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@dawriter

औलाद का सुख

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आज दुर्गा पूजा में अपनी बेटी पंखुरी को लेकर पहली बार आयी थी सोमा .... और बहुत खुश थी कि, उसकी बेटी को दुर्गा मां का आशीर्वाद मिलेगा पूरे 3 महीने की हो चुकी थी.वो माँ की मूर्ति के चरण पर पंखुरी के नन्हें हाथ रखवा कर और टीका लगवा कर ज्यों ही पलटी सामने , सौमित्र खड़ा हुआ दिखा . सौमित्र वही जिसके साथ उसका रिश्ता तय हुआ था उसने पहचान कर कहा  "अरे सोमा तुम ? कैसी हो ? "  "मैं ठीक हूं तुम कैसे हो ? और ये तुम्हारी पत्नी हैं क्या ?" बगल खड़ी स्त्री को देखकर सोमा बोली  " हाँ सोमा ..ये कोपल है मेरी पत्नी. हताश सा सौमित्र बोला  " अरे ये तुम्हारी बेटी है क्या ? ....बहुत ही प्यारी है .

" पंखुरी को देखकर सौमित्र बोल उठा  "हाँ , ये मेरी बेटी है . " 

कोपल ने मुस्कुरा कर कहा "लाइये इसे जरा मुझे दे दीजिए ..."  सोमा ने मुस्कुरा कर कहा .." हां हां क्यों नही .." कोपल पंखुरी में खो सी गयी और सोमा ने सौमित्र से कहा .. 

" कितने वर्ष हुए तुम्हारे ब्याह को ? यही कोई पांच वर्ष . पर अभी तक हमें सन्तान न हुई ..! सौमित्र बोला  " ओह्ह , चलो कम से कम मेरी कुंडली मे कन्या-सन्तति का योग तो था " व्यंग्य से भर कर बोली सोमा  हाँ ,काश मेरी मां ने उस योग को देख कर शादी से इनकार न किया होता ..बेटे की चाह में उन्होंने कन्या को जन्म देने वाली लड़की को वधू रूप में नही चुना. शायद उसी की सजा मिल रही है जो हम आज तक औलाद के सुख को तरस रहे हैं.  " सोमा ने , कोपल को देखा आंसू भरी आंखें लिए वो बेचारी नियति के भोगदण्ड को झेल रही थी पंखुरी को उसकी गोद मे देती हुई बोली ..! देवी माँ बड़ी दयालु हैं क्या पता अगली दुर्गाष्टमी को मैं भी गोद मे एक परी को खिलाऊँ. "  "हां हां क्यों नही ,देवी मां तुम्हारी भी गोद भरें !" …

ये कहकर सोमा गर्व से अपनी पुत्री को गोद में लेकर पंडाल से बाहर की ओर चल पड़ी..और मन ही मन अपने भाग्य हेतु देवी माँ को धन्यवाद देने  *******

-कविता जयन्त श्रीवास्तव



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