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@dawriter

बेटी की उड़ान !!

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आज शर्मा जी बहुत खुश है आज उनकी छोटी बेटी राशि की शादी जो खुशी-खुशी सम्पन्न हुई, लेकिन इस खुशी की एक नहीं बहुत सारी वजह थी। अपनी बड़ी बेटी रेनू की शादी में उन्होंने कम से कम 15 लाख रुपये लगाए थे। क्या-क्या नहीं किया था ?? गांव वाली जमीन बेची! बीवी के पुराने कंगनों से बेटी की ज्वैलरी बनवाई। राशन वाले का हिसाब तो उन्होंने सालों में चुकाया, पर नतीजा, रेनू आज भी एक-एक पैसे के लिए कितनी तरसी है।

अपने कपड़े तक भी उसने सालों तक नहीं लिए, बस जो तीज त्यौहार पर मायके से आये वही पहनती रही पर कहीं न कहीं उसका आत्मसम्मान उसे इसकी गवाही नही दे रहा था, कब तक वो अपने माँ बाप की ही जिम्मेदारी बनी रहती?? उन्होंने उसे पाल पोस कर बड़ा किया, उसकी शादी में बेइंतहा पैसा लगाया। फिर भी उन्हें उसकी छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करनी ही पड़ती थी, अब क्या करते बेटी को ऐसी हालत में भी तो नहीं देख सकते थे, वो तो शुक्र है कि उसने BA किया था, उसके बाद उसने एक पड़ोस के ही स्कूल में नौकरी करनी शुरू कर दी। जिसकी बदौलत अभी उसके पास कुछ ट्यूशन भी आने लगे थे।

कुल मिला कर अब गाड़ी थोड़ी-थोड़ी पटरी पर आने लगी थी। भले ही धीरे-धीरे पर उम्मीद तो बंधने लगी ही थी साथ ही रेनू ने आगे पढ़ने का मन भी बना लिया था जिससे भविष्य में कुछ अच्छा होने के संकेत मिलने लगे थे। ये सब हुआ तो बहुत देर से जिसके लिए शर्मा जी खुद को हमेशा दोषी मानते आये।

काश ! उन्होंने उसे बाकी की पढ़ाई ससुराल में पूरी करने की नसीहत न दी होती, उसकी शादी कुछ साल रुक कर उसकी पढ़ाई पूरी होने पर कराई होती। शादी में लगाये जाने वाले पैसे उसकी पढ़ाई पर लगाये होते। उसे हर परिस्थिति से लड़ने के लिए सक्षम बनाया होता। उसकी कम पढ़ाई के कारण ही ससुराल में उसे अपने सम्मान की कितनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। दहेज का सारा सामान ज्यों का त्यों उन लोगों ने अपनी बेटी को दे दिया, और रेनू एक-एक चीज के लिए तंग हालात में जीती रही। शादी में हुई बड़ी सी दावत सब रिश्तेदार नाकभौंह सिकोड़ते हुए खा पी कर कमियाँ निकाल कर अपने-अपने घर चले गए, कुछ बचा रह गया था तो रेनू की अपने अस्तित्व की लड़ाई, या फिर शर्मा जी का कर्ज।

इसी गलती से सबक लेते हुए शर्मा जी ने अपनी छोटी बेटी राशि की पढ़ाई में कोई कसर नहीं रखी। भले ही इसके लिए उन्होंने लोन भी लिया, लेकिन इसका उन्हें ज़रा भी मलाल नहीं था। क्योंकि उन्हें उसकी काबिलियत पर पूरा भरोसा था और वही हुआ भी आज राशि पढ़ लिख कर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गयी और उसने अपने पापा का लोन खत्म कर कुछ पैसे जमा कर उनका भविष्य भी सुरक्षित कर दिया है और आज उसकी शादी शर्मा जी के बचपन के दोस्त के बेटे के साथ इसी शर्त पर बिना लेन देन के हो रही है कि शादी के बाद भी वो अपना काम जारी रखेगी, भले ही परिस्थितियां जैसी भी हो दोनों मिल बांट कर अपनी जिम्मेदारियों को निभाएंगे।

आज शर्मा जी समझ चुके थे और इसीलिए अपने साले साहब को समझा रहे थे "केवल वें ही नहीं हज़ारों लाखों ऐसे लोग है, जो अपनी बेटियों की पढ़ाई से ज्यादा खर्च उनकी शादी में करते हैं। जिसका एक चौथाई हिस्सा भी बेटी को नहीं मिलता, दहेज लड़के वाले ले जाते हैं, रिश्तेदार पतल चाट जाते हैं, और समाज कमियां ही निकालता रह जाता है। कभी बेटी में, कभी शादी मे !

एक माँ-बाप को क्या मिलता है ?? उसका तो घर भी खाली .....!! कलेजा भी खाली .....!! तिजोरी भी खाली .....!! कभी बेटी की शादी के अगले दिन उस घर के हालात देखिये कैसा बंजर सा हो जाता है। घर में शादी की रौनक से लेकर सब सामान तक एक सूना पन लिए होते हैं, क्योंकि पिछले छह महीनों से अगर कुछ खरीदा भी गया होता है तो वो केवल शादी के लिए, पर अब घर में न बेटी होती है न सामान। माँ बाप होते हैं, लुटे हुए से बेटी की एक आवाज़ को तरसते, जैसे उनकी ज़िंदगी में कोई मकसद ही न बचा हो। इन सबके बाद भी, अगर बेटी तकलीफ में हो तो उन पर क्या बीतती होगी इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। इसलिए जैसे शादी तय करते वक़्त कुंडली मिलान के समय कहते है न कि बाकी तो इसकी किस्मत।

बस ये बात बेटी को काबिल बनाने के बाद कहिये, उसकी किस्मत !!

क्योंकि पढ़ी लिखी बेटी, जब बहू बनेगी तो बाहर छोड़िए ससुराल वाले भी उसे सम्मान की नज़र से देखेंगे। वरना तो वो एक काम वाली के अलावा कुछ और नहीं रह जायेगी। इसीलिए अपनी बेटी को पहले पढ़ा लिखा काबिल बना बाद में शादी की सोचना "।।

© नेहाभारद्वाज

Image Source: dailymoss



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