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@dawriter

रिजल्ट

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mrinal

बारहवीं का रिजल्ट आने वाला था। जितनी बेचैनी सुरभि के मन में थी, उससे कहीं अधिक उसके पिता के मन में चल रही थी। दंगे की आशंका के कारण इंटरनेट पर प्रशासन ने रोक लगा रखा था। अख़बार वाला भी दो तीन से नहीँ आ रहा था। सब इस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे कि शहर से किसी का फ़ोन आये ।

सुरभि चाह रही थी कि किसी तरह अपने स्कूल में टॉप कर जाये ताकि माँ और पिताजी उसे शहर के किसी अच्छे कॉलेज में नाम लिखा दें। पति को चिंतित देख कर मुक्ता खुश थी। गांव में कौन अपनी बेटी के बारे में इतना सोचता है।

इधर प्रभाकर जी के मन में कुछ और ही चल रहा था। उनको विश्वास था कि बिटिया टॉप जरूर करेगी। किन्तु वह चाहते नहीं थे कि बिटिया टॉप करे। कैसे अपने बिटिया को बताए कि वो इस हालत में नही है कि उसको पढ़ने के लिये शहर भेज सकें। इस प्राइवेट नौकरी में ये असंभव सा ही तो है। ऊपर से माता-पिता की बीमारी ने तो जीना ही मुहाल कर रखा है।

अचानक मिश्राजी मिठाई का डिब्बा लेकर आ गये। प्रभाकर जी, मुंह मीठा कीजिये। बिटिया, स्कूल में टॉप की है। सुरभि ख़ुशी से चहक उठी और सबको प्रणाम करने लगी। बधाइयों का ताँता लग गया।

पिता की चेहरे पर तैरते खुशियो के पीछे छुपे गम को पढ़ने में सुरभि को ज्यादा समय नही लगा। उनको पुकारा, "पिताजी"। प्रभाकर जी पीछे मुड़े। आप चिंता न करें। मैं प्राइवेट से ही ग्रेजुएशन कर लुंगी। घर से ही प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करूँगी। साथ में बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाऊंगी। आपकी परेशानियों को मैं नही समझूँगी तो कौन समझेगा। अब मैं बड़ी हो गयी हूँ। बिटिया के इन शब्दों ने पिता की निःशब्द कर दिया। गले से लगा कर रोने लगे। पर ये ख़ुशी के आँसू थे।



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