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@dawriter

लाल चच्चा

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शाम के छ: बज रहे है । राकेश अपने ऑफिस में बैठा हुआ , अपने अधिनिस्थ कर्मचारी उर्फ़ अपने दोस्त “टटुआ” का इंतज़ार कर रहा है । टटुआ रात के लिए ब्लेंडर प्राइड की बोतल और खाना का सामान लेने गया था ।

टटुआ का असली नाम “जिंग गोगई” है और वह मूल रूप से आसाम का रहने वाला था । राकेश जब आसाम भ्रमण पे गया था तो उसकी मुलाकात टटुआ से हुई थी । टटुआ से बात करने के बाद , राकेश को पता चला  की टटुआ के परिवार के सभी लोग को “उल्फा” के उग्रवादियों ने बेरहमी से क़त्ल कर दिया था । टटुआ किसी भी तरह से अपनी जान बचा कर उनके चंगुल से भाग निकला था । अज्ञातवास के दिनों में टटुआ जंगल से जो भी चीज़ मिलता उसे खा लेता , कोई भी चीज़ मिलता उसे वह खा लेता । एक बार तो उसने राकेश के सामने एक छिपकली मार के खा लिया था । और उसके बाद दोनों ने साथ में शराब भी पी थी । तभी राकेश ने फैसला कर लिया था टटुआ को अपने साथ ले जायेगा , और दोनों मिल कर जीवन की नयी शुरुवात करेंगे । टटुआ को अनाथ बनाया गया था और राकेश खुद अनाथ वाली ज़िन्दगी जी रहा था । वो अपना परिवार और समाज त्याग कर एकांतवास की ज़िन्दगी जी रहा था । दोनों आसाम से लौट कर उत्तराखंड में अपना एक छोटा सा बिज़नस की शुरु किया । टूर एंड ट्रेवल का बिज़नस । राकेश के पास जबरदस्त पूँजी थी , पर यह पूँजी राकेश के पास कहाँ से आयी थी , यह बात किसी को नहीं पता था । टटुआ कभी कभी राकेश से उसके परिवार के बारे में जरूर पूछता , लेकिन राकेश हमेशा इस सवाल को टाल जाता और बोलता - समय आने पर सब कुछ बताऊँगा ।।।।

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तब तक टटुआ सामान लेकर आ गया था । सामान ऑफिस में रख कर टटुआ ऑफिस बंद करने के लिए सभी जरुरी फाइल और कागज़ को सही जगह रख रहा था ।

अरे टटुआ - राकेश ने कहा ,

जी - टटुआ ने जवाब दिया ,

पिछले आठ महीने से हम लोग काम ही कर रहे है , और काफी अच्छा हम लोग इस बार किये है । तो इसलिये फिलहाल अभी हम दोनों दस दिनों के छुट्टी पर है - राकेश ने कहा ,

छुट्टी ? - टटुआ ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा ,

हाँ छुट्टी , हम लोग परसों हिमाचल प्रदेश के छोटे से गाँव “मलाना” जा रहे है - राकेश ने कहा ,

ओह मतलब आप अपने सपने को जीने जा रहे है । आपका तो हमेशा से सपना था मलाना जाने का - टटुआ ने कहा ,

हाँ भाई जब हम दोनों खानाबदोश वाली ज़िन्दगी जी ही रहे है , तो क्यों ना अपने सारे शौक़ और सपने पूरे किये जाए । दस दिन , मलाना का “हासिश” का बना हुआ चरस , गाँजा और बाकी सब कुछ बिना सोचे समझे पीएंगे और जियेंगे - राकेश ने कहा ,

टटुआ हँस रहा था , राकेश की बातों को सुनकर ।

कल सारी पैकिंग कर लेना , परसो शाम में पाँच बजे की फ्लाइट है - राकेश ने कहा ,

ठीक है , लेकिन अभी तो पहले रूम चलिए , रात का खाना बनाना है , और आज के कोटे का यह बोतल भी खत्म करना है - टटुआ ने राकेश को ब्लेंडर प्राइड के बोतल के तरफ इशारा करते हुए कहा ।

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रात में टटुआ ने मुर्गा - चावल बनाया , और उसे शराब के साथ पीते हुए दोनों ने खत्म किया । उसके बाद टटुआ सोने चला गया । और राकेश छत पर चला गया । चाँदनी रात थी , शराब के कारण उस पर मदहोशी छाई हुई थी । उसने अपने बटुए को अपने पैंट के पीछे वाले पॉकेट से निकाला । बटुए में दो तस्वीर थी । एक किसी लड़की की थी , और दूसरी शायद उसके परिवार की । राकेश मन में सोच रहा था की सात साल से भी ज्यादा हो गए उसे अपने परिवार और अपने समाज के लोगों से मिले हुए । और अब वो शायद कभी मिलना भी नहीं चाहता है , अपने लोगों से । वो खुश था अपने ख़ानाबदोश की ज़िन्दगी से । वो खुश था कि परसों वो और टटुआ “मलाना” घूमने जा रहे है । इतना सब सोचते सोचते वो अपना बिस्तर छत पर ही कर लिया था , और वह छत पर ही सो गया था ।

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सुबह लगभग 7 बजे के आसपास राकेश की आँख खुली । और सब से पहले उसने अपना मोबाइल पर आये सभी नोटिफिकेशन चेक किया । काफी सारे मेल , व्हाट्सएप्प , मैसेज थे । वो एक एक कर के सभी को देखे जा रहा था । तभी एक मेल पर जा कर नज़र रुक गयी । वो मेल देख कर राकेश के चेहरे का रंग उतर गया । उसने तुरंत टटुआ को नींद से उठाया ।

क्या हुआ भैया - टटुआ ने नींद में ही कहा ,

जल्दी उठो , हम लोग को आज पटना निकलना है - राकेश ने जवाब दिया ,

पटना ? पर हम लोग कल मलाना निकलने वाले है न - टटुआ ने अजीब नज़रो से राकेश से पूछा ।

टटुआ जनता था राकेश मूल रूप से बिहार का रहने वाला है । और पटना में उसके सभी परिवार के लोग रहते है , जिससे राकेश कभी नहीं मिलना चाहता है । पर आज एकाएक पटना जाने का बात । कुछ समझ नहीं आया उसे ……

ज्यादा सोचो मत , तुम सामान पैक करो । मैं तब तक पटना की टिकट करवाता हूँ । और मलाना का टिकट कैंसिल करवाता हूँ - राकेश ने टटुआ को कहा ,

पर - टटुआ कुछ पूछना चाहता था ,

तुम्हारे सारे सवालों का जवाब मैं रास्ते में दूँगा , रात के आठ बजे की फ्लाइट है - राकेश ने कहा ,

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राकेश और टटुआ दोनों फ्लाइट में बैठे हुए है । टटुआ अभी भी परेशान है ।

राकेश भईया , आप कुछ बता क्यों नहीं रहे है । यह इतनी जल्दबाजी में घर जाने का प्लान , कुछ समझ नहीं आया - टटुआ अपनी बेचैनी राकेश के सामने रख दी थी ,

तुमसे किसने कह दिया की मैं घर जा रहा हूँ - राकेश ने कहा ,

तो फिर पटना क्यों - टटुआ ने पूछा ,

एक ऐसे इंसान से मिलने जा रहा हूँ , जो मेरे जीवन में काफी महत्व रखते है । आज उनका अंत समय आया हुआ है । इसलिए मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ । मैं नहीं चाहता की समाज के ठेकेदार सब उनपर राजनीति करे - राकेश ने कहा ,

कौन है वह व्यक्ति - टटुआ ने सवाल किया ,

लाल चच्चा - राकेश ने कहा ,

लाल चच्चा , यह कौन है - टटुआ ने पूछा ,,

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बिहार में मिथिला को हमेशा से उपेक्षित के नज़रो से देखा गया । कितनी सरकारें आयी और गयी , पर किसी ने भी मिथिला के विकाश के तरफ ध्यान नहीं दिया । जिसका फायदा समाज के गलत तत्व के लोगों ने उठाया । हम लोग के गाँव में आये दिन डैकैती होती थी । लूट - पाट , हिंसा , आये दिन किसी की हत्या । इन सब से परेशान हो कर दादाजी की पीढ़ी के जितने भी लोग थे सब अपने गाँव से पलायन करने लगे । यह वह समय था जब पूरा मिथिला प्रदेश पलायन करने पर मजबूर था । मिथिला में स्थिति बद से बदतर होते जा रही थी । इस कारण मेरे दादाजी और उनके समय के सभी लोग गाँव छोड़ कर पटना में आ कर बस गए । शहर में सुरक्षा की भावना थी , लोगों के पास रोज़गार था ।

मेरा गाँव बिहार में मधुबनी ज़िला में एक छोटे से गाँव जिसका नाम रामपट्टी है । मेरे दादाजी दो भाई हुआ करते थे । दादाजी को तीन बेटे और दो बेटियाँ हुई । और दादाजी के बड़े भाई को दो बेटे और दो बेटियाँ हुई । दादाजी के बड़े भाई का बड़े बेटे का नाम “रमाकांत कर्ण” है , जिसे गाँव में हमारी पीढ़ी के लोग उन्हें “लाल चच्चा” के नाम से बुलाती है ।

श्यामला रंग , कद लगभग छः फ़ीट , शरीर एकदम गठीला । अपने कॉलेज के दिनों में वह फुटबॉल टीम के प्लेयर थे । साहित्य में जबरदस्त रूचि थी । बहुत सारे नाटक में उन्होंने हिस्सा भी लिया ।

लाल चच्चा के स्वभाव में काफी अपनापन था , वह बच्चो के साथ बच्चे बन जाते थे । पर चाची धीर गंभीर व्यक्तित्व की थी । अपनापन चाची में भी था , पर वो काफी शांत थी । लाल चच्चा को दो बेटा और एक बेटी थी।

शुरू में दादाजी और उनके भाई पटना के कंकड़बाग के तरफ एक किराए के मकान में रहने लगे । समय के साथ दादाजी के पीढ़ी का अंत हो गया ।

अब घर में सबसे बड़े थे “लाल चच्चा” सब उनकी बात बड़े प्रेम और आदर के भाव से मानते थे । वह रोज़ शाम को घर के सभी बच्चे को पढ़ाते थे । वह सभी से एक सामान प्रेम भाव रखते थे । पर मुझे लगता था की वह मुझे बाकी सब से अधिक मुझे मानते थे । इसी कारण मैं एक बार दो दिन उनका दिया गृह-कार्य(होम वर्क) कर के नहीं गया । पहले दिन तो उन्होंने कुछ नहीं कहा , पर दूसरे दिन दंड स्वरुप मुझे चार छड़ी की मार मेरे हथेली पर पड़ी । रोज़ शाम को पढ़ाने के बाद वह सभी बच्चे से कबीर , रहीम के दोहे पढ़वाते थे और खुद उसका मतलब समझाते थे ।

मुझे कभी भी कोई दोहा याद नहीं रहता था । बस एक ही दोहा जुबाँ पर हमेशा थी । शायद वो हमेशा के लिए याद हो गयी थी । तो जब मेरी बारी आती , तो मैं वो दोहा सुना देता था …

कबीरा खड़ा बाज़ार में , माँगे सबकी खैर ,,

ना काहू से दोस्ती , ना काहू से बैर ।।

उसके बाद वह मुझसे इसका भावार्थ पूछते । भावार्थ तो मैं याद ही नहीं किया था। तो बोल देते थे की याद नहीं है । तो लाल चचा बोलते की जिस दिन इसका भावार्थ याद कर लोगे तो कोशिश करना जीवन भर इसी पथ पर चलना । न किसी अधिक मित्रता और न किसी से दुशमनी ।।

समय बीत रहा था । गाँव से आये लोगों पर शहर का जीवन हावी हो रहा था । अब वो संयुक्त की भावना से नहीं , अपने अपने फायदे के हिसाब से सोचने लगे थे । सयुंक्त परिवार की अवधारणा टूटने लगी थी । इसी क्रम में अब सभी अपने अपने परिवार के साथ अलग अलग जगह पर जा कर बसने लगे थे ।

फिर भी सभी बच्चे समय निकाल कर लाल चच्चा से मिलने चले जाते थे । क्योंकि लाल चच्चा बच्चों लोग को तमाम तरह के खेल खिलवाते थे । मैं भी उनसे ही कैरम , चैस , ताश इत्यादि खेल सीखा ।

लाल चच्चा को जानवरों से हमेशा लगाव था । मैं जब भी उनके यहाँ जाता तो कोई न कोई जानवर उनके घर में रहता ।

2004 में , मैं उनके साथ दरभंगा गया हुआ था । साथ में उनका पालतू कुत्ता “रमैया” भी था । बरसात का दिन था । रात में एकाएक मेरी नींद खुली मैं अपने आप को लाल चच्चा के कंधों पर पाया । और लाल चच्चा के कमर तक पानी ही पानी था । वह किसी तरह मुझे अपने कंधों पर उठाये सुरक्षित जगह की तलाश में आगे बढे जा रहे थे । दो घंटे के बाद हम लोग को सुरक्षित स्थान मिला । मैंने उनसे पूछा की रमैया कहाँ है ?

तो उन्होंने जवाब दिया की इस बाढ़ में केवल वो मुझे ही बचा सके । सुबह तक सबको यह पता चल चुका था कि रात में नेपाल ने अपना बाँध खोल के पानी भारत में छोड़ा है । जिसका सीधा असर मिथिला के नदी “कमला बलान” पर आया और इस कारण पुरे मिथिला बाढ़ के चेपट में आ गया । हम लोग एक हफ्ते तक उस मुश्किल स्थिति में रहे । रोज़ हेलीकाप्टर से चुरा , सत्तू और तमाम जरुरी सामान फेकां जाता । और नीचे ज़मीन पर उस सामान पाने के लिए भगदड़ मच जाती । लाल चच्चा मेरे लिए सत्तू किसी तरह से ले आते । मैं काफी उदास रहता , मैं रोज़ भगवान से यही मनाता की यह हम लोग का अंत ना हो । और पटना पहुँचने से पहले रमैया किसी तरह वापस आ जाये। मुझे अभी भी उसके ज़िन्दा होने का भ्रम था । दस दिन तक हम लोग उसी हाल में थे। मैं और लाल चच्चा पटना किसी तरह वापस आ गए थे , पर रमैया नहीं लौट पाया। वो कभी नहीं लौटा।

पटना पहुँच के पता चला की इस बाढ़ में लगभग आठ सौ से ज्यादा आदमी की जान गयी थी , तीन हज़ार के लगभग जानवरों की जान गयी थी । और तक़रीबन पाँच हज़ार से ज्यादा लोग अपने जगह से पलायन कर चुके थे । यह स्तिथि भयावह थी । उस तीन हज़ार जानवर में से एक लाल चच्चा का रमैया भी था ।

मेरे समाज में हर गाँव में एक “समाज अगुआ” होता है । असल में यह एक पद है । जिसका काम होता है यह देखना की उसके समाज के लोग समाज के बनाये नियमों पर चल रहे है कि नहीं । जो भी समाज के बनाये नियमों को तोड़ता तो उसे समाज अगुआ के तरफ से दण्डित किया जाता । कभी कभी समाज निकाला भी दिया जाता ।

समय के साथ लाल चच्चा अपनी बेटी की शादी किये । सब खुश थे । पर काल की गति को आज तक कौन जान सका है । शादी के सात साल बाद ही लाल चच्चा के दामाद का आकस्मिक देहांत हो गया । यह पल लाल चच्चा और उनके पूरे परिवार के लिए दुखद था । सबको हिम्मत देने वाले लाल चच्चा आज खुद अंदर से टूट गये थे । मुझे उस समय पहली बार एहसास हुआ की लाल चच्चा भी एक आम इंसान है । कोई भी माँ बाप तभी खुश रह सकता है , जब उनके बच्चे ख़ुशी से अपना जीवन व्यतीत करे । पर लाल चच्चा को गहरा शोक लगा था । इस दर्द में उनका पूरा परिवार समाज से कटने लगा था । समाज में किसी के यहाँ कोई आयोजन होता तो केवल उनके दोनों बेटों में से कोई एक चला जाता , और जल्द से जल्द उस आयोजन से चला जाता । समाज लाल चच्चा और उनके परिवार को भुलाने लगा था ।

इन सब के बीच मेरी कॉलेज की पढाई चल रही थी । और मुझे कॉलेज में एक लड़की से प्यार हो गया था । उसका नाम “नीरजा” था । मैं उससे शादी करना चाहता था । यह बात मैंने अपने घर वालों को बताई । पर घर वाले इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुए । मेरे पिताजी और उस समय के समाज अगुआ “विजय कर्ण” ने नीरजा के घर जा कर उसके माँ बाप को बुरी तरह से बेज्जत कर आये । मैंने फैसला किया कि मैं और नीरजा भाग कर शादी कर लेंगें । भागने का फैसला मैं कर चुका था । भागने से पहले मैं लाल चच्चा से मिलने गया , और उन्हें अपना फैसला सुना दिया । तब लाल चच्चा ने मुझे समझाया की मेरे इस फैसले से मेरे परिवार पर मुसीबत आ जायेगी , और शायद मेरे परिवार को समाज निकाला भी मिल सकता हैं । मैंने बहुत सोच विचार कर अपना फैसला वापस ले लिया । पर मेरा मन अपने समाज और लोगों से उचट गया था । मैं पटना से भाग गया और सीधे पहुँचा धनबाद । वहाँ पर मैं ब्लड माफिया के साथ काम करना शुरू कर दिया । इसमें मैंने बहुत पैसे कमाये । पर यह पैसा गलत तरीके से कमा रहा था । कुछ ही दिनों में कानून के हाथ ब्लड माफिया तक पहुँच गयी । बड़ी बड़ी मछलियाँ कानून के गिरफ्त में थी । मैं छोटी मछली था , इसलिये मैं बच गया , और वहाँ से मैं सीधे दिल्ली भाग गया । वहाँ प्राइवेट हॉस्पिटल में काम करने लगा ।

एक दिन लाल चच्चा का फ़ोन आया । और फ़ोन पर उन्होंने बताया की उनके बड़े बेटे यानि “नवनीत भईया” की शादी होने वाली है । उनके आवाज़ में ख़ुशी थी । मैंने उनसे वादा किया कि मैं नवनीत भईया की शादी में जरूर आऊँगा । मैं शादी में गया , शादी बड़े धूम धाम से हुई । नवनीत भईया और प्रभा भाभी की जोड़ी देखते ही बन रही थी ।

लाल चच्चा के घर में ख़ुशी दुबारा लौट आयी थी । वो लोग दुबारा समाज से जुड़ने लगे थे । मन में ख़ुशी था कि पुराने वाले लाल चच्चा दुबारा दिख रहे थे । यह शायद प्रभा भाभी के घर में आने का ही असर था शायद । घर की लक्ष्मी बन कर आई थी वो । और दुबारा सब को एक कर दी थी ।

नवनीत भईया के शादी के बाद मैं दुबारा दिल्ली लौट चूका था । समय का चक्र एक बार फिर घुमा ,,

लाल चच्चा का फ़ोन एक बार फिर आया । फ़ोन पर उन्होंने बताया की उनके छोटे बेटे “नवीन भईया” को दिल्ली AIMS में दिल का इलाज करना है । सो वो लोग दिल्ली आना चाहते थे । मैंने उन्हें आश्वासन दिया की वो लोग बेफिक्र हो कर आइये , मैं सब अरेंजमेंट कर लूँगा ।

एक हफ्ते के बाद लाल चच्चा , नवनीत भईया और नवीन भईया दिल्ली में थे । दूसरे दिन नवीन भईया हॉस्पिटल में भर्ती थे । शाम के छः बजे उनका पेसमेकर का ऑपरेशन होने वाला था , और ऑपरेशन होने के बाद चौबीस घंटे के लिए आब्जर्वर रूम उनको रहना था। पर उनका ऑपरेशन रात के आठ बजे शुरू हुआ । और ऑपरेशन के बाद उनको आब्जर्वर रूम में रख दिया गया ।

रात में नवनीत भईया हॉस्पिटल के कंपाउंड में एक कुर्सी पर बैठ कर सो गए । मैं और लाल चच्चा हॉस्पिटल घूम रहे थे । तो मैं भी बहाना बना कर हॉस्पिटल से निकल गया , और बाहर आ कर सिगरेट पीने लगा । सिगरेट पी कर जब अंदर आया तो लाल चच्चा वहाँ नहीं थे , तो मैं नवनीत भईया के बगल में जा कर बैठ गया । दो घंटे बाद लाल चच्चा का फ़ोन आया और वो फ़ोन पर बोले की जल्दी से तुम और नवनीत यहाँ ORBO के पास आ जाओ ।

मैं हॉस्पिटल लाइन से जुड़ा व्यक्ति हूँ , मुझे ORBO नाम सुन कर अजीब लगा । ORBO - Organ Retrival Banking Organisation . यह AIIMS का ही एक भाग है , जिसमे लोग मरने के बाद स्वेच्छा से अपना शरीर दान कर देते है । इसके लिए उस व्यक्ति को अपने जीवन काल में ही इस संस्था में आ कर अपना नाम रजिस्टर्ड करवाना होता है । उसके बाद यह संस्था उस व्यक्ति को तमाम कागजात और एक कार्ड मुहैया कराती है । और वो कार्ड उस व्यक्ति को अपने पास चौबीस घंटे रखना पड़ता है । ताकि किसी परिस्थिति वस उस व्यक्ति के साथ अनहोनी होती है तो उस मृत शरीर निकटतम मेडिकल कॉलेज तक पहुँचा दिया जाये या कार्ड पर लिखे टेलीफोन नंबर पर संपर्क कर के उनका दिशा निर्देश पालन करे । मृत शरीर को अग्नि समर्पित नहीं करना है । उस व्यक्ति के अंग से किसी का कल्याण हो जाए । मृत शरीर पर पूर्ण अधिकार इस संस्था का हो जायेगा । और उनका फैसला अंतिम माना जायेगा ।

मैंने नवनीत भईया  को नींद से उठाया और उनको रास्ते में सब बात बता दिया । हम दोनों  लाल चच्चा के पास पहुँच चुके थे ।

लाल चच्चा - मैंने फैसला किया है की मैं अपना शरीर मरणोंपरान्त इस संस्था को दान कर दूँगा ,

यह बहुत चौंकाने वाला बयान था । न ही मैं इस चीज़ के लिए तैयार था , और ना ही नवनीत भईया ।

पर क्या आप इस संस्था के सभी नियम - कानून जानते है - मैंने पूछा ,

हाँ मैंने सब पता कर लिया है - लाल चच्चा ने कहा ,

पर आप यह करना क्यों चाहतें है - मैंने एक और सवाल किया ,

यह बात मैं समय आने पर तुम्हें बता दूँगा - लाल चच्चा ने कहा ,

ठीक है , लेकिन इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं । आप पहले अपने घरवालों से बात कीजिये । उन्हें अपने विश्वास में लीजिये , तब जा कर यह “अंगदान” वाला फैसला लीजिएगा - मैंने कहा ,

हाँ पापा , मैं आपके फैसले के साथ हूँ । पर राकेश ठीक कह रहा है , इस बारे में घर के सभी लोग को पता होना चाइए - नवनीत भईया ने कहा ,

ठीक है , जैसा तुम लोग कह रहे हो , वैसा ही करते है - लाल चच्चा ने कहा ,

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दूसरे दिन मैंने लाल चच्चा से पूछा - जीवन का इतना बड़ा फैसला आपने बिना सोचे समझे ले लिया । क्या आपको अपने समाज और समाज अगुआ का डर नहीं है ?

मेरे शरीर पर पूर्ण अधिकार मेरा है । इससे समाज और समाज अगुआ को क्या लेना देना । और जब मैं बुरा दौर से गुज़र रहा था , तब कौन सा समाज मुझे देखने आया था । मैं हमेशा इंसान को बंधनमुक्त जीवन जीने पर बल दिया है । किसी के प्रभाव में जीवन जीना बेकार है - लाल चच्चा ने कहा ,

उनका एक एक शब्द मुझे अंदर से हिला दिया था । एक लाल चच्चा हैं , जो अपना शरीर दूसरे को दान में देने के लिए तैयार है । और एक मैं हूँ जो लोगो के खून का धंधा करता था ।

पर एक बात बताइये , जब मैं आपके पास आया था , यह बताने के लिए की मैं नीरजा के साथ भाग कर शादी करने वाला हूँ । तब आप ही ने मुझे समाज की दुहाई दी थी , और मुझे वह कदम उठाने से मना कर दिया था - मैंने पूछा ,

अगर तुम भाग कर शादी करते तो इसका सीधा असर तुम्हारे परिवार पर पड़ता । तुम्हारे बाकी भाई बहन का ज़िन्दगी बर्बाद हो जाता । पर मेरा क्या है मैं अपने जीवन के सभी जिम्मेदारी निभा चुका हूँ , मेरे सभी बच्चे अपने अपने जीवन में सेटल हो चुके है - लाल चच्चा ने कहा ,

मैं उनकी बात का अर्थ जान चुका था । ।

चार दिन बाद लाल चच्चा , नवनीत भईया और नवीन भईया पटना के लिए निकल चुके थे । जाते वक़्त लाल चच्चा ने मुझसे कहा कि वो एक महीने बाद दुबारा आएंगे और अपने फैसले को मूर्त रूप देंगे । मैं जानता था लाल चच्चा अपने वादे के हमेशा से पक्के रहे है । यानि वो जरूर एक महीने बाद आएंगे ।।

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एक महीने बाद लाल चच्चा , नवनीत भईया और लाल चच्चा के एक मित्र वापस दिल्ली आएं थे । हम सब ORBO में जा कर लाल चच्चा के द्वारा बनवाया गया एफिडेविट जमा किये । उसके बाद तमाम कागजी कारवाई हुई । लाल चच्चा को ORBO के तरफ से एक कार्ड दिया गया , जिसमे दो गवाह के हस्ताक्षर चाइए था । तो पहला गवाह नवनीत भईया और दूसरा गवाह लाल चच्चा के मित्र बने । आज के बाद लाल चच्चा को यह कार्ड अपने साथ चौबीस घंटे रखना था । ।

मुझे यह एक युग परिवर्तन वाला कदम लग रहा था । आज लाल चच्चा के लिए मेरे दिल में और इज़्ज़त बढ़ गयी थी ।

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इसी बीच मेरे घर से मुझे शादी करने का दवाब बनाया जाने लगा । और इसी कारण से मैं दिल्ली छोड़ दिया । जगह जगह घूमने लगा । इसी घूमने के क्रम में मेरी मुलाकात तुमसे(टटुआ) से हुई । मैं नीरजा को भूल नहीं पा रहा था । मैं अपना पुराना जितना कॉन्टेक्ट्स था , सब को अपने जीवन से हटा दिया था । केवल नवनीत भईया से कांटेक्ट में था , ताकि लाल चच्चा के अंतिम समय की जानकारी मुझे मिल सके ।

उस दिन सुबह नवनीत भईया का ही मेल आया था , की लाल चच्चा का अंत नज़दीक है । इसलिए मैंने मलाना का ट्रिप कैंसिल कर के पटना आ गया ।

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राकेश और टटुआ की फ्लाइट पटना एयरपोर्ट पर लैंड कर चुकी थी । दोनों वहाँ से टैक्सी कर के सीधे लाल चच्चा के यहाँ गए ।

लाल चच्चा के यहाँ काफी भीड़ थी । समाज के सभी लोगों का जमघट लगा हुआ था । राकेश के परिवार के सभी लोग वहाँ मौजूद थे । सभी आश्चर्य थे राकेश को देख कर , उसके रूप को देख कर । सात साल बाद राकेश को उसके परिवार और समाज के लोग देख रहे थे  समाज अगुआ “विजय कर्ण” भी वहीं मौजूद थे । न राकेश कभी विजय कर्ण को पसंद किया और न ही विजय कर्ण कभी राकेश को ।

आधे घंटे बाद लाल चच्चा ने अपनी आखिरी सांस ली । वह इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे । सभी लोग के आँखों में आसूँ आ चुके थे ।

चलो चलो लाल भाई के अंतिम संस्कार की तैयारी करो - विजय कर्ण ने कहा ,

रिशते में विजय कर्ण लाल चच्चा का भाई लगता ।

जी नहीं लाल चच्चा का अंतिम संस्कार नहीं होगा । उनका पार्थिव शरीर दान में जायेगा - राकेश ने कहा ,

तुम होते कौन हो मुझे समझाने वाले - विजय ने कहा ,

तुम जैसे को औकाद दिखाने वाला हूँ - राकेश ने भी तैस में कहा ,

ये देखो , एक गंजेड़ी , नशेड़ी मुझे एक समाज अगुआ को उसका औकाद दिखायेगा - विजय ने राकेश का उपहास उड़ाते हुए कहा ,

हाँ , इनका अंतिम संस्कार नहीं होगा । लाल चच्चा की आखिरी इच्छा यही थी की उनके मरने के बाद उनका शरीर दान में दे दिया जाए - राकेश ने कहा ,

तुम्हारे पास क्या सबूत है - विजय ने पूछा ,

तब तक नवनीत भईया और नवीन भईया ORBO संस्था के सभी कागज़ ले कर बाहर आ चुके थे ।

और मेरे पास लाल चच्चा की एक चिट्ठी है , जो उन्होंने मुझे लिखा था - राकेश ने कहा ,

राकेश ने वो चिट्ठी निकाल कर सभी के सामने पढ़ने लगा ।

प्रिय राकेश ,

              बिना इधर उधर की बातें किये बिना सीधे मुद्दे पर आता हूँ । एक कटु सत्य - जीवन नश्वर है । जो इस धरा पर आया है , उसे कभी ना कभी यहाँ से लौटना है । यह बात सब जानते है । रही बात मुद्दे की तो एक बात तुमको बता दूँ की किसी यतार्थ और अपने अंत: करण से प्रभावित होकर मैंने अपना अंग दान कर दिया है , ORBO (AIIMS) के माध्यम से ।

                                        अब तुम्हारे मन में यह सवाल होगा की यह फैसला मैंने क्यों लिया । जब मैं नवीन को लेकर दिल्ली में इलाज करा रहा था , तो खली समय में आदतन यायावर की तरह घूमता रहता था । वार्ड में भर्ती छोटे छोटे बच्चों की अवस्था , उनके असहाय अभिभावक के चेहरे के मनोभाव , निश्छल बच्चों के प्रति मेरा स्नेह मुझे स्वतः इसके लिए उद्वेलित कर गया । दूसरा विकट परिस्थिति में जीवन के अनेकानेक मोड़ पर निस्वार्थ भाव से लोगों ने मेरी सहायता की है , मेरा जीवन बचाया है , उसी का क़र्ज़ उतरने का एक ये प्रयास है । अनेक बार रक्तदान भी उसी का एक कारण है । मगर मैं इन सब को ज्यादा जगजाहिर नहीं किया ।

                                                   तुमको इस लिए बता रहा हूँ , की मेरे मरने के बाद किसी को कोई उपापोह ना हो । मेरे मृत्य शरीर को अग्नि समर्पित नहीं करना है । हो सकता है मेरे अंग से किसी का कल्याण हो जाए । यह मानव कल्याणार्थ है ।


तुम्हारा ,

लाल चच्चा

।।।

यह चिट्ठी लाल चच्चा ने दिल्ली से पटना आने के बाद लिखे थे । और यह चिट्ठी उन्होंने केवल मुझे ही नहीं , वह यह चिट्ठी नवनीत भईया और नवीन भईया दोनों को लिखे थे - राकेश ने कहा ,

और आज अगर , किसी ने इस चीज़ को होने से रोका तो मैं उसके खिलाफ कानून का सहारा लूँगा । और समाज के नियम के धौंस मत दीजियेगा । आपका समाज उस वक़्त कहाँ था जब लाल चच्चा का पूरा परिवार मुशकिल दौर में था । तब आपका समाज अँधा बना हुआ था । एक परिवार में कोई लड़की जन्म ली , बीस साल तक समाज के ठेकेदार को कोई मतलब नहीं होता । लेकिन जैसे ही वो बीस साल पर हुई वो समाज की बेटी हो गयी , उसके माँ बाप से ज्यादा फ़िक्र समाज के ठेकेदारों को हो जाती है । कभी उसकी ज़िन्दगी भी देख लो , तब समाज अगुआ बना कीजिए - राकेश ने यह सब बात विजय को सुना कर कहा ,

और विजय, आप यह मत भूलिए की आपको भी एक बेटा और एक बेटी है । क्या पता किसी दिन वही आपकी जगहँसाई करा दे । मेरी ज़िन्दगी तो आप बर्बाद कर ही चुके है , अपने घर पर ध्यान दीजिए - राकेश ने विजय से कहा ,

।।

हाँ राकेश भईया सही कह रहे है । लाल चच्चा की आखिरी इच्छा को पूरा किया जायेगा - बिट्टू ( विजय का बेटा ) ने कहा ,

धीरे धीरे सभी राकेश के साथ हो गए । राकेश और नवनीत खुश थे की इस पीढ़ी के सभी उसके साथ थे । विजय एकदम मौन हो गए । उनके अहम् को जबरदस्त चोट पहुँची थी ।

कुछ ही देर में लाल चच्चा के पार्थिव शरीर को ORBO वाले के अंतर्गत जो नजदीकी अस्पताल थी , वो लोग आ कर लाल चच्चा के पार्थिव शरीर को अपने साथ ले गए । जाते वक़्त उन्होंने लाल चच्चा के पार्थिव शरीर से “नाख़ून और कुछ बाल” नवनीत भईया को दे दिए , ताकि इन सब चीज़ों से लाल चच्चा का अंतिम क्रिया कर्म किया जा सके ।

।।।

भईया , मुझे लाल चच्चा की एक डायरी और उनकी संग्रह की किताब में से एक किताब मुझे दे दीजिए । मैं कल सुबह निकल जाऊँगा - राकेश ने नवनीत को कहा ,

रुक जाओ बेटा , हम सब को माफ़ कर दो । तुम जिस लड़की से बोलोगे हम तुम्हारी उससे शादी करवा देंगे - राकेश की माँ ने रोती हुई बोली ,

हा हा हा , तुम मेरी शादी नीरजा से अब करवाने के लिए तैयार हो गयी हो । पर अब क्या फायदा , जो इस दुनिया में अब है ही नहीं उससे आप मेरी क्या शादी करवाओगी - राकेश ने सब कुछ बोल दिया ,

इस सच के बारे में कोई नहीं जानता था । टटुआ , नवनीत और राकेश की माँ सब हैरान थे ।

मैं कल सुबह निकल जाऊँगा - राकेश ने कहा ,

पर जाओगे कहाँ - नवनीत ने पूछा ,

हम दोनों खानाबदोश है , कहीं न कहीं चलते ही रहेंगे - राकेश ने टटुआ के तरफ इशारा करते हुए कहा ,

वो तो ठीक है , लेकिन तुम्हारी अगली मंजिल कहाँ है - नवनीत ने पूछा ,

“मलाना”......
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( नोट - मिथिला में “चाचा” शब्द का उच्चारण “चच्चा” बोल के किया जाता है । )
।।।
लेखक - अभिलाष कुमार दत्त

 



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