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@dawriter

वो चाय आज भी ड्यू है. (स्मृति शेष)

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"सो जेंटल मैन...",

कहा इंटरव्यू बोर्ड के चेयरमैन ने मेरे रिज्यूमे पर एक निगाह डालकर उलटते-पुलटते...और मेरे दिल की धडकनें बढ़ गई. कुछ ही सेकंड्स में वह व्यक्ति बोर्ड के अन्य सदस्यों की ओर मुखातिब था, "एनी क्वश्चन?". ठीक बगल में उनके बांईं ओर बैठे पांच सदस्यीय बोर्ड के सदस्यों में एक ने उनके कान में कुछ कहा, और वह सहमति में गर्दन हिलाकर मुझे इंगित कर बोले, "इट्स ओके, मैन, योर इंटरव्यू इज डन". यह इशारा था मेरी विदाई का, उस इंटरव्यू से जिसके लिए मैने डेढ़ वर्ष प्रतीक्षा की थी और जिसमे मेरे न जाने कितने सपने बसे थे. वह भारत सरकार के उद्योग मंत्रालय में राजपत्रित अधिकारी का पद था जिस पर देश भर से चुनीदा सैकड़ों प्रत्याशी भाग ले रहे थे. आसाम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, काश्मीर, कर्णाटक, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात तथा महाराष्ट्र के साथ-साथ स्थानीय परीक्षार्थी भी इंटरव्यू के लिए आये हुए थे-- पोस्ट थी कुल एक अदद, और मेरे साक्षात्कार में डेढ़ मिनट भी व्यय नहीं किये गए, जबकि सामान्यतः २० से ४० मिनट का इंटरव्यू लिया जा रहा था.

मैंने कोशिश की संवाद स्थापित कर अपने विषय में बताने, उनकी जिज्ञासाओं को समझने और उत्तर देने की इच्छा शक्ति की, लेकिन वह सब अगले परीक्षार्थी को बुलाने की तैयारी में जुटे थे. उन्होंने पुनः मुझे सौम्यता से जाने को कहा. अंततः मैं अपना ब्रीफ़केस लेकर जाने लगा. मन बहुत दुखी और अवसादित था. स्थिति को भांपते हुए उस व्यक्ति ने, जिसने बोर्ड के चेयरमैन के कान में कुछ फुसफुसाया था, चलते समय मुझे एक सांकेतिक मुस्कान भी दी, लेकिन मैं उस मुस्कान का सम्मानित उत्तर देने में असमर्थ सा बन, तेज़ी से बाहर निकल आया. मन वाकई बेहद दुखी था. मैं इस नौकरी में अपना बेहतर भविष्य देख रहा था. आगे मैंने किसी अन्य नौकरी के लिये आवेदन भी नहीं किया हुआ था...और यहाँ पर सारी संभावनाएं और सपने धूल-धूसरित से हो गए था. मन अवसाद से भर गया. घड़ी में देखा. अभी दोपहर के कुल १.३० बजे थे. मैं आधा ऑफिस अटेंड करने को इच्छुक था, पर मेरा मन कहीं एकांत में जाकर चुप पड़े रहने का था. मैं घर लौट आया.

 दिल्ली के धौलपुर हॉउस से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय और मयूर विहार स्थित मेरे आवास की दूरी लगभग बराबर थी. पर, मैंने घर लौटना ही उचित समझा था. पत्नी को थोडा आश्चर्य हुआ. पूछा उसने... और मैंने अपनी उलझन बताई. मैं शांत होकर बेड पर लेट गया. मन बहुत व्यथित था. लगता था कि किसी बड़ी एप्रोच से कोई सिलेक्शन कर लिया गया है, और यह इंटरव्यू केवल आईवाश है. कुछ देर मैंने शांत लेते रहने का यत्न किया, पर मैं बेचैन हो गया.अंततः मैंने मन कुछ निर्णय किया और चल दिया.

मैंने सीधे आई टी ओ स्थित बहादुरशाह ज़फर मार्ग का रुख किया. वहां टाइम्स ऑफ़ इंडिया के बहुमंजिली भवन के तीसरे तल तक मैं यूँ ही उस दिन धड़धड़ाते हुए चला गया. अन्य दिनों की अपेक्षा न कोई पास, न कोई टोका-टाकी. लिफ्ट का उपयोग करने की भी नहीं सूझी. मैं सीधे नवभारत टाइम्स के फीचर सम्पादक के कमरे में प्रविष्ट कर चुका था...पर मैंने देखा की संपादक जी दो अतिथियों को चाय की प्याली सर्व कर रहे थे, और तीसरी कोई कुर्सी या स्थान वहां उपलब्ध नहीं था.

मैंने ठिठक कर वापिस जाने के लिए दरवाज़ा बंद ही किया था, कि उनकी निगाह मुझ पर पड़ी, और उन्होंने मुझे मुस्कुराकर अन्दर आने का आग्रह किया. मैं उनके निकट खड़ा हो गया. "क्या बात, बहुत उदास दिख रहे हो?", उन्होंने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा. "सर, उदास तो होना ही है, जब आपने भी मेरे साथ न्याय नहीं किया तो मैं क्या कहूँ. एक मौका तो मुझे दिया जाना बनता था न सर?", मैंने भी इतना धीमे से कहा, कि उनके अतिथि हम लोगों की बातचीत से अनभिज्ञ रहे. "...और सर, मेरे कुछ लेख आपके पास एप्रूव्ड रखे हैं, कृपया उनको लौटा दें मुझे. जरूरत नहीं है प्रकाशन की अब...", जैसे मैंने अपनी सारी कडुवाहट उड़ेलने की कोशिश की हो. उन्होंने विचलित हुए बिना, अपनी मंद मुस्कान में कुछ गंभीरता लाते हुए कहा, "दरअसल मैं संघ लोक सेवा आयोग की नीति के अंतर्गत गोपनीयता की शपथ से बंधा हूँ, पर तुम बहुत परेशान दिख रहे हो, तो तुम्हें बताता हूँ...कि तुम्हारा ही चयन हुआ है. मैंने चेयरमैन के कान में सिर्फ यही कहा था, कि केवल यह अभ्यर्थी ही इस पद का पात्र है. और मैं इसके काम, लेखन और क्षमता को परख चुका हूँ....और मुझे प्रसन्नता है कि चेयरमैन ने मेरी बात का मान रखा. वह मना भी कर सकते थे. तुम मस्त रहो और भूल जाओ, जब तक परिणाम न आये."

मैं अवाक रह गया पर उन्होंने आगे बताया कि , "इंटरव्यू उनका लिया जाता है जिनसे हम अपरिचित हों, न मेरी तुमसे कोई रिश्तेदारी है, न कोई व्यक्तिगत परिचय, पर तुम गज़ब लिखते हो, दिल से लिखते हो, सो भूल जाओ कि मैंने तुम पर कोई अहसान किया है. चयन तो तुम्हारा ही होना था, वह बात अलग है कि यदि मैं तुमसे अपरिचित होता तो, फिर प्रश्नों से तुम्हारी क्षमता का आकलन करता"... मैं नि:शब्द हो गया. जैसे कोई देवदूत अपनी अदृश्य सोने की छड़ी से मुझे आशीर्वाद दे गया हो. उन्होंने फिर मुझे आश्वस्त किया, और मैंने विदा ली. उन्होंने मुझे एक बात और कही, "तुम्हारा लेखन अद्भुत है, भाषा और विषय पर पकड़. लिखना कभी छोड़ना नहीं. इससे जो तुम्हें पहचान मिलेगी, वह अकल्पनीय होगी".

यह थे पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकार-सम्पादक स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी, जिन्हें समय-समय पर लोक सेवा आयोग की ओर से चयन समितियों में विशेषज्ञ के रूप में आमंत्रित किया जाता था. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक गांव परसदेपुर में हुआ। उन्होने डी.ए.वी.कालेज, कानपुर से बी.ए, प्रयाग विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से एम.ए और भावनगर विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की.

चार वर्षों तक बंबई विश्वविद्यालय, बंबई से संलग्न कालेजों में हिंदी-अध्यापन के बाद १९६१ से १९७२ तक वे टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह के ‘धर्मयुग’ में सहायक संपादक रहे. १९७२ से दिल्ली में क्रमश: ’पराग’, 'सारिका’ और दिनमान के संपादक रहे. तीन वर्ष दैनिक नवभारत टाइम्स में फीचर सम्पादन किया. छ: वर्ष तक हिंदी ‘संडे मेल’ में प्रधान संपादक रह चुकने के बाद १९९५ से ‘इंडसइंड मीडिया’ में डायरेक्टर रहे. उनकी डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई जिनमें ‘लुकुआ का शाहनामा’, 'घाट-घाट का पानी’, 'अंतरंग’, नाट्य-परिवेश’, 'आग के रंग’, 'अमृता शेरगिल, ’समय की दहलीज’, 'ज़रिया-नजरिया’ और ‘गीत संचयन’ बहुचर्चित और प्रशंसित है.

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दरअसल नंदन जी से मेरी पहली भेंट भी काफी रोचक है. मैं भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के एक राष्ट्रीय संस्थान के संचार विभाग में कार्यरत था. उम्र रही होगी २३-२४ वर्ष. उस समय पत्रकारिता और जनसंचार में डिग्री होना एक बहुत बड़ी बात थी. लिखने का मन भी था, और जरूरत भी. सो, फीचर लेखन में हाथ आजमाने की सोची. देखते-देखते मंगलेश डबराल जी से जनसत्ता, राजेन्द्र अवस्थी जी से कादम्बिनी, मृणाल पाण्डेय और हिमांशु जोशी से साप्ताहिक हिंदुस्तान और बाद में प्रयाग शुक्ल तथा अन्य वरिष्ठ साहित्यकारों का सानिध्य मिला और उन्होंने अपने प्रकाशनों में मान और सम्मान के साथ रचनाएं प्रकाशित की. हिंदुस्तान टाइम्स और फाइनेंसियल एक्सप्रेस तथा कुछ विदेशी पत्रिकाओं और आकाशवाणी से भी मुझे सहयोग मिला.

 

इसी बीच एक दिन मुझे आवास पर नंदन जी का संक्षिप्त पत्र मिला. पत्र कुछ इस तरह से था, "प्रिय राजगोपाल, आपके कुछ लेख मेरे पास प्रकाशनार्थ स्वीकृत पड़े हैं. मैं आभार हूँगा कि आप उनके साथ संदर्भित चित्र भी उपलब्ध करा सके. इस ओर आना हो तो एक कप चाय पीजिएगा-- कन्हैयालाल नंदन." मैं अभिभूत हो गया. अभी तक मेरी उनसे सीधे भेंट नहीं थी. सवेरे आठ बजे ऑफिस के लिए निकलना और सात बजे शाम वापिसी. यह रूटीन था. शनिवार ऑफ था, बस वही एक दिन अपना होता था, सो समय हमेशा कम रहा.

अगले शनिवार को मैं पहुँच गया उनके ऑफिस. कुछ मार्किट का भी काम था. पत्नी साथ थी. उन्हें रिसेप्शन पर बिठा, मैं मिलने गया. केबिन का गेट खोलते ही उन्होंने प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा. मैंने जैसे ही अपना परिचय दिया, वह अचंभित हो गए औऱ एकबारगी ऊपर से नीचे तक "अरे, तुम हो राजगोपाल ? मैं तो सोचता था कोई ५५-६० वर्ष का गंभीर व्यक्ति होगा.खैर, बहुत अच्छा लिखते हो. तुम्हें ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है, यूँ ही लिखते रहो. और हाँ, मैं चाहता हूँ कि तुम एक्सक्लूसिव रूप से केवल टाइम्स ग्रुप के लिए लिखो", उन्होंने एक सांस में ही मुझे कुछ ऐसा कह दिया कि मैं सोच भी नहीं सकता था. मैंने आभार प्रकट किया. चाय के लिए मैंने विनम्रता से मना कर किसी और दिन के लिए चाय सेशन को स्थगित करने को कहा (पत्नी को मैं रिसेप्शन पर जो बिठा आया था). "ठीक है, फिर चाय ड्यू रही मित्र", कहकर उन्होंने मुझे जाने दिया. और संयोग देखिये. यह शनिवार की घटना थी. सोमवार को उनकी हमारी भेंट संघ लोक सेवा आयोग में हुई जहाँ उन्हें मेरा साक्षात्कार लेना था.

उसके बाद मैं लिखता रहा, और वह प्रकाशित करते रहे. कई अवसर पर उन्होंने मग्ज़ीन सेक्शन के कवर पर भी मेरी ही स्टोरी प्रकाशित की. उन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं थी. और प्रिंट मीडिया में नवभारत टाइम्स का बोलबाला था. नंबर एक पर था वह हिंदी समाचारपत्रों में. और उनकी मग्ज़ीन तो पूरे देश के सभी संस्करणों में एक ही होती थी. बहुत सम्मानजनक था उसमे स्थान पाना.

जिस दिन मैंने उद्योग मंत्रालय के नए कार्यालय में योगदान दिया. मैंने नंदन जी को नमन किया. फोन पर आशीर्वाद लेना चाहा तो उन्होंने कहा, "कौन सा सिलेक्शन भाई?". मेरे याद दिलाने पर बोले, "अरे अब भूल जाओ उसे ".

एक बार मैं यूँ ही मिलने उनसे उनके ऑफिस पहुंचा तो देखते ही बोले, "बहुत अच्छे समय पर आये हो. तुम्हारे एक आर्टिकल के साथ एक मैचिंग बॉक्स-आइटम लगभग २५० शब्दों में लिख कर अभी दे दो.", मैं थोडा असहज हुआ क्योंकि मैं इस समय लिखे के लिए तैयार नहीं था. मैंने दो दिन बाद देने का अनुरोध किया जो उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया, बोले, "रिफरेन्स सेक्शन में बैठ जाओ, और दो घंटे में दे दो. कल इसे छापना है". और मेरे लिए वह आदेश था. अगले दिन उन्होंने इसे खूबसूरती से प्रकाशित किया. टाइटल आज भी याद है मुझे, "नींद क्यों रात भर आती नहीं".

अलग से चाय पीने का अवसर नहीं मिल पाया कभी भी मुझे उनके साथ. उनकी व्यस्तताएं भी बहुत थी और मेरी जटिलताएं कुछ कम नहीं रही. चाय नहीं, पर उनका स्नेह और आशीष हमेशा बना रहा. वह सन्डे मेल में चले गए और मैं बाद में उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन लखनऊ चला आया, नई नौकरी ज्वाइन करने. पर उनका जो साथ था वह मेरे लिए मील का पत्थर साबित हुआ और उनके निर्देश गुरु मन्त्र. बस, मुझे इस बात का हमेशा अफ़सोस रहा कि मैंने उनके साहित्यकार मन को कभी जानने का प्रयास नहीं किया. न उस समय मेरी कोई विशेष रूचि रही साहित्य में. मुझे पत्रकारिता अधिक आकर्षित करती थी. पर अब, जान पाया हूँ कि पत्रकारिता तो इंस्टेंट फ़ूड की तरह है, और साहित्य हमारी सदियों पुरानी अजर अमर धरोहर.

नमन उन्हें, उनकी रचनाधर्मिता को, और उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को. २५ सितम्बर २०१० को ७७ वर्ष की आयु में उनका दिल्ली के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. श्रद्धान्जलि.

नंदन जी कुछ प्रतिनिधि कविताएं:
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♦️♦️क्यों, आखिर क्यों?

हो गई क्या हमसे
कोई भूल?
बहके-बहके लगने लगे फूल!

अपनी समझ में तो
कुछ नहीं किया,
अधरों पर उठ रही शिकायतें
सिया,
फूँक-फूँक कदम रखे,
चले साथ-साथ,
मगर
तन पर क्यों उग रहे बबूल?

नज़रों में पनप गई
शंका की बेल,
हाथों में
थमी कोई अजनबी नकेल!
आस्था का अटल सेतुबंध
लड़खड़ाता है
हिलती है एक-एक चूल!

रफू ग़लतफ़हमियाँ
जीते हैं दिन!
रातों को चूभते हैं
यादों के पिन
पतझर में भोर हुई
शाम हुई पतझर में
कब होगी मधुऋतु
अनुकूल
तन पर...

♦️♦️खारेपन का अहसास

खारेपन का अहसास
मुझे था पहले से
पर विश्वासों का दोना
सहसा बिछल गया
कल,
मेरा एक समंदर
गहरा-गहरा सा
मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया।

♦️♦️एक नाम अधरों पर आया

एक नाम अधरों पर आया,
अंग-अंग चंदन वन हो गया.

बोल है कि वेद की ऋचायें
सांसों में सूरज उग आयें
आखों में ऋतुपति के छंद तैरने लगे
मन सारा नील गगन हो गया.

गंध गुंथी बाहों का घेरा
जैसे मधुमास का सवेरा
फूलों की भाषा में देह बोलने लगी
पूजा का एक जतन हो गया.

पानी पर खीचकर लकीरें
काट नहीं सकते जंजीरें
आसपास अजनबी अधेरों के डेरे हैं
अग्निबिंदु और सघन हो गया.

एक नाम अधरों पर आया,
अंग-अंग चंदन वन हो गया.

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