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@dawriter

चलने का नाम ज़िन्दगी

20 167       
suryaa by  
suryaa

 

निशा कोठारी शहर की टॉप बिजनेस वीमेन में से एक थी .....टॉप के अमीर लोग, आईएएस अधिकारी बड़े बड़े नेता सब कोई उनसे मिलने और टॉप के पत्रकार उनका इंटरव्यू लेने के परेशान रहते थे.....निशा कोठारी जितनी बड़ी शख्सियत थी उनका दिल उतना ही कोमल और मुलायम था.....शहर का कोई ऐसा अनाथालय नहीं था जहाँ निशा कोठारी का डोनेशन ना जाता हो .......दो बच्चों की सिंगल मदर होने को वो बिजनेस वीमेन होने के सामन्जस्य को वो बहुत अच्छे से बिठा रहीं थी लेकिन इन सब के बीच उनको एक बात काटती रहती थी वो थी उनके पति की जुदाई .....अगर बच्चे अपने पापा के बारे में पूछते तो वो कन्नी काट जाती थीं और पत्रकार बस ये जानने को बेताब रहते थे कि आखिर मिस्टर कोठारी हैं कौन ?

 

निशा को शहर में जानने वालों को सिर्फ इतना पता था कि आज से करीब 20 साल पहले निशा अकेले आई थी अपने दो जुड़वा बच्चों को लेकर जिनकी उम्र मात्र 2 वर्ष रही होगी उसके बाद या पहले क्या हुआ कोई नहीं जानता था .......

 

आज सुबह उठते ही रुद्रांश ने शोर मचाना शुरू किया कि मुझे जानना है कि कौन हूँ मैं कौन है मेरा बाप .......सब मुझसे पूछते हैं तो मैं क्या बताऊँ। लोग आपसे मिलने को बेताब रहते हैं लेकिन पीठ पीछे आपकी बुराई भी करते हैं ......ना जाने किनकी औलादों को पाल रही है मुझे जानना है आज .......शिवांश ने भी रुद्रांश का समर्थन किया।

 

निशा ने फिर टालने की कोशिश की लेकिन दोनों भाई आज मोर्चा खोलकर बैठ गए थे .......कहते हैं ना "जंग अपनों से हो तो हार जाना चाहिए " तो चट्टान की तरह डटी रहने वाली निशा आज अपने बच्चों के सामने समर्पण कर बैठी ....और उसने अपने अतीत को उनके सामने खोलना शुरू कर दिया।


करीब 28 वर्ष पहले --

निशा हम भागकर शादी कर लेते हैं मेरे पापा ऐसे नहीं मानेंगे विक्रम उतावला होकर बोला।

--लेकिन विक्रम मेरे बाबू जी, जिन्होंने अपना तन-पेट काटकर मुझे पढ़ाया मैं उन्हें इस तरह धोखा नहीं दे सकती आख़िर मैं ही उनकी इकलौती औलाद हूँ जो कुछ हूँ उनकी मैं ही हूँ।

--तो हमारी मुहब्बत का क्या उसे तुम ऐसे ख़त्म हो जाने दोगी।

---ऐसा नहीं है विक्रम।

--तो फिर कैसा है विक्रम ने रोमांटिक होते हुए कहा।

--रोमांस छोड़ो अपने पापा से बात करो।

--फिर से कोशिश करता हूँ .......कहकर विक्रम ने निशा को अपने आग़ोश में ले लिया और वो दोनों सारी सीमाएँ लाँघते हुए एक दूसरे में समा गए।

7 महीने बाद ---

--तुम ऐसा कैसे कह सकते हो विक्रम

--मैंने तुम्हें माँ बनने को कहा था

---लेकिन ये सिर्फ मेरी गलती नहीं हैं, मैंने अकेले नहीं किया कुछ भी

---मैं कुछ नहीं जानता मुझे मेरा बाप मार डालेगा कहते हुए विक्रम हाथ छुड़ाकर निशा को रोते हुए छोड़कर चला गया।

 

निशा जब घर लौटी तो अपने माँ-बाप को मरा हुआ पाया .....समाज के तिरस्कार और बेइज्जती के बोझ से दबकर उन्होंने आत्महत्या कर ली।

 

दो महीने बाद निशा ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया .......दो साल तक उसने परिचितों और रिश्तेदारों से पनाह और मदद माँगी लेकिन मदद करने के बजाय सबने उसे तिरस्कृत ही किया.......दो साल इधर उधर भटकने के बाद उसने अपना शहर छोड़ दिया और दूसरे शहर आ गयी।

 

निशा वर्मा अब निशा कोठारी बन चुकी थी ......उसने ईंट भट्ठे पर मज़दूरी करनी शुरू कर दी। दोनों बच्चों को पीठ पर बाँधकर दिन भर कच्ची ईंट पाथती और रात को रूखा सूखा खाकर अपने किस्मत पर रोती.......पुरुष प्रधान देश में अकेली महिला को कोई जिम्मेदारी नहीं समझता सब उसे मौक़ा समझते हैं जिसमें निशा जो कि बला की खूबसूरत थी एक दिन भट्ठे के मैनेजर ने उससे जबरदस्ती करने की कोशिश की जब उसने विरोध किया तो उसपर चोरी का इलज़ाम लगाकर नौकरी से निकाल दिया गया।

 

अब निशा ने तय किया वो नौकरी नहीं करेगी तो उसने कॉस्मेटिक की चलती फिरती दुकान खोल ली और घर घर जाकर कॉस्मेटिक सामान बेचने लगी लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था कॉस्मेटिक में उसका जबरदस्त घाटा लगा कि वो फिर से सड़क पर आ गयी अब उसके पास रोने के अलावा और कोई चारा नहीं था .........लेकिन कहते हैं न जब ईश्वर एक दरवाजा बन्द करता है तो दो दरवाजे खोल देता है। एक महिला उसके हालात पर तरस खाकर उसकी नौकरी एक बेकरी में लगवा दी जो सिर्फ महिलाओं द्वारा संचालित किया जा रहा था। नौकरी ना करने की कसम खाने वाली निशा को इस बात का सुकून था कि यहाँ उसकी इज़्ज़त सही सलामत रहेगी ...... थोड़े दिन तक बेकरी पर काम करने के बाद उसने अपनी ब्रेड बेकरी खोलने का निश्चय किया और नाम दिया "अंश" बेकरी .......उसका बेकरी का काम चल निकला और कुछ ही दिनों में उसकी गिनती एक सफल बिजनेस वीमेन में की जाने लगी ...........इसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा कहते हुए निशा ने कोरों पर आये आँसू पोछ लिए .....लेकिन शिवांश और रुद्रांश को देखा वो दोनों रो रहे थे।

"तो क्या हम विक्रम कोठारी के बेटे हैं" ......रुद्रांश गुस्से से बोला

--हाँ बेटा ......निशा ने असहाय होकर कहा ....

कुछ दिनों बाद---

निशा अपने घर में बैठी टीवी देख रही थी ......तभी एंकर ने कहा "अब तक सनसनीखेज न्यूज़ शहर के बड़े बिजनेसमैन विक्रम कोठारी की उनके ही फॉर्म हाउस में गोली मारकर हत्या"

 

निशा का दिल धक से कर के रह गया और उसने रुद्रांश और शिवांश की ओर देखा तो उनके चेहरे पर एक सुकून था ...........इसके बाद निशा ने प्रण लिया कि वो किसी भी मोहब्बत को निशा कोठारी के अंजाम तक नहीं पहुंचने देगी और किसी के जीवन में यूँ रुकावट नहीं आने देगी क्योंकि "चलने का नाम ही ज़िन्दगी है"

 



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