने अभी अपने भांजे को उसका शगुन देने के लिए जेब में हाथ डाला ही था कि याद आया मैं वालेट भूल आया था, धीरे से अलख ने मेरे हाथों में एक  डिब्बा थमा दिया। मैंने उसकी और देखा तो उसने अपनी आँखों से इशारा किया। मैंने खोल कर देखा तो एक छोटा सा लॉकेट एक चैन के साथ था। मैंने अपने भांजे को चेन पहना दी।हम जब जाने लगे तो मौली ने कहा- अब शादी भी कर लो।

             मैं और अलख रात को जब वापस घर आ रहे थे तब मैंने उससे पूछा- ये सब तुमने कब... अलख ने मेरे होंठों पर ऊँगली रख दी और कहने लगी- रिश्तों की डोर और उलझे इससे पहले उसे सुलझा लेना ही समझदारी है। मैंने उसके हाथों को थाम लिया और कहने लगा मेरा जाना और मुश्किल मत करो अलख। अलख ने मेरी ओर देखा और बोली- मैंने तुम्हें रोका है क्या?

       उसका ये सवाल मुझे अन्दर तक झकझोर गया कि रोका भी नहीं है पर कोशिश पूरी है कि मैं न जाऊँ। मैं अपना लगेज बाँध रहा था तो तृप्ति जी ने मठरी देते हुए कहा- वहाँ ये सब नहीं मिलता होगा न इसे रख लीजिये और वो चली गईं।मैंने उनके जाते ही दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया और चुपचाप बिस्तर पर लेटा ही था कि आईने में अलख दिख रही थी वो अपनी बालकनी में खड़ी थी। मैं बिस्तर पर लेटे-लेटे उसे आईने में देख रहा था।कब सो गया पता ही नहीं चला।

            अगली सुबह मेरी ट्रेन थी मैंने टैक्सी बुलवा ली कर्नल साहब छोड़ने जाने की ज़िद करने लगे तो मैंने मना कर दिया। मैं नहीं चाहता था कि अलख स्टेशन आये। मैं सबसे विदा लेकर चल दिया। अलख मुझे मिली भी नहीं जाते समय। मुझे थोडा अजीब लगा पर मुझे देर हो रही थी इसलिए मैं निकल गया। स्टेशन पर प्लेटफार्म में बनी बेंच पर बैठे मैं ट्रेन के आने का इंतज़ार कर ही रहा था कि मेरे सामने एक थर्मस में चाय और हाथों में दो कप पकडे अलख खड़ी थी। उसने चाय बढ़ाते हुए कहा- मुझसे भागने की कोशिश कर रहे हो न, जाओ मैं भी देखती हूँ, इतनी कश्तियाँ बहाऊँगी कि तुम्हें आना पड़ेगा।

          मैं उसे देखता रहा, ट्रेन आ गई, अपना लगेज चढ़ा कर मैं जब जाने के लिए ट्रेन के दरवाज़े में खड़ा था तो वो चिल्लाई- 'अजी सुनते हो, ज़ल्दी आना मैं इंतज़ार करुँगी और पागलों की तरह कश्तियाँ बहाकर तुम्हारा वहाँ रहना मुश्किल कर दूँगी।

         ट्रेन चल दी, सारे रस्ते उसकी तस्वीर देखते,मैं कोलकाता पहुँच गया अपने घर।आज सालों बाद अपने घर लौटा था मैं।कंपकंपाते हाथों से डोर बेल बजायी। झल्लाते हुए माँ ने दरवाज़ा खोला पर उनका सारा गुस्सा मुझे देख आंसुओं में तब्दील हो गया। मुझे बहुत देर तक सीने से लगाये रखा उन्होंने। पापा मुझे देखते रहे, कुछ कहा नहीं,चुपचाप थैला उठाया और घर से निकल गए। जब लौटे तो पता चला मेरी पसंद का सारा बाज़ार खरीद लाए थे। मैं कुछ कह नहीं पाया, उनसे लिपट गया। पापा कहने लगे- तू गलत नहीं था बेटा पर वो भी तो बेटी है न मेरी, कैसे... उसके बाद उनकी आवाज़ भर आई थी न वो कुछ बोल पाए और न ही मैं।

         माँ ने कहा- अब शादी तू खुद करेगा या हम ढूँढे। मैंने उनसे कहा वक़्त नहीं है मेरे पास शादी का...कल वापस जाना है बहुत काम छोडकर आया हूँ। माँ की आंखें भर आईं, इतनी ज़ल्दी... बोल कर रसोई में चली गयीं। मैं भी उनके पीछे गया और कहने लगा- अगली बार आप और पापा भी मेरे साथ चलेंगे।

        अगले दिन कुछ अधूरी ख्वाहिशों के साथ, मैं आसमान में था।मैं जानता था कर्नल साहब,पद्मा, मोहित, माँ पापा सब के ज़हन में कुछ सवाल छोड़ आया हूँ मैं, जो मेरे साथ उन्हें भी चुभ रहे होंगे।

         कैलिफ़ोर्निया में जब अपने घरपहुँचा तो नींद नहीं आ रही थी। आदतन नेट ऑन कर जैसे ही fb खोला तो एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई थी।काँपते हाथों से क्लिक किया, मन में आया जो मैं सोच रहा हूँ वही हो। और ओपन करते ही प्रोफाइल देखी तो हँसते-हँसते लोट पोट हो गया।अलख ने अपनी नयी प्रोफाइल बनाई थी 'अलखनिरंजन' नाम से और उस पर उसका रिलेशन शिप स्टेटस इंगेज्ड विथ डॉ मोहित तिवारी दिखा रहा था।

      मैं मन ही मन बोला जीने नहीं दोगी न। अलख वापस गोविन्दघाट चली गयी थी। मैं कहने को तो यू एस में था पर मेरा मन तो अलख के पास छोड़ आया था मैं। अलख रोज़ हमेशा की तरह अपनी उम्मीदों की कश्ती मेरे नाम से बहाती।

        ऐसे ही ठण्ड की एक गुनगुनाती सी सुबह में,चारों ओर कोहरा फैला था।कोहरा धीरे-धीरे छट रहा था और किसी के छनकते क़दमों की आहट हुई,हाथ में कुछ कश्तियाँ लिए अलख झरने के पास आई उसने धीरे से अपनी कश्ती बहाई ही थी कि कुछ दूर जाकर उसकी कश्तियाँ रुक गईं वो बैठकर अपनी कश्तियाँ उठा रही थी कि उसकी नज़रें उसके सामने खड़े एक जोड़ी पैरों पर पड़ी। उसने जब गर्दन उठाई तो सामने मैं था।भागकर मुझे गले से लगा लिया उसने।

         मुझे पीटते हुए बोली- क्यूँ आये वापस,मैंने तो नहीं बुलाया न। मैंने हँसते हुए कहा- रह ही नहीं पाया।थोड़ी देर बाद मुझसे अलग होते हुए बोली- कितना इंतज़ार करवाया तुमने। मैं उसके बिखरे बालों को समेटते हुए बोला- अच्छा सिर्फ तुमने ही इंतज़ार किया, मैं तो मूंगफली खा रहा था। मेरा हाथ पकड़कर खींचते हुए घर ले जा रही थी चलो चाय बनाकर पिलाती हूँ। मैंने कहा- माँ-पापा को नहीं पिलाओगी,वे भी साथ आये हैं मेरे। ख़ुशी के मारे उसने खुद को मेरी बाहों में छुपा लिया और बोली- उन्हें क्यूँ लेकर आये हो। मैं अपनी आदत अनुसार गाने गा रहा था- 'शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है इसीलिए मम्मी ने तेरी उन्हें चाय पे बुलाया है। 'अलख बोली- कहाँ हैं वे। मैं कहने लगा- बस पीछे ही आ रहे थे मेरे। मैंने उन्हें धीरे आने को कहा था क्यूँकी जानता था उनकी पागल बहू इस वक़्त कश्तियाँ बहाने में व्यस्त होगी।

      पहले नहीं बता सकते थे कहकर अलख घर की ओर भाग गयी। मैं वहीँ रुककर माँ पापा के आने का इंतज़ार कर रहा था। मेरी और अलख की शादी तय हो गयी थी। शादी में मोहित भी आया था।अलख के कहने पर मैंने उसे माफ़ तो कर दिया था पर मन में एक गाँठ जो रह गयी थी वो कभी नहीं मिट पाई।मैं और अलख मुंबई शिफ्ट हो गए थे। यहाँ अलख अपने पहड़ों और झरनों को बहुत याद करती थी और रही बात अपनी उम्मीदों की कश्तियाँ बहाने की तो वो तो वह आज भी बहाती है पर अब उन्हें समंदर में बहाती है।

             पिछले कुछ महीनो से अलख बहुत उदास नज़र आ रही थी। मैं उसे लेकर बीच पर गया और मैंने उसके हाथों पर अभी-अभी एक कश्ती पकड़ा दी थी। ख़ुशी से पहले उस कश्ती को पढ़ रही थी अलख, जिस पर मैंने उसके लिए संदेशा लिख रखा था-

 सुना है मानसून आने वाला है...

इस बार जम कर बरसेगा..

मौसम विभाग ने इत्तेला दी है...

चलो न पहाड़ों पर, बादलों को एक बार फिर से बरसता देखें।

मेढ़ों से पानी को झरनों की तरह सरकता देखें।

कल-कल करते झरने जब शोर मचाएंगे...

उसकी धुन में हम भी कुछ गीत गुनगुनायेंगे...

कुछ नज्में मैं तुम्हें सुनाऊंगा,

तुम तरन्नुम में उसी तरह गाना,

जिस तरह बसंत में कोयल की तरह कूकती थी।

हरी-हरी वादियों से जब अट्टाहस करते बादल सर के ऊपर से गुजरेंगे...

उन रुई के फाहों को कैद करने...

चलो न फिर से पहाड़ों पर...

कुछ कश्तियाँ बहाने के लिए....

याद है पिछली बारिश ने किस कदर हमें भिगोया था,

मुझमें न कुछ भी मेरा था तुझमें न कुछ भी तेरा था।

चलो न एक बार फिर से चलें पहाड़ों पर...

सुना है मानसून आने वाला है...

इस बार भी उस बार की तरह ही बरसेगा।।

        इसे पढ़कर उसके चेहरे पर बस ख़ुशी ही ख़ुशी थी, मैंने उसकी ख़ुशी को ये कहकर दुगना कर दिया था कि मुझे कुछ वनस्पतियों पर रिसर्च करने के लिए वैली ऑफ़ फ्लावर्स भेज रहे हैं।उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

          हम जब गोविन्दघाट पहुँचे तो हमने देखा जन्तो के टी स्टाल के पास एक कश्तियों की दूकान खुल गयी है, जिसका नाम जन्तो ने 'उम्मीदों की कश्ती' रखा है और वहाँ आने वाले लोगों में उसने ये बात फैला दी है कि इस झरने में कश्तियाँ बहाने से अधूरी ख्वाहिशें पूरी हो जाती हैं। मैंने और अलख ने उसके इस मास्टर माइंड आईडिया को देख उससे कहा- ला भाई जन्तो एक कश्ती तो देना। हम दोनों ने वहाँ पर एक कश्ती बहाई, उसके बाद मैंने पैसे निकालते हुए उससे कहा- कितना हुआ। वो कहने लगा साब आपसे पैसे थोड़े लेगा ये बिसनेस तो आपकी ही वजह से ही है न साब।

               मैंने और अलख ने एक-दुसरे को मुस्कराते हुए देखा। अब आप क्यों मुस्करा रहे हैं मियाँ- जाइये बारिशों का मौसम है अपनी उम्मीदों की कश्ती बहाइये क्या पता हमारी तरह आपकी भी ख्वाहिशें पूरी हो जायें और अगर न हों तो ये याद रखियेगा कि ज़िन्दगी में कुछ ख्वाहिशों का अधूरा रह जाना बहुत ज़रूरी होता है जीने के लिए।

                         समाप्त

उम्मीदों की कश्ती- १

                                              अभिधा शर्मा।।



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