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@dawriter

ईश्वर के होने का प्रमाण ( कहानी )

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एक समय एक बहुत ही पहुँचे हुए संत हुआ करते थे । हर गाँव हर जगह घूम घूम कर ज्ञान बाँटते और लोगों का ध्यान ईश्वर की तरफ आकर्षित करते । बड़ा।नाम था उनका । उनके प्रवचन को सुनने के लिए लोग सारे काम धंधे छोड़ कर आ जाया करते ।

एक बार वो किसी गाँव में अपना प्रवचन दे रहे थे । भीड़ की समासूध नही थी । हर कोई मग्न हो कर सुन रहा था । इसी बीच एक व्यक्ति खड़ा हुआ और बोला ” महाराज बड़ा नाम सुना है आपका । सुना है आप लोगों को ईश्वर से मिलवाते हैं । ”

” नही मेरे पुत्र मैं लोगों को ईश्वर से नही मिलवाता बस ईश्वर में उनकी आस्था को जगाता हूँ और फिर उस आस्था को मजबूत करता हूँ । ”

” महाराज मैं नास्तिक हूँ । मैं ना ईश्वर को मानता हूँ ना आप जैसे प्रचारकों को । आपका बहुत नाम सुना था तो लगा मेरे प्रश्न का उत्तर आप ही दे सकते हैं । हो सकता है मैं अपने प्रश्न का उत्तर मिलने पर नास्तिक से आस्तिक बन जाऊँ । अगर आप मेरे प्रश्न के लिए तैयार हों तो कहें । ” संत जी ने सोचा मैने तो कितना ज्ञान अर्जित किया है । ये नास्तिक भला ऐसा क्या पूछ लेगा जिसका उत्तर मुझे ना आता हो । ऐसा सोच कर संत जी ने उसको प्रश्न पूछने की आज्ञा दी ।

व्यक्ति मुस्कुराया और पूछा ” आप जिस ईश्वर का गुणगान करते नही थकते क्या आप उस ईश्वर के होने का प्रमाण दे सकते हैं ? अगर हाँ तो दीजिए जो मैं भी अपनी नास्तिक्ता त्याग कर उसका भजन किया करूँ । ”

उस नास्तिक का प्रश्न सुनते पूर सभा स्तब्ध हो गई और जिज्ञासावष संत जी के उत्तर की प्रतिक्षा करने लगी । इधर संत जी धर्मसंकट में पड़ गए की इस नास्तिक को भला मैं कैसे समझाऊँ ? क्या प्रमाण दूँ की ईश्वर हैं । उन्होने आँखें बंद कर के अपने ईश्वर का ध्यान किया और मन ही मन कहा ” हे मेरे मालिक मैने सारी उम्र तेरे नाम का प्रचार किया है । लोगों में तेरी आस्था को जगाया है । आज मैं बड़े अधर में फंसा हूँ और मेरे साथ आपका अस्तित्व भी फंसा है । मेरी लाज बचा लिजिए मेरे ईश्वर । ” इतना ध्यान कर के संत जी ने आँखें खोलीं और उस नास्तिक से कहा ” बहुत ही कठिन प्रश्न पूछा तुमने । मगर मैं इसका उत्तर दे सकता हूँ परन्तु उस से पहले तुम्हे मेरे प्रश्ननों का उत्तर देना हो । ”

” जी आप अपना प्रश्न पूछें । ”

” तुम किसकी संतान हो ? ”

” ये कैसा प्रश्न हुआ संत जी ? सब की तरह मैं अपने पिता की सन्तान हूँ । ”

” और आपके पिता किसकी संतान हैं ? ”

” अजीब बात कर रहे हैं संत जी । वो मेरे दादा की।संतान हैं । ”

” और आपके दादा उनके दादा और उनके दादा किसकी संताने थीं ? ”

अब नास्तिक झुंझला गया और बोला ” वे सब पूर्वजों की संताने हैं । ”

” तो क्या आप ये प्रमाण दे सकते हैं की वे सब अपने पूर्वजों की संताने ही थीं ? क्या आप प्रमाण दे सकते हैं आपके पूर्वजों के होने का ? ”

” वो तो अब इस धरती पर ही नही हैं उनके होने का क्या प्रमाण दिया सकता है । हाँ उनकी छोड़ी संपदा उनका बनाया घर ही प्रमाण मात्र है । ”

संत जी मुस्कुराए और बोले ईंट का मकान आपके पूर्वजों के होने का प्रमाण हो गया और ये जो धरती आकाश पाताल ग्रह नक्षत्र के स्वामी हैं , जो सृजनकरता हैं उनके होने का प्रमाण तुम मुझ से पूछ रहे हो । जिसका दिया एक एक स्वांस है तुम्हारे अंदर उसके होने का प्रमाण पूछते हो ? आँखें मूँदो और अपनी अंतरआत्मा से पूछो की क्या ईश्वर है । तब तुम्हे उत्तर मिलेगा हाँ ईश्वर है तुम में ही है हर कण मे है । हवा का होना सूर्य का चमकना चाँद तारों का टिमटिमाना ही प्रमाण है इस बात का की ईश्वर है । तुम नास्तिक हो तुम ईश्वर को नही मानते मगर ये तो मानते हो ना की कोई तो शक्ति है जो ये सब चला रही सबका संचालन कर रही है । वही शक्ति ईश्वर है मेरे पुत्र और वही।ईश्वर के होने का प्रमाण । ”

नास्तिक संत जी की बातों को समझ चुका था दौड़ कर उनके चरणो में जा गिरा और क्षमा माँगी ।

ईश्वर आस्था है । मन का विश्वास है । आप उसे देख नही।सकते पर हर घड़ी महसूस कर सकते हैं भले ही आप उसे ईश्वर ना मान कर कुछ और मानें मगर वो ईश्वर ही है ।

धीरज झा



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