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@dawriter

शुभ विवाह -I

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वो ऊंची हवेली जिसकी तरफ देखना भी हमारी औकात में नहीं वहाँ से हम चाय की टपरी चलाने वालों को रिश्ता आया है, ऐसा कैसे? उल्टी गंगा, लक्ष्मी के बापू तनिक सोच लो।

अरे यही सारे सवाल हमरे माथे पे भी ठनके थे। उस मोहल्ले के सभी ऊँचे घरो में सबसे बडे़ घर का रिश्ता मेरे जैसे सुदामा के घर, ठाकुर जी से यही सवाल पूछे रहे हम।

फिर का बोले हूजूर

बोले इत्ते सालों से तेरी चाय की टपरी पर ही मैं चाय पीता हूँ तब तो तूने न पूछा,

महिला के चेहरे पर शिकन थी।

गुस्सा हो गये का मालिक फिर का कहा मालिक ने,

कहने लगे देख रामशरण आज का जमाना बड़ा खराब है बहु घर में बाद में आती है पहले बंटवारा करवा देती है, तेरी बेटी लक्ष्मी को मैं, मेरा परिवार बचपन से जानता है, पढ़ी-लिखी है।

वो तो मालिक आपकी ही कृपा है आपने ही, बड़े बाबा, छोटे बाबा के साथ ही उसे भी पढा़ दिया, मेरे बस में तो न था।

फिर का बोले मालिक,

इसलिए तो जानता हूँ लड़की लक्ष्मी हीरा है , इसलिए अपने बडें बेटे कुंदन के लिए हाथ माँग रहा हूँ , फिर सोच लो, न मालिक सोचना का है आपकी ही बेटी है जैसा आपको ठीक लगे। हमे सब मंजूर है।

दरवाजे के पीछे लक्ष्मी के मन में कुंदन और कुंदन के साथ शादी के विचार अंगडाई लेने लगे।

कुंदन तो सच में कुंदन था, गोरा रंग , काले बाल, आकषर्क छवि, रुप जितना सुंदर गुण उस से भी बढकर। लक्ष्मी को बचपन से लेकर अब तक की सारी बाते एक पल में चलचित्र की तरह आँखो के सामने चल पड़ी

अरे रामशरण तुमने अपनी बेटी को भी स्कूल में डाल दो, फीस की चिंता न करो। पहले दिन ही स्कूल में , सब बच्चो ने बडा़ मजाक बनाया था, चाय की टपरी वाली स्कूल आई है, पर वो लड़का गोरा सा, कितना ऊँचा बोला था उन्होने। चुप हो जाओ सब, वो हमारे चाचा रामशरण जी की बेटी है उनकी माँ मेरे घर काम करती है क्या हुआ उसके बाबा चाय की टपरी चलाते है उसे भी पढ़ने का हक है। बस इन शब्दों ने हमे मित्रता के सूत्र में बाँध दिया था।

फिर जैसे जैसे क्लास बढी़, उम्र बदली और जब चुपके से लडकपन ने अपनी बाँहे फैलाई तो पहला झुकाव कुंदन की और ही था और ये रंग और गहरा हो गया जब होली के दिन उसके फेवरेट हीरो अक्षय कुमार की तरह उसने लक्ष्मी पे जबरजस्ती रंग लगाने वाले मुहल्ले के छुट भैये को लताड़ा था। जब उसकी सखिया कुंदन का नाम लेकर उसे छेड़ा करती थी।

पर उसके मन में कही न कही कुंदन के लिए प्रेम से ज्यादा सम्मान था क्योंकि उसने हमेशा नजर की नजदीकियां हो या अनजाने में हुए स्मरणीय स्पर्श में उसने कुंदन को हमेशा दोस्त के रुप में ही पाया।एक अजीब सी खामोशी हमेशा उनके रिश्ते के बीच थी और आज उसी सपनों के राजकुमार का रिश्ता उस के लिए आया था।

लक्ष्मी ओ लक्ष्मी कहाँ गई, अचानक बापू की आवाज ने उसे वास्तविकता की धरातल पर वापस ले आए ।

जी बापू बडे़ हवेली से कुंदनबाबू का रिशता आया है तोहार लाने तुम का बोलती हो, माँ ने कहा

लक्ष्मी नीचे सिर किए खड़ी थी,

बोलो लक्ष्मी हमने आज तक कोई दबाव तुम्हारे ऊपर नहीं डाला है,

आप को जैसा ठीक लगे बापू और मुस्कारा कर लक्ष्मी चली गई।

बचपन में जब वह अपनी गुड़िया की शादी रचाती थी तब उसे कैसा चाव होता था अपने ब्याह का। जब भी कोई दुल्हन देखती थी बापू से कह देती थी, 'बापू मेरी शादी में मुझे भी ऐसे कपड़े, गहने दिलाना।'

तब कहां पता था कि गुड़िया की शादी और एक लड़की की शादी में फर्क होता है। लड़की को अपने ब्याह में केवल गहने कपड़े ही नहीं बल्कि मां बाप से जुदाई भी मिलती है तोहफे में।

शुभ विवाह संपन्न हुआ।।।।

लक्ष्मी दुल्हन के रुप में, कुंदन दुल्हे के रुप में अपने नाम को सार्थक कर रहे थे। आखिरकार चाय की टपरी से ऊंची हवेली लक्ष्मी की विदाई हुई।

शादी के बाद की सभी रस्मो को निभाने के बाद पहली रात की पूरी तैयारी की गई, सभी ननदो और भाभीयो की हँसी-ठिठोली के बीच लक्ष्मी को उसके कमरे मे भेज दिया गया। पूरे कमरा फुलो की खुशबू से महक रहा था, लक्ष्मी ने अपने को संभाला, घूंघट किया और कुंदन के इंतजार में दरवाजे पर निगाहे लगा ली,

थोडी देर बाद घडी़ देखी रात के ग्यारह बजे थे उसे इंतजार करते हुए एक घंटे हो गये थे पर कुंदन नही आया, सोचा दोस्तो में फस गए होगें,

घूंघट नीचे कर लिया, घडी और दरवाजे पे नजर टैनिस के गेम की तरह बदल रही थी, बारह बज गए पर तब भी।।।।।

खिड़की पे खडी़ होकर इंतजार करने लगी, पूरे ऊंची ईमारतो के बीच वो हवेली जिसमें वो बहू बन कर आई।शादी की रोशनी में अलग चमक रही थी।

इंतजार गुस्सा बन रहा था, और शादी की थकान आँखों को बंद कर रही थी। और वो बिस्तर पर सो गई।

।।।जारी


शुभ विवाह-II

शुभ विवाह-III(अंतिम)

Image Source: pinterest



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