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@dawriter

पिता के रंग

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

पिता उस छेनी और हथौड़े की तरह होते हैं जो खुद के चेहरे की उदासी छुपा कर चोट करते हैं , इतनी चोट जो तुम जैसे पत्थर को नायाब मूर्ती में तराश दे | हर प्रहार के बाद खुद छिटक कर पीछे आते हैं क्योंकी तुम्हारा कराहना उनसे नही देखा जाता पर वो फिर भी प्रहार करते हैं क्योंकी उन्हे देखना है तुमको चमकते हुये सबसे बेहतर |
हॉस्टल के लिये घर से निकलते वक्त याद है तुम्हे बॉय बोल के अन्दर चले गये थे | उसके बाद माँ ने हज़ार रूपये अलग से छुपा कर तुम्हे दिये | जानते हो माँ को पापा ने ही दियो थे वो पैसे की मैं दूँगा तो वो खर्च देगा पर तुम दोगी तो मुश्किल वक्त तक संभाल कर रखेगा तुम्हारी निशानी समझ कर | और सुनो वो अन्दर इसलिये चले गये थे क्योंकी तुम्हे जाते देखना उन्हे कभी पसन्द नही था | तुम्हारे जाते ही रोने लगे थे , तुम्हारे सामने रोते तुम टूट जाते ना इसलिये |
और ये भी जान लो जो सिगरेट छुपा कर पीते हो ना उसके बारे में भी वो जानते हैं | बाप है ! बेटा तेरा , माचिस जलाने ढंग से जान गये की बेटा बिगड़ रहा है | पर वो समझदार हैं जानते हैं आदत बन गई है अभी डर के कम पीते हो जब जान जाओगे की उन्हे भी पता है तो खुल के पीओगे |
वो याद है उस दिन अचानक शाम को फोन किया था तुम्हे और कड़क सी आवाज़ में पूछा था की कहाँ हो , होस्टल नही पहुँचे , जल्दी पहुँचो | वो ना कुछ देर पहले ही तुम्हारे होस्टल के शहर की कोई खबर पढ़ ली थी खून खराबे वाली | वो फोन महज़ एक फोन नही वो उनकी फिक्र थी ये जानना चाहते थे की तुम ठीक हो ना |
तुम भी सुनों नये ज़माने का हल्ला मचाने वाली लड़कियों , वो तुम्हारे बढ़ी गाढ़ी निकले हुये पेट वाले पापा , जो तुम्हे लड़कों के साथ घूमने , रात को बाहर जाने , फोन ज़्यादा ना चलाने , इन सब से रोकते हैं , वो किसी ज़माने में जवान थे स्मार्ट एकदम , उन्होंने लड़कों की सोच को जीया है उन्हे पता है की लड़कियों का इन छुपे भेड़ियों के बच्चों से बचाव करना कितना ज़रूरी है | उनका टोकना रोकना सिर्फ तुम्हारी सुरक्षा का एक तरीका है |
ऑफिस बाबू ! छोटी सी बात तुम भी सुन लो | ये जो हर महीने गाँव कुछ हज़ार का चेक भेज कर समझते हो ना की बेटे का फर्ज़ अदा कर लिया , तो समझ लो इस बात को की बूढ़ा बाप हर महीने ये दुआ कर रहा है की इस महीने पैसे ना भेज कर काश बबुआ खुद चला आता | कुछ देर बोल बतिया लेता | साथ में पोती और बहू को भी ले आता | एक दो दिन के लिये ही आ जाये | पर वो अपने मुँह से कैसे कहे | स्वाभिमान भईया , स्वाभिमान | जानते हैं कब तक जड़ों से कट कर रहेगा कभी तो लौटेगा |
पिता के समान कोई मित्र नही , कोई शुभचिंतक नही , कोई आलोचक कोई प्रशंसक नही | ये हमने तब भी समझा जब वो साथ थे और आज भी जान रहे हैं जब वो नही हैं | तुम नही जानते तो जान लो , फिर ना कहना देर कर दी सनम आते आते |
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धीरज झा…



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