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@dawriter

कशमकश जिंदगी की

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rajmati777 by  
rajmati777

आज सभी विवाह के रिसेप्शन में जाने के लिए तैयार हो रहे थे। मिशा को लगा कि घर वाले उसे भी आवाज़ देकर कहेंगे, मिशा चलों तुम भी फांक्शन के लिए तैयार हो जाओ। और तुम नहीं आ रही हों तो बाबू को हमारे साथ भेज दो।

मिशा जब विवाह कर ससुराल आई तो वो यही चाहती थी कि सभी मिलजुल कर रहे। आपस में कोई मनमुटाव न हो। वो हर रिश्ते को मजबूती प्रदान करना चाहती थी। पर इंसान जो सोचता है वो कभी पूरा होता है क्या।

सभी तों इस घर में अपनी मनमानी चलाते हैं। इच्छा हो तो बोल लिये, नहीं तों बीमार भी हो जाओ तो कोई आकर पूछने वाला नहीं। मिशा की जिंदगी इसी अन्त्तर्द्वन्द और कशमकश में उलझकर रह गई थी। कितना झूठ बोलते हैं घर में यह सोचती और वो परेशान हो जाती। समय ऐसे ही बीतता जा रहा था।

..... आज मिशा के मायके में शादी थी। उसने घर में सभी को निमंत्रण दिया। सभी शामिल होना। घर में उसके दो जेठ जेठानी थे। सबको बोला।

"अच्छा भाई साहब, भाभी मैं शादी में जा रही हूं, आप सभी भी जल्दी आना।"तों तपाक से भाभी बोल पड़ी,"आप मेरे भाई की शादी में कब आए थे। और आप के वहां से तो फोन भी नहीं आया।"...... मैं बोली,"वे लोग आये थे, कार्ड देने पर घर पर कोई नहीं था, तो दे कर चले गए। अब मैं बोल रही हूं ना, वो बोले,या मैं बोलूं, बात तो एकं ही है।"

और मीशा मनुहार कर मायके शादी में सम्मिलित होने चली गई। वहां सबका इन्तजार किया, पर कोई नहीं आया। वो शादी से निपट ससुराल आ गई।

मन ही मन बहुत दुखी भी हो रही थी। घर आकर किसी से नहीं बोली। किसी ने आकर पूछा भी नहीं की शादी कैसी रही। सब कुछ छोड़ बेटी ससुराल आती है और वहां जब अपनत्व नहीं मिलता, प्यार नहीं मिलता तो वो कितना अकेला पन में महसूस करती है। पर अब तो मिशा की जिंदगी का यह एक हिस्सा ही हो गया था।

"मिशा, भाभी की कार की चाबी देना, भाई साहब भाभी जी मेरठ जा रहें हैं, छोटे भाभी के पीहर।"...."पर अभी दो दिन पहले मेरे मायके में शादी थी तो कोई शरीक नहीं हुआ, और वहां...."कहते कहते मिशा की आंखों से आंसू बहने लगे।

दोनों भाभी एक दूसरे की मेरे सामने कितनी बुराई करती हैं, पर दोनों तों एक ही हैं। मुझे तो फ़ालतू में बुद्धू बना रखा है। अब मिशा अपने पति को बोलती भी तो क्या बोलती। वो मेरा फेवर तो लेगा नहीं। कितनी अजीब परिस्थितियों का हमें सामना करना पड़ता है कभी कभी मिशा यह सोचती शायद मुझ में ही कुछ कमी है। पर क्या कमी है, वो अभी तक समझ नहीं पाई।

जिन्दगी में रिश्ते जैसे दिखते हैं वैसे होते नहीं है। सारे रिश्ते मतलबी। कितने भी झुक जाओ, पर चापलूसी करने नहीं आती तो जिंदगी भर हमें ठोकरें ही खानी पड़ती है।

आखिर क्यों? कितनी बार न झुकूं। रिश्तों की डोर को मजबूत करने के लिए अपना वजूद ही खो दूं।.....ना ना मुझसे तो यह नहीं होगा। इतना तो सबका ख्याल रखती हूं, किसी को अपशब्द नहीं कहती, सबका सम्मान करती हूं, पर‌ घर‌ वालो का ऐसा व्यवहार।

मिशा की कशमकश चल रही थी। अच्छा है अब मैं अपने और अपने बच्चों के लिए ही जीऊं। क्यों परवाह करूं किसी की। जब घर वाले मुझे अपने घर का सदस्य ही नहीं मानते तों फिर मैं इस रिश्ते को लेकर क्यों परेशान हूं। मेरे दिल के करीब एक गीत था जिसे मैं हर पल गुनगुनाती थी, और आज भी पुनः गुनगुनाने लगी....

"जिन्दगी का सफर है ये कैसा सफ़र कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं।।"

Image Source: expressthoughtblog



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