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@dawriter

न्याय-अन्याय

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न्याय-अन्याय-1

रविवार की शाम, सुहाना मौसम और कुछ फुर्सत के पल। ऐसा मौका कभी कभी आता है ज़िंदगी में। मैं आज कुछ पढ़ना चाहती थी। असल तो भगवंत अनमोलजी की नई पुस्तक ‘ज़िंदगी 50-50’ जो आज ही मिली थी वही पढने का लोभ मन में आ रहा था। मैं हाथों में किताब और काफी का मग लिए बालकनी में चली आई। अभी किताब खोली ही थी कि नज़र सामने वाले फ्लैट की बालकनी में चली गई। टिया उदास सी अपने फेवरेट पिंक टैडी बेयर को गोद में लिए बैठी थी। पास ही लेज़ का पैकेट रखा था। पैकेट अभी बंद ही था। उसका उतरा हुआ चेहरा और आंसुओं से भरी आंखें देख कर लग रहा था उसने फिर कोई शरारत की है और फिर उसके फूफाजी से उसे कोई सज़ा मिली है।

टिया मेरी सहेली रश्मि के भाई की बेटी है जो पिछले कुछ महीनों से उसके साथ ही रह रही थी। उम्र से भले ही टिया दस साल की हो पर दिमाग से तो चार साल की ही थी और इसी कारण वह अपनी बचकानी हरकतों के चलते अपने और रश्मि के लिए हर रोज़ एक नई समस्या खड़ी कर लेती थी। हर रोज़ रश्मि को अपनी सास और पति से टिया के कारण ताने सुनने पड़ते। बेचारी रश्मि तो दोनों तरफ से गई थी। ना तो टिया को बेसहारा छोड़ सकती थी और ना ही उसके पास अपने पति और सास की बातों का कोई जवाब था। बस चुपचाप सब कुछ सह रही थी।

अपराधी को उसके कर्मों की सज़ा तो मिलनी ही चाहिए। न्याय भी होना चाहिए यह सही है किन्तु जब किसी एक के साथ न्याय होता है कहीं ना कहीं किसी ना किसी के साथ अन्याय भी होता है। सज़ा सिर्फ़ अपराधी को ही नहीं वरन उससे जुड़े लोगों को उसके परिजनों को भी भुगतनी पड़ती है। चाहे वह उसके साथ अपराध में भागीदार हो ना हो पर सज़ा का भागीदार तो होता ही है। कम से कम टिया को देखकर यही लगता है।

अभी कुछ माह पहले तक टिया एक बहुत खुशहाल जीवन जी रही थी। बहुत प्यार करते थे उसके मम्मा पापा उसे। उसका बहुत खयाल भी रखते थे। इतना कि पहली नज़र में किसी को टिया की कमी का अहसास भी नहीं होता था। टिया उनकी लाडली थी। मगर समय का चक्र कुछ इस कदर उल्टा घूमा कि अपने माता पिता की लाडली टिया बेसहारा हो गई, जो कभी फूल सी हल्की थी आज उससे बड़ा बोझ कोई नहीं था।

टिया के साथ आज जो कुछ भी हो रहा था उसकी प्रस्तावना तो उसके पिता ने उसके जन्म से बहुत पहले ही लिख दी थी, अब तो वह बेचारी बस अपने पिता के कर्मों का फल भुगत रही थी। टिया के दादाजी का मेडिकल स्टोर था। वह बहुत अमीर तो नहीं थे पर अच्छी खासी कमाई कर लेते थे। इतनी कि अपने परिवार के लिए जीवन की हर जरूरी सुख सुविधा जुटा रखी थी उन्होंने। रश्मि और उसके भाई संदीप की पढ़ाई शादी जैसी सारी ज़िम्मेदारियां उन्होंने उसी दुकान से ही पूरी की। उन्हें कभी किसी तरह की आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ा। मगर संदीप के सपने ज़रा ऊंचे थे। जो पिता की दुकान में समाते ना थे। वह एक सफल और बड़ा बिजनेस मैन बनना चाहता था। पर मेहनत और संघर्ष उसके बस का नहीं था और वह पैसा कमाने का कोई आसान रास्ता ढूंढ रहा था।

उसे वह आसान रास्ता उसके मित्र राहुल ने सुझाया। दवा बनाने की फैक्ट्री लगाने का प्रस्ताव लेकर जब वह संदीप के पास पहुंचा तो संदीप बहुत खुश हुआ। पर समस्या फैक्ट्री के लिए पैसा जुटाने की थी क्योंकि उसके पिता बिना किसी अनुभव इतना बड़ा काम शुरू करने के पक्ष में नहीं थे। पर इसका रास्ता भी निकल आया, संदीप के ससुरजी ने बिजनेस में पैसा लगाने की हामी भर दी बस उनकी एक शर्त थी कि उनकी बेटी आशिमा संदीप की बिजनेस पार्टनर होगी। संदीप और राहुल को इसमें भला क्या एतराज होता।

संदीप की फैक्ट्री शुरू भी हुई और बड़े शान से चली भी। धीरे धीरे संदीप के पिता को भी अपने बेटे की काबिलियत पर भरोसा होने लगा। उन्होंने भी अपना पैसा उसके बिजनेस में डाल दिया। इससे संदीप के हौसले आसमान छूने लगे। अब वह अपना व्यापार बढ़ाने में लग गया।

आशिमा बस नाम की ही पार्टनर थी, उसका संदीप के व्यापार से कोई लेना देना नहीं था। वह फैक्ट्री भी नहीं जा पाती थी क्योंकि उसका ज्यादातर समय तो टिया की देखभाल में ही निकल जाता था। सब ठीक चल रहा था पर राहुल और संदीप के मन में समाए लालच ने सब तबाह करके रख दिया। उन्होंने नकली दवा बनाना शुरू कर दिया। फायदे और अधिक फायदे के लालच ने उनके भीतर के इंसान को खत्म कर दिया। काली कमाई से घर में आ रही समृद्धि ने परिवारजनों की सोचने समझने की शक्ति भी खत्म कर दी किसी ने उसे टोकना जरूरी नहीं समझा।

संदीप की कंपनी की गिनती देश की जानी मानी दवा निर्माता कंपनियों में होने लगी थी कि जाने कैसे सरकारी महकमे के एक अफसर को शक हो गया। संदीप और राहुल ने मामला दबाने की बहुत कोशिश की, उस अफसर को खरीदने की कोशिश भी की मगर वह ईमानदार अफसर उनके झांसे में नहीं आया और फैक्ट्री पर छापा पड़ गया। संदीप की कंपनी सील हो गई और संदीप और राहुल को सज़ा हो गई। आशिमा भी उनके साथ फस गई, आखिर वह भी तो कंपनी की पार्टनर थी। आशिमा यह अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकी और उसे दिल का दौरा पड़़ गया। डाक्टर्स ने उसकी जान बचाने की बहुत कोशिश की पर आशिमा की उम्र कम होने के कारण उनकी हर कोशिश नाकाम रही और आशिमा को नहीं बचाया जा सका।

भाभी की मृत्यु और भाई के जेल जाने के बाद ना तो रश्मि के पास टिया को अपने साथ रखने के अलावा और कोई रास्ता बचा था और ना टिया के पास बुआ के अलावा और कोई सहारा। संदीप को अभी लंबी सज़ा काटनी थी और और तब तक कहीं ना कहीं उसकी इस सज़ा में रश्मि और टिया को निर्दोष होकर भी अपनी हिस्सेदारी निभानी थी।



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