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@dawriter

कौन आज़ाद है?

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14 अगस्त १९४७ - पाकिस्तान एक नया देश!

अश्वाक ने इधर उधर अच्छे से देखा, कोई उसकी तरफ तवज्जो रखता उसे न दिखा, उसने बड़े दरवाजे से ही बाहर निकला बेहतर समझा, बस घुल-मिल के निकल जाना था’ सारी जेल तो आज़ादी के जश्न में डूबी पड़ी थी!

अंग्रेज हिन्दुस्तान छोड़ने को तैयार हो गये थे, वाकई ख़ुशी की बात थी.... और ये ख़ुशी उसे अपनी बेटी के साथ मनाने से कोई नही रोक सकता था! जेल की चार दिवारियां तो हरगिज़ नहीं!

बस एक बात उसकी मोटी अक्ल में घुस नही पा रही थी, कि एक देश अलग हो रहा है! ‘देश भला अलग कैसे हो सकता है?’

‘क्या ज़मीन खिसका दी जाएगी? या समुंद्र में जहाज की तरहा उतार देंगे’

‘खुदा जाने कैसे देश अलग होता है? जैसे मैं अपनी बेटी से हुआ वैसे?’

लाहौर जेल में उसे चार साल होने को आ गये थे, उसका खुदा जानता है कि कैसे उसने एक एक दिन वहां सदियों सा बिताया था!

बस एक ही आस कि आज नहीं तो कल ये अंग्रेज़ देश से दफा होंगे और वो अपनी बेटी से मिल सकेगा! पर जेल वालों ने बताया कि रिहाई सिर्फ क्रांतिकारियों को ही दी जाएगी, गुनाहगारों को नही! उसका गुनाह तो वैसे भी जहन्नुम के बराबर समझा जाता था!
 
उसपर अपनी ही बेटी के साथ बलात्कार का आरोप था, और साथ ही तीन क़त्ल भी उसके ख़ाते में थे।

इसलिए उसने जेल से रफूचक्कर होने की ठान ली, जाने कौन सा दिन था, कौन सी तारिख थी कि लाहौर जेल में खबर आई,  आज़ादी मिल गयी है! अग्रेज वापस अपने मुल्क जा रहें है! हमें अलग मुल्क मिल गया है! इस्लामाबाद में झंडा भी फहराया गया है!

बस इसी रात अश्वाक ने भाग निकलने की ठान ली, अलग मुल्क मिलने वाली बात उसे खाए जा रही थी, उसकी जानकारी के मुताबिक तो वो हिन्दुस्तान में था.... अलग मुल्क मिलना मतलब उसे कहीं दुसरे मुल्क में ले जाने का बंदोबस्त चल रहा था!

‘आग लगे इन सियासत वालों के घर, अरे अलग मुल्क देने की क्या ज़रुरत आन पड़ी थी! अपने में से कुछ इलाका बाँट लेते!’

जेल से बाहर निकलना उतना मुश्किल न रहा जितना लग रहा था! एक सिपाही को उसने शाम होने से पहले मैदान के परली तरफ उसी के डंडे से मार मार के बेहोश कर दिया और उसकी वर्दी पहन सलाम ठोकता हुआ इधर से उधर फिरता बाहर निकल आया!

अब दिक्कत थी अपने घर पहुंचना, यूँ तो उसका गाँव रावी नदी के पास रनियां नाम से था, पर उसकी ज़मीन रावी नदी के आगे तक फैली हुई थी!
लेकिन वहां तक पहुँचने के लिए पहले अम्बरसर जाना लाज़मी था, लाहौर से अम्बरसर यूं तो कुछ दूर न था और हर कुछ देर में ट्रक और बस अम्बरसर जाते मिल ही जाते थे लेकिन आज बसों पर भीड़ का कहर टूट पड़ा था! शायद वो लोग भी दुसरे मुल्क जाने से बचना चाहते थे, एक बार ये अफरातफरी खत्म हो जायेगी तो वापस आ जायेंगे।

बामुश्किल मिन्नतें कर अश्वाक भी एक बस में सवार हो गया! चंद घंटो का सफ़र पूरी रात ले कर कटा! बस चलने का नाम ही न लेती, रेंगती हुई अम्बरसर पहुंची!

15 अगस्त - आज़ाद भारत!

वहां पहुँचते ही मस्जिद में गया तो खबर लगी आज अठ्ठाईसवा रोज़ा है! तीन दिन में ईद है! 
 
खुदा तेरा लाख-लाख शुक्रगुज़ार हूँ मैं, ईद अपनी बेटी के साथ ही मनाऊंगा!

मस्जिद से निकल कर शहर में घुसा ही था कि कुछ पुलिस वालों ने घेर लिया। वो पाकिस्तानी सिपाही की वर्दी में जो था।

“कहाँ से आया है?” एक ने पूछा

“जी यही इसी मुल्क का हूँ मैं जनाब! यहीं रनियां गाँव से ज़रा आगे मेरे खेत है! रिहाइश रनियां की ही है! रावी पार करके!” दोनों हाथ जोड़े अश्वाक बोला।

“रावी नदी के पार तो पाकिस्तान हो गया है अब, तुझे इमकान नही कि आज देश आज़ाद हो गया है”

“हुज़ूर पर मुल्क तो कल ही आज़ाद हो गया था न?”

इतना कहने की देर थी कि दो सिपाहियों ने उसे आजू बाजू जकड़ लिया!

“ले चलो इसको थाने, उस पार से आया है ये”

आसमान से गिरा खजूर में अटका वाली मिसाल हो गयी! जेल से छूटा तो थाने बंद हो गया! वहां पूछताछ सख्ती से हुई तो उसे बताना पड़ा कि “जनाब मैं तो किसानी कर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा था, पर एक अंग्रेज ‘खुदा का कहर टूटे उसपर’ एक दफा घोड़े पर मेरे गाँव आया, और मेरी बेटी के साथ बदसलूकी करने लगा! खुदा जाने कैसे उसकी नज़र मेरी ही बेटी पर पड़ी! मैं उस वक़्त खेतों में था.. मेरे बड़े बेटे और घरवाली ने उसको जम के मार लगाई! पर जालिम के जोर से तो हजूर कोई बच न सका कभी! रात वही ‘गोरा’ फिर आया, इस बार जमीदार को भी साथ लाया, कुछ एक हिन्दुस्तानी सिपाही भी उससे मुतालिक थे, मैं उस वक़्त फरसा हाथ लिए था.. मैंने जमीदार जमीदार समेत अंग्रेज को भी काट डाला! वो हरामजादा मेरी बेटी की इज्ज़त लूट रहा था! बाकि बचे सिपाहियों ने मुझे लाहौर जेल में बंद करवा दिया! और मुझपर मेरी ही बेटी के साथ....खुदा रहम करे! मेरी घरवाली सदमे से वहीं मर गयी। मेरे बेटे को सिपाहियों ने इतना मारा कि वो फौत हो गया। मेरी तरफ तो कोई पैरवी करने को था नही, मैं चार साल तक वहीँ सड़ता रहा! अपनी बेटी को मैंने जाते वक़्त वायदा किया था कि जिस दिन देश आजाद हो जायेगा इन गोरी चमड़ी से, उस दिन मैं भी आज़ाद हो जाऊंगा और तुझे आकर मिलूँगा!”

जब अश्वाक चुप हुआ तो बाकि सारे उसका मुंह देखने लगे! थानेदार ने कोई भी फैसला तुरंत लेने से मना कर दिया!
 
आजादी मनाई गयी!

दूसरी बार आज़ादी मनाई गयी, और दोनों बार अश्वाक़ पिंजरे में बंद रहा! पाकिस्तान क्या है ये अब भी उसकी समझ न आया!

पर खुदा की नज़र अभी इतनी भी नाराज़ नही हुई थी उससे,

16 अगस्त

अगला पूरा दिन भी वो बंद रहा! लेकिन रात अँधेरे में एक सिपाही आया और उसके पिंजरे का कुंडा खोल गया!

बोला वो भी कुछ नहीं, अश्वाक के मुंह से भी कोई लफ्ज़ न निकला!

फिर वो चोरी छुपे कैदखाने से बाहर निकल आया! अब रात अँधेरे में अपने गाँव का सफ़र तय करना था!

उसे पता ही न चला इस अफरा तफरी में तीन दिन हो गये उसे एक भी निवाला गले से उतारे, पानी भी रात थाने से निकलने से पहले ही पिया था!

जाने अनजाने उसने तीन रोज़े मुकम्मल किये थे! उसकी बेटी सुनेगी तो बहुत खुश होगी!

17 अगस्त 'चाँद रात'

अगला सारा दिन उसका सफ़र में गुज़रा, कभी पैदल चलता तो कभी हांफ कर बैठ जाता! अंदाजन कोई चालीस मील चलने के बाद उसकी नाक से अपने गाँव की महक टकराई! जितनी भी थकावट थी वो काफूर होने लगी!

रात का वक़्त था।

लड़खड़ाता हुआ वो अपने घर जा लगा!

घर पर कोई नहीं था! ‘शायद खेतों में गयी होगी, आखिर उस कर्मामारी पर ही तो सारी ज़िम्मेदारी आ पहुंची थी!

वो घर से बाहर निकला ही कि किसी ने उसे आवाज़ दी!

“अरे अश्वाक? खुदा का लाख-लाख शुक्र की तू सही सलामत है! कब आया तू?”

“लाला जी, मेरी बेटी कहाँ है?” उसके सवाल को नज़रंदाज़ करता अश्वाक बोला!

“भगवान हौसला दे बेचारी को.......”

“क्यों ऐसा क्या हो गया?” अश्वाक की साँसे भारी होने लगी!

“तू तो लाहौर कैदखाने में था, तुझे शायद खबर न लगी होगी पर यहाँ कई दिनों से माहौल गर्मा रहा था कि लाहौर हिन्दुस्तान से अलग हो जायेगा, पाकिस्तान में जा मिलेगा इसलिए..........”

“इसलिए क्या लाला? एक दफा बोलो सारा मसला”

“इसलिए तेरी बानो, उस पार चली गयी, फिर तेरे खेत भी तो उस पार चले गये न। बाकी मुसलमान भी उधर ही कूच कर रहे हैं”

“खुदा के वास्ते वो जुबां बोलो जो मेरी समझ लगे, अरे खेत कहीं कैसे जा सकते है लाला? सफ़र तो बंदा करता है न फिर ये खेत कैसे....” इतना बोलते बोलते अश्वाक का गला रुंध गया!

लाला ने उसे बैलगाड़ी पर बिठाया और बोला “तू चल मैं तुझे तेरे ही खेत दिखा के लाऊ”

“पर...पर तुम तो बोले कि वो पाकिस्तान नाम के किसी मुल्क में चले गये?”

“तू चल तो सही”

बैलगाड़ी में बैठ कर दोनों खेतों की तरफ रवाना हो गये ‘वो चाँद रात थी’

“देख अश्वाक़” लाला इशारे से समझाता बोला “जहाँ तुझे सिपाही खड़े दिखाई दे रहे है न, यही तक हिन्दोस्तान है.. इसके बाद सारा पाकिस्तान! यहाँ तेरे तीन चौथाई खेतों के आगे बस लकीरें खिंच गयी हैं।"

“बस लकीरें खीच दी है और कुछ नहीं” अश्वाक़ खोखले स्वर में बोला!

अब उसकी समझ आ गया था कि पाकिस्तान क्या है, और आज़ादी भी!

तभी कुछ दूर से आवाज़ आने लगी, ‘मुबारक हो चाँद नज़र आ गया... ईद आ गयी’ ‘ईद मुबारक हो’

अश्वाक बहती आँखें लिए मुस्कुराने लगा। वो किस्मत का धनी था, उसने दो बार आज़ादी देखी, दोनों दफा कैदखाने में। फिर जब रोज़े मुकम्मल हुए, तब उसकी 'ईदी' ने मुल्क़ बदल लिया।

#सहर


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