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@dawriter

काल्पनिक निष्पक्षता

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“जगह देख कर ठहाका लगाया करो, वर्णित! तुम्हारे चक्कर में मेरी भी हँसी छूट जाती है। आज उस इंटरव्यू में कितनी मुश्किल से संभाला मैंने…हा हा हा।”

मशहूर टीवी चैनल और मीडिया हाउस के मालिक शेखर सूद ने दफ़्तर में अपनी धुन में चल रहे अपने लड़के वर्णित को रोककर कहा।

वर्णित – “डैडी! आज हर इंटरव्यू में कैंडिडेट बोल रहे थे कि हमारे चैनल में वो इसलिए काम करना चाहते हैं क्योंकि हमारा चैनल निष्पक्ष है। उसपर आप जो धीर गंभीर भाव बनाते थे उन एक्सप्रेशंस को देख कर खुद को रोकना मुश्किल हो गया था।”

शेखर – “हप! मेरे हाथों पिटाई होगी तेरी किसी दिन। हा हा…”

पास ही कॉफ़ी ले रहा शेखर का छोटा लड़का शोभित समझ नहीं पा रहा था कि इसमें हँसने वाली क्या बात है। उसका चेहरा देख वर्णित ने उसे अपने केबिन में बुलाया।

वर्णित – “क्या छुटकू! जोक समझ नहीं आया?”

शोभित – “हाँ भाई, हम तो एथिक्स वाली सच्ची, निष्पक्ष पत्रकारिता का हिस्सा हैं ना? सब यही बोलते हैं और सिर्फ हमें दिखाने को नहीं…जो लोग नहीं भी जानते मैं कौन हूँ, उनसे भी यही फीडबैक मिला है। यहाँ तक की अंतरराष्ट्रीय एजेंसीज़, यूट्यूब – सोशल मीडिया हर तरफ अधिकतर लोग हमारे मीडिया हाउस को ऐसा ही बोलते हैं। आपको तो सब दिखाता ही रहता हूँ मैं अक्सर…”

वर्णित – “इस सब्जेक्ट पर मैं तुझे समझाने वाला था, मुझे लगा तू खुद समझ जाये तो बेहतर होगा। कोई बात नहीं, पहली बात निष्पक्ष पत्रकारिता, एथिक्स वाला मीडिया नाम की कोई चीज़ नहीं होती। बस के खाई में गिरने से 5 लोगों की मौत जैसी प्लेन ख़बरों के अलावा बयान, घटना, विवरण, निष्कर्ष सब इस बात पर निर्भर करते हैं कि किस मीडिया में पैसे का स्रोत क्या है और ऊपर के मैनेजमेंट से कौन लोग जुड़े हैं।”

शोभित – “….लेकिन हम तो हर तरह की खबर लोगों के सामने लाते हैं। हर राजनैतिक दल, विचारधारा की अच्छी-बुरी बातें प्रकाशित करते हैं।”

वर्णित – “अरे भोले मानुस, ऐसा तुम्हें और जनता को लगता है बल्कि ऐसा हम ‘लगवाते’ हैं। किस पक्ष का कितना पॉजिटिव, कितना नेगेटिव सामने रखते हैं ये भी मायने रखता है। हमारा एक मॉडल है वो समझाता हूँ। हमारी प्रिंट न्यूज़ और टीवी चैनल का एक बड़ा हिस्सा न्यूट्रल, फील गुड़ या किसी सामाजिक कल्याण वाली बातों से जुड़ा होता है ताकि एक बड़ा वर्ग हमें देखे, खरीदे और उनके मन में हमारी अच्छी छवि बने। दूसरा भाग राजनीति, विचारधारा….सीधा बोलें तो लोगों में ‘तेरा-मेरा’ वाली बातें। अब अंदर की बात से समझो, शब्दी दल अपनी याड़ी पार्टी है और जो अपनेआप हमें उनकी विरोधी पार्टी महाक्रांति दल का एंटी बना देती है।”

शोभित – “पर…”

वर्णित – “ये लेकिन-पर को सर्जरी करवाकर निकलवा क्यों नहीं लेता तू? बार-बार का टंटा ख़त्म हो। सुन, अब हम क्या करते हैं, न्यूट्रल ख़बरों के बीच में अप्रत्यक्ष विश्लेषण और ख़बरों को काट-छांट कर शब्दी दल की सकारात्मक प्रेस और महाक्रांति की रेड़ मारती प्रेस। रिकॉर्ड के लिए इतना अनुपात ज़रूर रखते हैं कि कहने को हो सके कि देखो हम तो शब्दी दल की निंदा, उनपर सवाल उठाती न्यूज़ भी प्रकाश में लाते हैं। मैंने एक सॉफ्टवेयर बनवाया है अपनी वेबसाइट और चैनल के लिए। यह सॉफ्टवेयर समय और ख़बरों की संख्या के हिसाब से बताता है कि किस तरह खबरों के बीच में अपने एजेंडे वाली ख़बरें परोसनी हैं। लंबे समय तक ऐसा होने पर लोगों के मन में एक विचारधारा के प्रति पूर्वाग्रह, गलत बातें बैठ जाती हैं और दूसरे खेमे को बेनिफिट ऑफ़ डाउट मिलता रहता है। काम की बात ये है कि अपना पैसा और नाम बनता रहता है।”

यह सब सुनकर शोभित को तो जैसे अपना जीवन ही झूठ लगने लगा था। उसे आश्चर्य हुआ कि सम्मानित होते समय, लोगों से तारीफें सुनते हुए उसके पिता और बड़े भाई सीधा चेहरा कैसे रख लेते हैं। उसके विचारों को वर्णित के धक्के ने तोडा।

वर्णित – “अच्छा अब तू कोई हीरो वाला स्टंट करने की तो नहीं सोच रहा ना? हमारा मीडिया हाउस सुधारने के लिए कैंपेन। मत सोचना! वो सब फिल्मों में होता है। यहाँ करेगा तो पापा तेरा वेज मंचूरियन बनवा देंगे।”

शोभित में अभी इतनी हिम्मत ही कहाँ थी? “शायद कुछ सालों बाद…” इतना सोच नज़रे झुकाकर शोभित अपने केबिन की तरफ बढ़ गया।

समाप्त!
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#ज़हन



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