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@dawriter

​एक कदम….

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फैसले बुरे हैं 

थोपे गए हैं 

इंसान मर रहे हैं 

कुछ शोर कर रहे हैं 

कुछ की दास्तान है 

रूलाने वाली 

आखों में सबके पानी

ये कैसा राज आया 

जिसने जनता को रुलाया 
मगर 
सबने तमाशा देखा

जल रही आग का ताप सेका

मगर मदद के लिए आगे कोई ना आया 

किसी ने अपनी जगह ना खड़ा कराया 

बुढ़ा है ज़रूरतमंद है 

बिमार है परेशान है 

अपनी जगह ही दे दो 

तुम देर से घर चले जाना 

कोसने से तो है अच्छा 

हाथ ही बढ़ा दो 

जो गिरा है उसे उठा दो 

माना है तानाशाही 

पर तुम तो हो सिपाही 

कितना सच बोलते हो

सियासत के एक तरफा भेद 

खोलते हो 

कभी दिल को भी तो खोलो

नालियों से दरिया भी तो हो लो

जो लोग मर रहे हैं 

या बिमार पड़ रहे हैं 

उनकी मदद ही कर दो 

हाथों में दो चार सौ ही धर दो

क्रेडिट कार्ड से दवाईयाँ दिला दो

दो घड़ी मन ही बहला दो 
बोलने से है हमेशा अच्छा 

कुछ कर के दिखाना 

एक जगह पर खड़े रह कर 

शोर करने से अच्छा 

एक कदम आगे बढ़ाना 
धीरज झा



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