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@dawriter

देश तब मरता है !

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sunilakash by  
sunilakash

 

गीत---
देश तब मरता है !
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काम चल जाता हो जब बातों-ख्यालों से।
जूझना पड़ता न हो रोटी के सवालों से॥
मजदूर का पसीना जब खेत में नहीं,
बिस्तर में झरता है।
देश तब मरता है॥1॥

मुटठियों को तान मुँह से आग बरसाता फिरे।
सड़कें शहर की नापता जूते चटखाता फिरे॥
नौजवान देश का जब श्रम नहीं,
आंदोलन करता है।
देश तब मरता है॥2॥

अपने प्रियजन को देखके भी जबरन हँसना पड़ता हो।
दिल तो धक से रह जाये और अभिनय करना पड़ता हो॥
मेहमान को घूरता गृहस्वामी,
दाँतों से होंठ कुतरता है।
देश तब मरता है॥3॥

जब युवा फिरे बेकार और बीवी की रोटी खाये।
बाबू दफ्तर तब पहुँचे जब अफसर घर को जाये॥
भिखमँगा सीने पर चढ़कर,
भीख वसूला करता है।
देश तब मरता है॥4॥


---सुनील आकाश



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