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@dawriter

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ… उसके बाद क्या????

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बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।।।।। यह नारा हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा दिया गया जिसका अहम् मुद्दा रहा हमारे देश की हर बेटी को एक अच्छी शिक्षा प्रदान कर उसे अपने पैरों पर खड़ा करना।।।। देश की प्रगति की ओर काफी अच्छा कदम रहा है यह योजना, जोकि 22 जनवरी 2015 ,बुधवार को 100 करोड़ की शुरुआती पूंजी के साथ हमारे प्रधानमंत्री जी के द्वारा हरियाणा के पानीपत में शुरू की गयी।।।। इस योजना की शुरुआत की आवश्यकता 2001 व 2011 के सेंसस के आँकड़ो के अनुसार हुई जिसके तहत लड़कियों के जन्म दर के आँकड़ो मे भारी दर पर गिरावट दिखाई देने लगी। यह योजना समाज में लड़कियों के महत्व के बारे में,, कन्या भ्रूण हत्या की रोक में,, लड़कियों को शिक्षित बनाने में,, लड़के व लड़कियों के बीच के भेदभाव को कम करने के लिए काफी हद तक साबित भी हुयी है।।।।।

लेकिन अब सवाल यह उठता है‌ कि क्या यह योजना हमारी बेटियों को समाज में वह सम्मान दिला पायी है जिसकी वह हकदार हैं???? बेटी होने पर हम खुशियाँ तो मनाने लगे है ‌लेकिन क्या हमारे समाज में अभी भी कुछ घटिया सोच वाले लोग हमारी बेटियों ‌को चैन व आजादी की‌ सांस लेने देते हैं???? सोच कर देखिए शायद आपका जवाब न ही होगा। हर महिला दिवस‌ आने से पहले हम महिलाओं के सम्मान के लिए बड़ी बड़ी बातें कहकर सम्मानित तो किया जाता है लेकिन अगले ही दिन फिर क्यों किसी बेटी को हवस ब बुरी नजर का शिकार बनाया जाता है????अगर एक आदमी ऑफिस से काम करके घर लेट पहुँचता है‌ तो वह थक कर मेहनत करके आता है लेकिन अगर एक औरत रात मे घर लेट पहुँचती है चाहे वो जितना मरजी अच्छा कमा ले उसकी मेहनत व काम कोई नहीं देखेगा बल्कि उसके घर लेट पहुंचने पर उसके चरित्र के प्रति गलत विचार अवश्य बना लेते हैं लोग!!!!!! व साथ ही साथ रात में अकेले ऑफिस से घर वापिस आने का खतरा अलग बना रहता है एक औरत के लिए ।।।।।

हमारा समाज हमेशा से ही पुरुष प्रधान रहा है‌ चाहे औरत जितनी प्रगति कर ले यहाँ तानाशाही सदैव पुरुष की रही है वो चाहे घर में हो या बाहर।।।। घर में अगर पति पत्नी दोनों कमा कर थके हारे वापिस आते हैं तब भी हर आदमी की पहली इच्छा यही रहती है कि उसकी बीवी बिना कोई दिक्कत दिखाये घर के हर वो काम भी करे जो कि एक गृहिणी करती है,,,,बीवी की अपनी थकान दिखाने के समय फट से यह जवाब मिलता है कि “तुम कोई पहली औरत नहीं हो जो बाहर के काम के साथ साथ घर का भी‌ काम कर रही हो..घर का काम‌ तो सभी को करना पड़ता है….घर की रोटी सब्जी तो सभी को बनानी पड़ती है” वगैरह वगैरह वगैरह ।।।।व ऑफिस में काम में कुछ दिक्कत होने पर सीधा यह बोल दिया जाता है‌ कि अगर घर व ऑफिस एक साथ मैनेज नहीं होता तो नौकरी छोड़ दो.. इस प्रकार की बातें तो सदैव पुरुषों की जुबान पर रहती है।।।।

असलियत तो यह है कि किसी भी योजना की शुरुआत हो जाए या फिर हम‌ अपनी बेटियों को जितना मरजी पढाई करा ले लेकिन लड़कियों की महत्त्वता तो उनके द्वारा किए जाने वाले घर के कामों से बनती है ना कि उनकी पढ़ाई व उनकी डिग्री से ।।।।यही सोच है हमारे समाज की….लड़कियों की शादी उसकी पढ़ाई,डिग्री व योग्यता को देखकर नहीं बल्कि दहेज व उसे कितना घर का काम आता है यह देखकर की जाती है।।।। अब बदलाव की आवश्यकता है ‌साथ साथ सोच में परिवर्तन की भी…..अगर घर का काम‌ की इतनी ही महत्वता है तो कृपया करके अपनी बेटियों के साथ साथ बेटों को भी घर का काम सिखाए ताकि‌ शादी के बाद जब दोनो थक कर ऑफिस से घर लोटे तब पति भी‌ अपनी पत्नी के साथ घर के काम काज में हाथ बटाए आखिर घर तो दोनो का ही है।।।।। अंत में बस इतना कहना चाहूँगी कि समाज में हर बदलाव को लाने के लिए सबसे पहला परिवर्तन हमे हमारी सोच व विचारों में लाना पड़ेगा..सोचिए,,विचार कीजिएगा….अच्छा लगे तो कृपया करके लाइक व शेयर करें व अपने विचार सांझा अवश्य कीजिएगा……_धन्यवाद ।

मोना कपूर



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