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@dawriter

वक्त के झरोखा

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#One_Day

जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है..
हम अपने आप से ज्यादा बातें करनी शुरू कर देते हैं..
शायद अहसास होने लगता है..
कि पिछले 12-14 सालों से लाउड आवाज में लिए गए डिसीजन..
उतने सही नहीं रहे..

हम कभी उतने समझदार नहीं होते..
जितना हम अपने आप को समझते हैं..
पर ये भी है कि..
हम उस दौर उस उम्र उन परिस्थितयों के हिसाब से बैस्ट डिसीजन ही लेते रहे हैं..

वक़्त का क्या है..एक दिन
कुछ सालों बाद शायद अपने आप से बातें करना भी नादानी लगे..

और हम सफ़ेद दाढ़ी में मूंछों पे ताव दे दे देके..
ओल्ड मोंक के साथ स्कूल के दोस्तों के बीचे बैठे बैठे..
अपनी उन्ही लाउड हरकतों पर लाउड आवाज़ में चियर्स कर रहे हों..

जिंदगी की इस रील में..
कुछ ही तो प्रिंट हैं जो दिल में डेवेलोप हुए हैं.. :)

जिंदगी में कई छोड़ी बड़ी कहानी बनती है और जब शुरू होती है,

तब सोचते हैं हम हीरो बनेंगे ...

और मझधार में होते हैं तो सोचते हैं हम यहां क्यों है, और जब वो खत्म होती है तब अहसास होने लगता है कि हीरो बनने चले थे और कहानी के आम किरदार भी न बन पाये... और अफसोस करते हैं वो वक्त गवा देने का 😕

और फिर एक नई आशा के साथ..

नये जोश के साथ.. नई कहानी की तरफ बड़ जाते हैं ये सोचते हुए.. 

एैसा भी कोई दौर रहा है क्या जब आँधियो ने चिरागों का इम्तहान न लिया हो?? ..... 



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