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@dawriter

जो हम फेंक देते हैं उसी का ना मिलना इनकी जान ले लेता है

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

आज माँ के हाथ का खाना खाने का मन नहीं कर रहा तो चलो बाहर चलते हैं दोस्तों के साथ । होटल में बैठ कर शाही पनीर चिली चिकेन बटर नान ये वो लटरम पटराम मंगाया जितना मन उतना खाया बाकि का छोड़ कर डकार ली और चल दिए । कभी कभी तो गुस्से में थाली उठा कर फेंक दी । सामने पड़े खाने को छुआ तक नहीं बाद में सब कचरे में फेंका गया । क्यों ? क्योंकी पता है अन्न की कोई कमी नहीं है । अभी नहीं खाया तो बाद में खा लेंगे मिल ही जायेगा घर में इतना है की ख़तम ही नहीं होगा, ख़तम हो भी गया तो बाहर से मंगा लेंगे जेब में पैसे तो हैं ही । क्यों भाई लोग सही है ना । ये हमारे वाला पहलू है जहाँ अन्न की कोई कमी नहीं है ।

अब आइए देखते हैं दूसरा पहलू । बिहार में मड़वन प्रखंड के बंगड़ी गांव में हरिंद्र साह की पंद्रह वर्षीय लड़की की मौत हो गई । हो गई तो हो गई भाई क्या नया है बहुत से लोग मरते हैं तो इसमें इतना खास क्या है । हाँ इंसानियत के नाते उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना कर सकते हैं… है भाई ये मौत अलग है ये उन मौतों जैसी नहीं है जो हमारी आँखों के सामने होती रहती हैं ये उन मौतों में से हैं जो होती तो हमेशा हैं मगर हमारे सामने नहीं आती हम देख ही नहीं पाते या हम देखना ही नहीं चाहते । ये और दुःख देने वाली बात है की इनके घर में अभी तक ऐसी मौत मरने वालो की संख्या 3 है । जानते हैं वो तीन मौतें कैसे हुई ? उसी खाने के ना मिलने की वजह से जिसे आप नकार देते हैं किसी न किसी बहाने से हर रोज़, हाँ उसे मारा है भूख नाम के उस हथियारे ने जिसका अहसास आपको उस हद तक कभी हुआ ही नहीं होगा जहाँ इसके असर से जान तक चली जाती है । 4 दिन से हरिंद्र के घर चूल्हा नहीं जला था । घर में अन्न का एक दाना नहीं था ।

गजब की बात है ना खुद को महाशक्ति कहने वाले देश में कोई भूख यार हद है भूख से मर जाता है और कोई ऐसा नहीं मिलता जो कुछ मदद कर सके । सरकार कोई भी हो पहले इसने कब जनता की सुनी है मगर हम तो सुन सकते थे ना हमारे जैसे तो कुछ मदद कर सकते थे । मगर हमने नहीं किया । अंतिम संस्कार के लिए सबने चंदा दिया मगर भूख को मारने के लिए कोई आगे नहीं आया, ऐसा क्यों ? भला कोई कैसे इस तरह कर सकता है । मैं नहीं जानता की इसके पीछे वजह क्या है मुझे बस खलता है नोचता है मुझे धिक्कारता है उस बच्ची का भूख से मर जाना । ये ऐसी मौतें किसी एक इन्सान की नहीं पूरी इंसानियत की होती हैं हर बार मरती है हमारे अन्दर की वो इंसानियत जिसके पास पहले ही बहुत कम सांसें बची हुई हैं ।

जब खबर फैली तब बोरे के बोरे अनाज घर पर भिजवाने लगीं राजनीतिक पार्टियाँ लोगों ने संस्कार के लिए पैसे भी दिए । अगर यही काम पहले हुआ होता तो शायद वो बच्ची और उसकी बहनें भूख से न मारतीं । हरेन्द्र दिव्यांग हैं घर में कोई कमाने वाला नहीं है । ये योजनाएं ये संस्थाएं ये सब बेकार हैं जब हम और हमारा समाज किसी को बचा नहीं सकता बस इस लिए की उसके पास खाने को नहीं है किसी बेसहारा परिवार को सहारा नहीं दे सकता । ये किसी खास का दोष नहीं है ये दोष हम सबका है ।

आप महसूस कर के देखिये आप आफिस में हैं आज सुबह खा कर नहीं आए और रात को घर जाते जाते तक ज़ोरों की भूख लगी है जबकि रात आपने दबा कर खया था दिन भर चाय बिस्कुट भी दबाया फिर भी भूख इतनी है की कुछ भी खालें मगर इन्होंने तो 4 दिन से नहीं खाया कुछ और ऐसे पहले भी न जाने कितने दिन काट चुके हैं । इनकी क्या हालत होगी आप महसूस भी नहीं कर सकते शायद । शायद वो बच्ची समझदार थी उसने सोच लिया था की उसके मरते ही लोग उसके परिवार का पेट भरने आ जायेंगे । जिंदा रहते हुए तो उस बच्ची के पेट को भूख से शांति तो मिल नहीं पाई कम से कम भगवान मरने के बाद उसकी आत्मा को शांति दें ।

किसी तरह का ज्ञान दे कर बेकार अपना वक़्त बर्बाद मत करियेगा, पढना भी कोई खास ज़रूरी नहीं । बस हो सके तो कहीं कभी आपके सामने कुछ ऐसा दिखे तो जरा भी हिचकियेगा नही । बाकि मैं तो एक भावुक सा मुर्ख हूँ दिल पर लग जाती है तो लिखे बिना रहा नहीं जाता ।

धीरज झा



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