नार्मल डिलीवरी ही होनी चाहिए।

वो पिकं रेखाएं माँ बनने की परीक्षा में पास होने के संकेत थे। आंनद ,रमा का पति भी संपूर्णता की परीक्षा में सफल होकर गर्व महसूस कर रहा था।

"सुम्मी की माँ.."

एक अबोध बच्ची की माँ को खो देने की और उसके... संघर्ष की कहानी..!!

निराशा

दूसरों की मजबूरियां किस तरह हमारी समझ में नहीं आती और हमारे लिए एक पहेली बन कर रह जाती है , पढ़िए इस कहानी में I

ज़िंदगी जीत गई

रोहित नामक एक युवक को अचानक ज्ञात होता है कि वह एच आई वी पॉजिटिव है। वह जीने की आशा छोड़ देता है। उसकी पारिवारिक परिस्थिति खराब हो जाती है। एक शुभचिंतक के सहयोग से वह अपनी ज़िंदगी की जंग जीत जाता है।

आजादी ......!

ये कहानी है एक नन्हे लड़के छोटू की जो बड़े सपने लेकर गांव से शहर आता है। लेकिन शहर जाने के बाद एक वर्ष संघर्ष के बाद फिर से आजादी पाने की।

शान्ति

mmb
mmb

अपने स्वार्थ के लिए पढ़ी लिखी लड़की को पागल बना दिया

LIFE - your journey

An article on the meaning of life where in your trials and tribulations are just a part of it.

A lucky Number ( love on a phone call)

This story is about a boy who was lonely. A day before a Valentine's day, a girl called him and said " hello.! I dialed a lucky No. ?" Boy talked rudely. He realized his mistake soon and apologized her. Now they talk for hours and boy is in love with her. They decided to meet but boy never met.

जिंदगी की परीक्षा

माँ की मृत्यु के उपरांत नितांत अकेले पिता द्वारा पुत्र के पालन पोषण में उभरती वस्तु स्थिति एवम पिता पुत्र के बीच के प्रेम का अनूठा वर्णन

मुक्ति

एक ऐसे अनाथ बच्चे की कहानी जिसे बाल श्रमिक के रूप में जूता फैक्ट्री से मुक्त करवाया गया और छोड़ दिया गया भूख से मरने के लिये।

क्यों करूँ करवाचौथ

आप करवाचौथ क्यों करती हैं ओर यदि नहीं करती तो क्यों नहीं....मुझे आपके जवाब का इंतजार रहेगा।

ख्वाहिशों वाली खिड़की

"आसमान में आज काले काले बदल थे, न तारो के कोई निशान थे न चाँद था. फैली थी अंदर से चीखती हुई, अनंत सी ख़ामोशी. और बेजान सी हो गयी थी, ख्वाहिशों कि खिड़की भी."

दधीचि

जमाने से उलट बेटी को कान्वेंट में डाला और बेटे को सरकारी स्कूल में। पत्नी ने आपत्ति की तो उसको समझाया दोनों कान्वेंट में पढ़े इतनी हमारी हैसियत नहीं है और बेटे का क्या है नहीं भी पढ़ेगा तो मजदूरी करके जी लेगा। बेटी जात है समय को देखते हुए उसका पढ़ा लिखा होना जरुरी है।

कंधो का बोझ

पार्क की एक बेंच पर अपनी धर्मपत्नी के साथ बैठे शर्मा जी आज अपने कंधो को कुछ जादा भारी महसूस कर रहे थे। हालाँकि वो उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ बहुत सी जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल जाती है और कंधो का बोझ बहुत हद तक कम भी हो जाता है। लेकिन उनके कंधो पर इतना बोझ क्यों था??

बरगद

आसमान छूना भी उतना ही आवश्यक है जितना की जमीन से जुड़े रहना.. बस यही प्रेरणा और सन्देश दे रही है कहानी !

मोर्चा

रात एक बजे उस माँ को क्या सूझी कि कश्मीर में सोते अपने बेटे को जगा दिया। उस माँ को किसी अनहोनी की आशंका थी, जैसे कुछ बुरा होने वाला है

दादी की यादें .....!

एक यादों में खोई सी राशि जो बरबस ही अपनी दादी को याद करते हुए उनकी ही दुनिया मे खो जाती है !

मेरा‌ ‌वजूद है भी ‌या ‌नहीं????

वजूद के सवालों में घिरी जिन्दगी....

झुलसी दुआ (कहानी) #ज़हन

उसकी दिनभर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए...

तर्पण

वो दौड़कर कटोरी में गंगाजल ले आई । बटेसर सर पर हाथ धड़े वहीं बैठे रहे । भौजाई सुरक्षित दूरी से दुआरी पर खड़े होकर रमेसर से इहलोक से प्रस्थान का आग्रह कर रही थी और वीर रस की कविताओं से दलन के इस कंटक को मिटा डालने का आवाहन ।

No man can bring my visor to the ground

A poem based on the struggles that a woman goes through during her lifetime and how she handles everything

नियति

story of a poor family ,who could not save the life of their beloved sons inspite of there great efforts,they did all what they could do. बाहर लकदक टेंट लगे थे। नसबन्दी जैसे जुमले का हुस्न शबाब पर था। उसी शामियाने के पीछे उस गंदी इमारत पर तहरीर लिखी थी, ‘‘तत्काल लाभ, तुरंत भुगतान।

कलरब्लाइंड साजन

हॉस्पिटल में हुई जांच में रूही को पता चला कि आशीष को झूठ बोलना आता है। वो कई महीनों से छोटा मर्ज़ मान कर अपने फेफड़ों के कैंसर के लक्षण छुपा रहा था, जो अब बढ़ कर अन्य अंगो में फैल कर अंतिम लाइलाज चरण में आ गया था। अब आशीष के पास कुछ महीनों का वक़्त बचा था। दोनों अस्पताल से लौट आये।

धारा विरुद्ध

पर मैं सोच रही थी, कि हम लोगों ने जिस तरह अकारण ही बेटे के जन्म को उत्सव का पर्याय बना दिया है, अब उसे बदलने का वक्त आ गया है।