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@dawriter

अभिलाष का फूल

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एक अभिलाष का फूल
पनपा मन के अंदर
रोज उठता जगता
गुलाटियां मरता
देता मेरे भरम को तोड़
हां, भरम ही तो है वो
जो कहता है तू हार गया है
हां,भरम ही तो है
जो कहता तेरी औकात क्या
हाँ,भरम ही तो है वो
जो कहता तुझमे दम नहीं है
और मैं अंजान मान बैठ उसको सच
हार अपनी आकांक्षाओं का सच
उस अभिलाष के फूल को तोड़ मसोड देता
ना मान रहा है वो हार
बोला न कमजोर खुद को जान
अंजाली भर तेरी आकांक्षा है
और सागर भर तेरा दम
उठ ओ कर्मवीर
अपने हौसले को पहचान
दे ताकत को टक्कर
और अपना लोहा मान
एक अभिलाष का फूल
पनपा मन के अंदर
दे मेरे हौसले को उठान
करे मुझको बलवान



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