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@dawriter

कप्तान/कोच

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जिंदगी की सभी पारियां खेलकर वे अब पेवेलियन में थे। वे अपने प्रदर्शन से खुश नहीं थे। थोड़े चिड़चिड़े हो गये थे। तभी कप्तान सामने आकर खड़ा हो गया। हाँ कप्तान ही तो थी वो। जिन्हें उन्होंने सातफेरों के बाद नेतृत्व सौंप दिया था। कप्तान के कंधे झुके हुए थे लेकिन होठों पर मुस्कान थी।

वे कप्तान से ज्यादा अनुभवी खिलाड़ी थे सब समझते थे यही असली लीडर की पहचान है हर हाल में टीम में उर्जा भरना। उनकी सोच पर कप्तान ने अनुशासन का चाबुक चलाया " थोड़ा कमर उठाने की कोशिश करो। साफ करना है, जरा सी बीमारी में ऐसे लेटे हो मानों मरनेवाले हो। "

हिलने का उपक्रम किया " तू मरने दे तब ना । मरने लगूंगा, तब भी डपट देगी, कहाँ चल दिये डॉक्टर ने बोला है आराम करने को, चुपचाप लेटे रहो। "

"तुम्हारे जैसा कमजोर नहीं देखा, तुम्हारा बस चलता तो वहीं कीमो का नाम सुनकर ही मर जाते। "

उन्होंने हाथ थाम लिया आँख भर आई थी। खिलाड़ी अपने लचर प्रर्दशन और आंशिक योगदान के लिए कप्तान से क्षमा प्रार्थी था। कप्तान ने हाथ थपथपाकर भरोसा दिलाया आंशिक ही सही तुमने जरूरी योगदान दिया। हमारी टीम जीतेगी भरोसा रखो।

लेकिन फोर्थ एम्पायर ने उंगली उठा दी। खिलाड़ी आउट हो गया। जब टीम ही खत्म हो गई तो कप्तान अपने आप मर गया।
वो चुपचाप पेवेलियन में बैठा मैदान को अश्रुपूरित नजरों से देख रहा था, तभी प्रशिक्षुओं ने आकर घेर लिया " क्या आप हमें कोच करेंगे। "
कुछ ही समय बाद वो फिर से मैदान पर था अबकि बार कोच की भूमिका में।



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