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@dawriter

"गुड्डू"

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उसकी उम्र लगभग दस-बारह साल होगी। उसके टेढ़े पैरों में चप्पल नहीं थे। पथरीली सड़क कठोरता के साथ उसके पैरों को नुकसान पहुँचा रही थी। पीठ पर एक छोटा सा, मैला सा बैग लादे हुए बेढंगे चाल से अपनी ही व्हीलचेयर को खींचते हुए ले जा रहा था। शारीरिक अक्षमता के कारण व्हीलचेयर धकेलने में उसे ज़्यादा ज़ोर लगाना पड़ रहा था। रोज़ाना की धूल से सना हुआ उसका आसमानी शर्ट और काला पैंट किसी सरकारी स्कूल का यूनिफार्म लग रहा था।

मैं उससे लगभग 50 मीटर की दूरी पर अपनी बाइक(Bike) पर बैठा उसे देख रहा था। मुझे लगा उसकी व्हीलचेयर खराब हो गयी है। मदद करने के लिए मैंने उसके सामने बाइक रोक दी। उसका सांवला चेहरा धूप से और भी गहरे रंग का हो गया था। मैंने उसका नाम पूछा। बड़ी मुश्किल से बोल पाते हुए उसने कहा "गुड्डू"

मैने कहा,"चलो तुम्हे घर छोड़ दूँ"
"नहीं, मैं खुद चला जाऊँगा। आप जाओ।"

इतना कहकर वो फिर अपने काम मे रम गया। ऐसा लगा जैसे वो अपनी तपस्या भंग नहीं करना चाहता। जैसे व्हीलचेयर को धकेलना ही उसका प्रारब्ध है। ख़ैर, उसकी मदद कर सकूँ इसलिए आस-पास के लोगों से पूछना मुनासिब समझा। थोड़ी ही दूरी पर गुड्डू सा ही साँवलापन लिए एक औरत खड़ी थीं। उनसे पूछा-

"वो बच्चा कौन है? आप जानती हैं?"
"हाँ, वो मेरा बेटा है"

उनके इस उत्तर में कहीं कोई पश्चाताप या शर्म का भाव नहीं था। उनके उत्तर में माँ की थोड़ी वेदना ज़रूर थी पर उनका गर्व इस वक़्त ज़्यादा प्रभावी था।

मैंने आगे पूछा,"वो ऐसे क्यों आ रहा है? क्या दिक्कत है उसे?"
"उसे व्हीलचेयर पर बैठना पसंद नहीं है"
"पर वो तो बड़ी मुश्किल से चल पा रहा है"

"हाँ, भगवान ने यही दिया है बेटा! वो कहता है कि उस साईकल के सहारे चलते-चलते चलना सीख जाएगा। कहता है बड़ा होकर सब की तरह खेलेगा, दौड़ेगा। इसी तरह रोज़ स्कूल जाता है और अपने सारे काम करता है। किसी की मदद नहीं लेता, कहता है सब कर लेगा। वो जैसे खुश होता है, मैं वैसे ही रखती हूँ।"
अब तक 'गुड्डू' हमारे पास से गुज़र रहा था। अपनी माँ को देखते हुए प्यार से मुस्कराया। उस मुस्कुराहट में कहीं कोई शिकायत, दर्द कुछ नहीं था। उसकी माँ डबडबाई आंखों से मुस्कुरा रही थी। उनका बच्चा कितना बहादुर है। ममता और दृढ़-निश्चय को एक साथ देखने का कितना खूबसूरत पल था वो। मैं बिल्कुल निःशब्द, भावहीन दोनो को देख रहा था। 'गुड्डू' ने मुझे अजनबी निगाहों से देखा और फिर से अपने 'प्रारब्ध' में रम गया।

मेरा फ़ोन ऑफ था इसलिए उसकी तस्वीर नहीं ले पाया। पर दोबारा उससे मिलने ज़रूर जाऊँगा। मेरी प्रेरणा यहीं से तो आती है।



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