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@dawriter

झूठी कहानी

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dhirajjha123 by  
dhirajjha123

” करीम भाई ईद मुबारक होए । आज त आपहीं के इहाँ खाना होई । ” रामसहाए सुरती रगड़ कर ताल मारते हुए करीम भाई की दुकान की तरफ बढ़ते आ रहे थे ।
” आपको भी ईद मुबारक राम भाई । ना ना हमरे इहाँ खाना वाना ना मिली । हम लोग काफीरों को खाना का पानी तक नही पूछते । खाना खाए के होई त अल्हा हू अकबर बोले के पड़ी । ” करीम भाई काऊँटर से उठ कर हँस के रामसहाए को गले लगाते हुए मखौल में बोले ।
” लिजिए त इसमे कौन सा बड़ा बात है । अल्लाह हू अकबर हो या हर हर महादेव कुछो कहिए आवाज तो एके जगह पहुँचेगा । अल्लाह हु अकबर करीम भाई । ” रामसहाए ने भी बाहों को कसते हुए करीम भाई को सीने के और करीब दबाते हुए कहा ।
” क्या बात कहे हैं राम भाई । आपकी इन्ही बतों ने तो आपका मुरीद कर रखा है हमको । हर हर महादेव राम भाई । अब आईए बईठते हैं आपकी दावत कब से आपके इंतज़ार मे है । ” करीम भाई ने भी मन की खुशी को ज़ाहिर करते हुए महादेव के जयकार का घोष किया और राम भाई के लिए पहले से मंगवाए टिफीन को खोलते हुए रामसहाए को बैठने का आग्रह किया ।
” हाँ बईठ तो जाते हैं पर देखिएगा बड़ा करेजी ना खिला दीजिएगा धर्म भ्रस्ट हो जाएगा । जात से पानी छटा जाएगा । ” रामसहाए फिर मखौल करते हुए बोले ।
” आप तो जनबे करते हैं पूरा परिवारे शाकाहारी है । पशु हत्या के खिलाफ़ हैं फिर बड़ा कलेजी का और छोटा का । ”
” अरे जानते हैं करीम भाई हम क्या पूरा सहर जानता है । चलिए अब हमारे मजाक की ऐसी तैसी ना करिए भोजन करिए । ” रामसहाए ने ये कहते हुए सेवई से भोग लगाना शुरू किया । और करीम भाई राम भाई को खाते हुए एक टक मुस्कुरा कर देखे जा रहे थे । जैसे अल्लाह महादेव को अपने घर भोग लगाता देख तृप्त हो रहे हों ।
करीम और रामसहाए के परिवार किसी ज़माने में कट्टर दुश्मन थे पर दुश्मनी धर्म मज़हब की नही ज़मीन की थी । रामसहाए के परबाबा की ज़मीन पर करीम भाई के परबाबा का कब्ज़ा था । आए दिन इसे लेकर विवाद हो जाता । और वावाद सालों तक चलता रहा । दोनो के परबाबा बुढ़ी अवस्था तक भी शरीर से पूरी तरह स्वस्थ और चुस्त थे ।
एक बार गाँव पर गंगा माई का परकोप हुआ । गाँव की छोटी सी नदी ने भयंकर रूप ले लिया था । आधे से ज़्यादा गाँव बाढ़ का ग्रास बन गया था । करीम के पिता तब कोई चार पाँच साल के थे । खेलते खेलते एक दिन नदी की चपेट में आगए । पास खड़े कुछ लोग चिल्लाए करीम के घर तक खबर पहुँची सब दौड़े करीम के परबाबा का पोता डूबा जा रहा था और कोई ना था जो गंगा माई से वैर लेता इतने में आकाश को चीरते हर हर महादेव के घोष के साथ ही छपाक से उस नदी के भयंकर धार में किसी के कूदने की आवाज़ आई । सब हक्के बक्के देखते रहे किसी को सूझ ही नही रहा था हुआ क्या है । तब तक नदी की धारों को चीरता हुआ एक बूढ़ा दिखा जिसके कंधों पर बेहोश बच्चा था । धाराओं को भी उस बूढ़े की हिम्मत का मान रखना पड़ा । बूढ़ा रामसहाए के परबाबा थे और कंधे पर वो बच्चा करीम के पिता । बाहर आते ही सबने बच्चे को लपक लिया । देखा तो साँसें चल रही थीं बस पेट में पानी भर गया था । वैध जी को बुलाया गया । थोड़ी देर में बच्चे को होश आगया । रामसहाए के परबाबा तब तक वहीं थे । करीम के परबाबा ने उनके पास जा कर नम आँखों के साथ हाथ जोड़ते हुए कहा ” ठाकुर जी आपका हमारा तो दुशमनी रहा फिर भी आप हमारे पोता को बचा लाए ? ” राम के परबाबा मुस्कुराते हुए बोले
” दुशमनी ज़मीन का है रहमान भाई बच्चों की जान का नही । बच्चे और जान सबकी एके जैसी है । और जमीन का झगड़ा तो भाई भाई में हो जाता है उसमे बड़ि बात नही । ”
रहमान बाबा ने उन्हे गले से लगा लिया । उनकी बातों ने ऐसा असर किया के झगड़ा ही खत्म हो गया । तब से आज तक परिवारों की दोस्ती कायम है और उन्हे देख पूरे जिले में धर्म का कोई हो हल्ला नही होता । दिवाली ईद सब बराबर है यहाँ ।

यह महज़ कहानी ही है मैं सच भी कहूँगा तब पर भी कहानी ही रहेगी । पर इस कहानी पर ऊँगली ना उठाऐं क्योंकी सच में तो ये प्रेम मरता जा रहा है कम से कम कहानियों में तो अल्लाह और महादेव का प्रेम बना रहे । धर्म या मज़हब सच्चा वही है जिसमे इंसान की जान और उसकी इंसानियत की कदर हो । जहाँ कदर नही वहाँ ना वो धर्म सच्चा है ना उस धर्म को मानने वाले ।



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