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@dawriter

अधूरे रिश्ते

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मेरे घर के सामने एक गरीब परिवार रहता है कल मेरा वहां जाना हुआ, उनका पूरा घर धुएं से भरा हुआ था गृहस्वामिनी की दोनों आखों से आसूं बह रहे थे और रोने जैसी हालत थी मैंने पूछा इतना धुंआ क्यों..? बोली क्या करे भैया, गीली लकड़ी जलती है तो धुंआ देती है ना पूरी तरह से जलती ही है ना बुझती ही है सामने अधजली लकड़ियों से असहनीय धुंआ लगातार उठा जा रहा था।

मैं घर आकर सोचने लगा की, कितनी सही बात है अधजली लकड़ी, गीली लकड़ी धुंआ देती है और अधूरे रिश्ते……?

वो भी तो जीवन भर धुंआ देते हैं-ना वो जलकर भस्म ही हो पाते है और न उनकी राख ही सहेजी जा सकती हैं वो तो आखों में धुएं की तरह जीवन भर चुभते ही रहते हैं दुःख देते रहते हैं दर्द देते रहते हैं क्यों बनते हैं ऐसे रिश्ते….? और क्यों जलते है ये तिल तिल, सुलगते रहते हैं मन ही मन, आसुओं से नम रिश्ते पलको पर जलते रिश्ते जिस तरह आसुओं का पलको से पुराना रिश्ता है ठीक उसी तरह धुएं का भी पलको से पुराना इश्क है तभी तो जरा आप अकेले हुए नहीं की पलको पर ये धुआँ अपना डेरा जमा लेता है किसी ने कहा है ना-

“आँखों में जल रहा है क्यों…? बुझता नहीं धुंआ..! उठता तो घटा सा है बरसता नहीं धुंआ”

कितनी गहरी बात है दोस्तों कितनी पीड़ा कितना दर्द है उस क्षण में जब आप अपनी दो छोटी आँखों में ज़माने भर का दर्द समेट लेते हैं अनोखी बात तो ये है की जिन आँखों से गंगा जमुना बहती है उन पर कुछ जलता कैसे होगा ये बात सिर्फ वही समझ सकते है जिन्होंने दर्द के धुएं को सहेजा होगा, पाला होगा, ये वो गीली अधजली लकड़ियां है जो जली ही नहीं ये धुआँ वो अभिशप्त रिश्तों का है जो कभी मुकम्मल नहीं हुए, ये धुआँ उन अव्यक्त भावनाओं का है जिन्हें कभी शब्द नहीं मिले दोस्तों कभी तो ये दर्द धुंआ बन स्याह कर देता है हमारा वजूद तो कभी यही दर्द सूनी तन्हा खामोश रातों में जुगनू बन जाता है और टिमटिमाने लगता है दोस्तों अब कभी स्याह रातों में कोई जुगनू देखो तो समझ लेना की किसी की पलको पर कोई रिश्ता कोई ख्वाब जल रहा है, किसी के अरमान तो किसी जज्बात मे कुछ अधुरे रिश्ते जल रहे है ।

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चन्द्र प्रताप सिंह



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