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@dawriter

आसमान बोलता है !

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sunilakash by  
sunilakash

 

 

विश्वास है इंसान का,
जो विपदाओं में डोलता है।
गूँगा-बहरा तो नहीँ है,
आसमान बोलता है ॥
जो एक समर में हारते हैं,
वे फिर भी बाजी मारते हैं।
है छुपाना शक्ल तो बेकार ही,
आईने हर शक्ल को पहचानते हैं॥
सावधान, उड़ने को, ऐ पक्षियों,
आदमी भी अपने बाजू तौलता है।
गूँगा-बहरा तो नहीँ है,
आसमान बोलता है !  ॥1॥

 

है समंदर झाग-सी ये मुश्किलें,
जी भी इनमें फँस गया फंसता रहा।
कुछ ठौर जीने के लिए भी है यहाँ,
आदमी जो हँस सका हँसता रहा॥
इन हवाओं में कहीं खुशबू भी है,
बेवजह इनमें ज़हर क्यों घोलता है।
गूँगा-बहरा तो नहीँ है,
आसमान बोलता है !  ॥2॥

 

ये फिरंगी व्यवस्थाएं मौन है,
आदमी का हौसला मृग-छौन है।
गूंगे-बहरों के नगर में दोस्तों,
कोई 'शब्द' हो, आवाज़ सुनता कौन है॥
परिवर्तन ले आना है स्वर आकाश का,
यूँ नहीँ अपने अधर वह खोलता है।
गूँगा-बहरा तो नहीँ है,
आसमान बोलता है !  ॥3॥



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