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@dawriter

ख़्वाहिश की ख़्वाहिश पूरा करने तक का सफर

16 195       
vinay by  
vinay

ये उन दिनों की बात है , जब अमन और शाहिल 5वीं व 8वीं कक्षा में थे । ये दोनों बड़े ही अच्छे दोस्त हुआ करते थे उन दिनों उम्र का फासला जरूर हुआ करता था उन दोनों में , पर कभी भी उनके विचारों में फासला नहीं रहा दोनों ही एक-दूसरे को बड़े ही अच्छे तरीखे से जानते व समझते थे ।

अमन के पापा के पास ज्यादा पैसे नहीं हुआ करते थे , मतलब की उनकी कमाई बहुत ही काम थी इतनी की बस वो अपना किसी तरह जीवन ज्ञापन कर ले । बस ! और दूसरी तरफ शाहिल की परिवारिक स्तिथी बहुत ही अच्छी थी , वो अपना ऐश-ओ-आराम बड़े ही आसानी से पूरा कर सकता था । शाहिल के पिताजी एक सफल कारोबारी थे , उनका कपड़ो का व्यापार हुआ करता था । पर यहाँ पर तोडा सा अंतर था उन दोनों ही परिवार के अभिवावकों की सोच में अमन के पापा जी के पास भले ही पैसे का स्रोत कम था पर उनके विचार बहुत ही अच्छे थे । और वही शाहिल के पिताजी के पास पैसे तो बहुत थे पर उनकी सोच समाज को लेकर के बहुत ही छोटी थी व विचार-शिखा बहुत सिमित थी ।

अमन व शाहिल दोनों ही हमेशा साथ में ही खेला-कूदा करते थे एवं साथ ही विद्यालय जाया करते थे उन दोनों में कभी भी किसी तरह का मन-मोटाव नहीं था और न ही भेदभाव था या , यूँ कह लीजिये की उन्हें इस बात की समझ ही नहीं थी की भेदभाव क्या होता है व किसे कहते है । समय यूँ ही बड़ी तेज़ी से बीतता गया और अब उन दोनों में भी दुनियादारी की समझ आती गयी अब अमन 13 वर्ष तो शाहिल 16 वर्ष का हो गया था । अब उन दोनों में शारीरिक बदलाव भी आने शुरू हो गये थे । अमन में साधारणतः जैसे लड़को में बदलाव आते है वैसे ही आ रहे थे , पर शाहिल के साथ ऐसा नहीं था वो उन बाकी लड़को की तरह नहीं था व उसकी हरकते भी अब धीरे-2 अजीवों-गरीब सी होती जा रही थी । सामान्यतः इस उम्र में सभी लड़को का ध्यान लड़कियों की तरफ , व लड़कियों का लड़को की तरफ आकर्षित होता है । पर शाहिल के साथ ऐसा नहीं था वो लड़को की तरफ ही आकर्षित होता था व उसकी हरकते ऐसी थी की जैसे लड़के लड़कियों को देखकर करते थे अपनी ओर आकर्षित करने के लिये । शाहिल को अब धीरे-2 लड़कियों की तरह सजना-संवरना अच्छा लगने लगा व वो भी अब हाथों में नेल-पॉलिश , एवं बार-बार बालों में हाथ फेरना लड़कियों की तरह अच्छा लगने लगा था । धीरे-2 ये बात शाहिल के घरवालों को भी समझ आने लगी थी ।

एक दिन शाहिल ने हिम्मत कर के अपने घर वालो को बताया कि पापा मैंने शरीर तो जरूर लड़को वाला पाया है , पर मेरी रूह लड़कियों की है । तभी दूर बैठी उसकी मम्मी ने थोड़ा गुस्सा होते हुये कहा हमें समझ नहीं आ रहा तुम क्या कह रहे हो जो कहना है साफ़-साफ़ कहो मैं आम लड़को की तरह नहीं हूँ मुझे लड़कियो की तरह रहना पसंद है । उन्ही की तरह बोलना , पहनना , चलना पसंद है । तभी उसकी माँ ने पास में रखी गिलास उठा कर कींच कर उसके मुँह पर जोर से मार दिया । और भला-बुरा कहने लगी व गालियाँ देने लगी , शाहिल बुरी तरीके से घायल हो चूका था खून बह रहा था जिसका किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था वो निरंतर ही रोये जा रहा था । उस समय उसका साथ किसी ने नहीं दिया न भाई ने , न बहन ने कोई भी ! उसके बाद शाहिल ने कई दिनों तक अपने आपको कमरे में बंद रखा । अब धीरे-धीरे सभी लोग इस बात का विरोध करने लगे थे व उसके परिवार वालो को जगह-2 से ताने मिलने शुरु हो गये थे परिवार, समाज, दोस्त-यार हर तरफ से छीटाकशी होने लगी थी और सबसे बड़ी बात ये की ये वो लोग थे जो शाहिल के जीवन में आगे कभी काम आने वाले नहीं थे फिर भी उसे बोल रहे थे भला-बुरा और इसका सीधा-सीधा असर शाहिल पर पड़ रहा था । वो घुटने सा लगा था मानों की जैसे अंदर ही अंदर मर ही गया हो और उसने धीरे-2 लोगो से बातचीत करना , मिलना-जुलना कम ही कर दिया था पुरा-पुरा दिन कमरे में ही बंद रहता था । पर इससे क्या होता वो तो अब और ही इस ओर आकार्षित होता जा रहा था और उसके खिलाफ अब उसके खुद के माता-पिता ही हो गए थे और बात यही तक नहीं रही अब तो उसे इस हद तक प्रताड़ना झेलना पड़ता था कि उसके खुद के भाई ही उसके साथ छेड़खानी करने लगे थे एवं दोस्त-यार भी ।

पर उसका बचपन का दोस्त अमन वो आज भी उसके साथ था व वो भी उसकी व्यथा को समझ रहा था , या सीधे-सीधे यूँ कहिये की सिर्फ वह ही उसकी समस्या को समझ रहा था । एवं शाहिल भी अपने जीवन से जुडी हर बातो को उससे साझा कर रहा था व धीरे-धीरे समय बीता व वो दोनों ने ही महाविद्यालय में दाखिला लिया । पर यहाँ पर शाहिल के जीवन में एक मोड़ आया और आगे वही हुआ जिसका हमेशा से डर था । शाहिल को अपनी महाविद्यालय की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी व इतना ही नहीं उसे अपना घर-परिवार भी छोड़ना पड़ा । क्योंकि उस पर निरंतर ही ऐसा दबाव डाला जाने लगा की वो अपनी इन हरकतों को छोड़ दे या फिर हमें (परिवार) छोड़ दे और उसने निर्णय लिया की वो अपना घर-परिवार , पढ़ाई-लिखाई , सब छोड़ कर चला जायेगा क्योंकि अब उसने तय कर लिया था कि उसे भले ही कुदरत , समाज के विरुद्ध जाना पड़े तो जायेगा पर अपनी खुशियों का गला नहीं घोटेगा । वो अपने आधा सैंकड़ो मिलों दूर चला गया उन सभी को छोड़ के जो उसके आत्म-जीवन के विपक्ष में थें व अपने करीबी दोस्त अमन को भी , उसे बिना बताये ही चला गया अमन कई दिनों तक परेशान रहा शाहिल को लेकर के वो उसके परिवार वालो से आये दिन पूछता रहा कई सालों तक फिर एक दिन शाहिल के पिताजी ने कह दिया हमें उससे मतलब नहीं है अब तुम आगे से उसके बारे में हमसे पूछने मत आया करना , फिर क्या था वो भी अपनी जीवन व्यथा पर व्यस्त हो गया ।

अब शाहिल स्वतंत्र था समाज की बदनामी से पर वो शहर तो जरूर छोड़ दिया था लेकिन उसकी उसके साथ की शारीरिक समस्यायें आज भी उसके साथ थी वो कैसे छूट सकती थी । और सही मायने में कहा जाये तो वो उसकी समस्यायें नहीं थी , बल्कि उसके जीवन का अमिट सत्य था । और अब उसे इस दूर शहर में कोई भी फर्क नहीं पड़ता था इन बातों से की कोई क्या कहेगा या क्या सोचेगा , पर समस्यायें यहाँ पर भी ख़त्म नहीं होती उसे इस दूर शहर में जीवन ज्ञापन करने के लिये पैसों की जरुरत थी जो उसे पास बिलकुल भी नहीं थे । उसने कई जगह नौकरी के लिये भी आवेदन दिया व गया पर उसे नौकरी कही भी नहीं मिली उसके हाव-भाव , चाल-चलन देख कर सब ने मना कर दिया । और तो और उसके साथ दुर्व्यवहार करते बत्तमीजी करते एवं उसके अंगों को छूते वो अब पूरी तरह जीवन से परेसान हो गया था मानो की जैसे उसने इस जीवन में आ के गलती की हो । शाहिल ने तो एक बार आत्महत्या तक करने का प्रयाश किया पर शायद कुदरत को ये मंजूर नहीं था और वो बच गया । और शाहिल को बचाने वाला और कोई नहीं बल्कि वो भी उसी की ही तरह का शिकार व्यक्ति था जैसा कि शाहिल था । और वो शाहिल की जीवन कथा सुनने के बाद उसकी व्यथा को समझ गया था कि वो किन-किन कठिन परिस्तिथियों से गुजरा था । उस व्यक्ति ने उसे गले लगाया और कहा भाई परेशान होने की जरुरत नहीं है , तुम हमारे साथ चलो और तभी शाहिल ने भी बिना देर किये बिना कुछ ज्यादा पूछे उसके साथ चल दिया उस व्यक्ति ने शाहिल को अपने नपुंसकों के समूह में ले गया उस दिन शाहिल बहुत खुश था क्योंकि उसे वहाँ जितना प्रेम , जितना स्नेह वहाँ मिला वो पहले कभी नहीं मिला था । मानो की जैसे शाहिल का नया जन्म हुआ हो फिर से । और उन लोगो ने उसी बीच शाहिल का नाम बदल कर ख़्वाहिश भी रख दिया था उन सभी लोगो ने ख़्वाहिश का बहुत ही अच्छे से ख्याल रखा था । उसे खिलाया-पिलाया उसने कई महीनों तक वहाँ आराम किया फिर से अब उसे ऐसा लगने लगा था कि कब तक मुफ्त में खाऊंगा उठाने निर्णय लिया की वो चला जायेगा पर उन लोगो ने कहा तुम कहाँ जाओगे हम तुम्हे रोक नहीं रहे है , तुम्हे जाना है तो जा सकते हो पर वहाँ कुछ नहीं मिलेगा अगर तुम चाहो तो हमारे साथ काम कर सकते हो तभी उसने भी सोचा सही है मैं कहाँ जाऊँगा फिर उसने निर्णय लिया की वो उन्ही के साथ रहेगा व उन्ही के साथ काम भी करेगा फिर उसने अपने जीवन में पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा ख़्वाहिश बड़े ही आसानी से उनके साथ-2 गली-चौराहे , शादी-ब्याह में जाने लगा , नाचने-गाने लगा और इसे इन सब में अत्यंत ख़ुशी भी प्राप्त हुआ करती थी । और अब उसकी जो शारीरिक जरूरते भी हुआ करती थी उसे भी वो उन सभी के साथ बड़े ही आसानी से पूरा कर लिया करता था क्योंकि उसे इसी में ख़ुशी मिलती थी । और अब समय यूँ ही बीतता गया व एक दिन ख़्वाहिश को सड़क के किनारे से बच्चे की रोने की आवाज आई और वो उसे देखने के लिए वहाँ गया तो उसने पाया कि वहाँ पर महीने भर का बच्चा पड़ा था अकेला उसने उसे बिना कुछ सोचे-विचारे ही उस बच्चे को अपने घर ले आया और पालने-पोशने लगा और ये कोई नई बात नहीं थी क्योंकि उसे भी किसी एक नपुंसक व्यक्ति ने अपने साथ लेकर आया था तभी उसका सही मायने में नया जन्म हुआ था । मानो की जैसे उसके साथ उसका ही इतिहास दोहराया गया हो , इसिलये ख़्वाहिश ने उस बच्चे का बड़े ही अच्छे से पालन-पोषण किया व पढ़ाई-लिखाई भी पूरी करवाई और ख़्वाहिश ने एक साथ ही उस बच्चे के जीवन में माँ-बाप दोनों की ही पूर्ति की एवं कभी भी किसी भी तरह की कमी नहीं आने दी । और ख़्वाहिश ने उसी बीच एक नपुंसकों के हितों के लिये एक नपुंसकों के सामाजिक संस्थाओं व लावारिस बच्चो की संस्थाओं में काम करने लगा । और जैसा की मैंने बताया था कि उसके पापा एक सफल कारोबारी थे तो उसने भी धीरे-धीरे पैसे इक्कठे कर-कर के एक छोटा सा व्यापार चालु किया जो देखते ही देखते बड़े कम समय में एक बड़े व्यापार का रूप ले लिया औए एक राज्य से फैलते-फैलते कई राज्यो तक फैल गया । अब आज की तारीख में ख़्वाहिश ने 13000 बच्चो को गोद ले रखा है । और वही दूसरे तरफ ख़्वाहिश ने अपने कारोबार में 53% से ज्यादा अपने ही जैसे शिकार लोगो को नौकरी दे रखी है । जिनका जीवन ज्ञापन भी ख़्वाहिश ही करता है ।

वो कहते है न की "इतिहास में जब-जब भी लोगो को दिक्कते आयी है तब-तब अविष्कार पैदा हुआ है" । वो ही हाल ख़्वाहिश का भी था , वो बचपन में जिन-जिन समस्याओं से जिन-जिन आलोचनाओं से गुजरा था वो अब नहीं चाहता था कि कोई और गुजरे

               विनय सोनी सतना 



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