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@dawriter

वंशवृद्धि ..... एक पहल !

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रश्मि ! जिसकी शादी को लगभग 5 साल हो चुके थे, अब जाकर रश्मि को ये खुशी मिलने वाली थी पर रश्मि आज - कल अलग ही खयालो मे रहती थी.... " अगर बेटी हुई तो "। क्योंकि ! वो अम्माजी को जानती थी, जो पिछले पाँच सालो से पोते की ही रट लगाये हुए थी। उनका कहना तो यहाँ तक भी था, अगर भगवान इतने सालो दे तो बेटा ही दे .....। बेटी होने से बेहतर तो ना ही दे।

बस यही सोच सोच कर रश्मि परेशान थी। उसने अभी एक दिन अम्माजी को किसी से कहते हुए सुना था

" बेटा नहीं हुआ तो वंश व्रद्धि कैसे होगी ?

कैसे ? मरने के बाद मुक्ति होगी.....।

कौन .... ? अंत समय मे संस्कार विधि सम्पन्न करेगा।

आत्मा दर दर भटकेगी..... और अगले जन्म होने तक यू ही तरसती रहेगी "। पर रश्मि सोचती थी " क्या फर्क पड़ता है बेटा हो या बेटी " ...? और फ़िर वो ये कैसे भूल सकती है ? कि इसी जन्म मे अगर इतने पाप कर लेंगे..... तो अगले जन्म मे तो छोडिये इस जन्म के अंत का क्या होगा .... ?

कैसे ....? किसी जीव की हत्या का पाप ढो सकेंगे..... सारी उम्र !

कैसे ....? रात को नींद भी आ पायेगी।

कैसे ... ? भगवान के सामने सर झुका कर कह पायेंगे, कि मैंने आजीवन कोई गलत काम नहीं किया।

रश्मि मे अपनी माँ को भी बचपन से ऐसे ही देखा था। उन्होने एक बार उसे बताया था कि जब उन्होने रश्मि को जन्म दिया था। तो उन्हे घर से लेकर समाज तक कितनी आलोचनाये सहनी पड़ी। कैसे.....? उनसे एक अपराधी की तरह व्यवहार किया था।

एक बेटा तो जन्म नहीं सकतीं !

और कुछ बाते जो उसके सामने ही उसकी दादी ने उसकी माँ से कहीं थी।

बेटी की माँ हो इतना बोलना शोभा नहीं देता !

कल तुम्हारी बेटी को भी ससुराल जाना है... कुछ काम काज सीखाओ इसे नहीं तो ससुराल मे नाम बदनाम करायेंगी।

जैसे और यहाँ तक भी.... " अब तुम्हारी बेटी बड़ी हो गयी है तुम ज्यादा बनना संवरना छोड़ दो ज्यादा चटकीले कपड़े मत पहना करो "। उसे याद था ! कि घर मे जब छोटी बुआ की शादी हुई थी, तब घर के सब लोगों को और सभी रिश्तेदारों यहाँ तक की बच्चो तक को भी ! ये हिदायत दी गयी थी कि

" आगे की सभी कुर्सियां केवल लड़के वालो और उनके रिश्तेदारों के लिये है। खाना बारात आने के बाद ही शुरू होगा और पहले लड़के वाले खायेगे उसके बाद लड़की वाले।

शुक्र है ......! अब होटल मे शादी होने के कारण ये सब इतना मायने नहीं रखता, पर लड़की वाले तो..... खासकर घर के जिम्मेदार बड़े बेचारे कुछ चिंता और कुछ समाज के मारे कुछ खा भी नहीं पाते।

रश्मि को लगा की ये उनकी अपनी FRUSTRATION होती है जो वो दूसरो पर निकालते है।

पर दूसरी तरफ़ उनलोगों से वो खासी प्रभावित भी थी.... जो इतनी समझदारी से चलते है की अगर उन्हे पहली बेटी हुई है, तो वो अपनी एक ही बेटी से बहुत खुश होते है और दूसरे के बारे मे विचार भी नहीं करते और अगर परिवार का दबाव ज्यादा हो तो एक समय अंतराल ज़रूर रखते है। फ़िर दूसरा चाहे बेटा हो या बेटी...। वो बस उससे ही अपना परिवार पूरा मानते है। बाकी दुनिया चाहे जो मर्जी कहे..... उन्हे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। राहुल कमरे मे आ चुका था.... और दो बार रश्मि को आवाज भी दे चुका था..., पर अबकी बार रश्मि ठिठक कर बोली " आप .....? आप कब आये .....?

" बस अभी जब तुम गहरी सोच मे थी " राहुल ने जवाब दिया।

वैसे तुम क्या सोच रही थी .....? " अगर बेटी हुई तो " सहसा ही रश्मि के मुंह से निकल गय़ा।

क्या ....? राहुल ने पूछा।

नहीं, कुछ नहीं ! कहते हुए रश्मि ने बात ख़त्म करना चाहा, पर राहुल उसकी मनोस्थिति समझ चुका था। रश्मि फूली नहीं समायी जब उसने राहुल के मुंह से सुना " बेटी हो या बेटा "।

हम तो माँ बाप ही बनेंगे।

और रही बात बाकी लोगों की उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी इच्छा है वो इस नये सदस्य को अपनाना चाहे या ना अपना पाये तो ये उनकी परेशानी। पर मै औरों की परेशानी अपने सर नहीं ले सकता।

ये खुद ही अपनो से सताये हुए लोग है। शायद ! अगर उन्होने उसका जवाब वहीं दे दिया होता। तो आज उन्हे समाज से डरने की ज़रूरत ही ना होती।

और खासकर, औरतें ....! जो ये बात बहुत अच्छे से जानती है की ये मेडिकली साबित हो चुका है, कि लड़की का जन्म पिता से सम्बन्धित होता है ना कि माँ से। फ़िर भी जाने क्यों .... ? वो माँ को ही दोषी ठहरायेगी।

शायद ! पिता को दोष देने से उसका जवाब उसी वक्त उन्हे उन्ही के शव्दो मे मिल जायेगा।

बस राहुल का इतना कहना था की रश्मि के चहरे से चिंता की लकीरें मिट चुकी थी।

और आज उस घटना के 15 दिन बाद रश्मि को बाहर लाया गय़ा उसने एक बेटी को जन्म दिया था।

अम्माजी रश्मि के पास आयीं और बोली अच्छा है ! पर पोता होता तो ज्यादा अच्छा होता उसी से तो वंश वृद्धि होती।

तभी पास ही खडे राहुल ने जवाब दिया।

" वंश मे वृद्धि हो चुकी है, अम्मा ! नया सदस्य आया है। देखो ! आप दादी बन कर अपने ओहदे की वृद्धि कर चुकी हो, और हम मम्मी पापा बन कर। अगर बेटा होता तो उसके रिश्ते से भी आप दादी ही तो बनती या कुछ और "।

अम्माजी के पास जवाब नहीं था। पर अब वो समझ चुकी थी, शायद ! वंश वृद्धि का सही अर्थ जो उनके बेटे ने उन्हे बताया।

और सहसा मुंह से निकल पड़ा। क्यों ना .....? इसका नाम ही वृद्धि रखे।

Neha bhardwaj



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