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@dawriter

दर्द

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आज भी याद है वो पल जब मैंने, ससुराल में पहली बार अपने कदम रखे थे। गीत,हंसी-मजाक,रस्मों और फरमाइशों के बाद मैं कमरे में बैठी आराम कर रही थी और आप किसी न किसी बहाने से कमरे में आते और मुझे देख मुस्कुराते हुए निकल जाते। एक-दूसरे का साथ कभी न छोड़ने की कसम खा कर हमने अपने जीवन की शुरुआत की। कुछ महीनों बाद मैं आपके पास रहने आ गयी। सब कुछ कितना प्यारा था। छोटा सा घर और उसमें बस हम दोनों और हम दोनों का एक दूसरे के लिए बेशुमार प्यार। आपके ऑफिस जाते ही आपके आने का इंतजार। हर रोज आपके पसंद का खाना बनाना,घूमना-फिरना,घण्टों बातें करना कभी कभार के छोटे-मोटे झगड़े।

फिर धीरे-धीरे वो छोटे-छोटे झगड़े बढ़ने लगे। उन झगड़ों का कोई कारण तो नहीं था फिर भी झगड़े हो जाते थे। धीरे-धीरे समझ में आने लगा आपको गुस्सा बहुत आता है और जब आपको गुस्सा आता तो आप का खुद पर नियंत्रण ही नहीं रह जाता था। मैं कितना घबरा जाती थी आपका वो रूप देख कर, फिर सोचती मेरा प्यार सब कुछ ठीक कर देगा लेकिन वो मेरी गलतफहमी थी। आपकी हर रुसवाई मुझे कमजोर बनाती जा रही थी। समझ में नही आता जो इंसान बाहर वालों के सामने इतना अच्छा रहता है वो गुस्सा आते ही इतना अजीब कैसे हो जाता है। आपके माँ, पापा,भाई और बहन सबसे मदद मांगी थी मैंने, सबने कहा सब ठीक हो जायेगा। सब आपके गुस्से से डरते थे,मुझे भी चुप रहने को कहते थे। मैं चुप कैसे रहती??वो तो आपके साथ नहीं रहते थे,उन्होंने तो आपके साथ एक खुशनुमा जिंदगी बिताने के सपने नहीं देखे थे,जिंदगी तो मुझे बितानी थी आपके साथ तो मैं चुप कैसे रहती। जब किसी ने मेरा साथ नहीं दिया तो मैंने अपनी जिंदगी खुद से ठीक करने की ठानी। मैं आपको समझाना चाहती थी कि छोटी-छोटी बातों का मुद्दा बना कर झगड़ने से जिंदगी बेरंग हो जाती है। एक ही बार तो मिली है जिंदगी तो इतना गम्भीर क्यों हुआ जाये। पर हुआ क्या आप का गुस्सा और बढ़ गया इतना कि आपने मुझ पर हाथ भी उठाने लगे।

फिर हमारी जिंदगी में हमारा अंश आया,बहुत खुश थे हम दोनों। मुझे हमेशा से लगता था कि आप खुद को बदलना चाहते हैं और अंश के आने के बाद सबकुछ ठीक हो जाएगा। कुछ दिन तक सच में सब ठीक था लेकिन गीदड़ शेर की खाल कब तक ओढ़ता। अब आपके गुस्से के अलावा आपका गैरजिम्मेदार रवैया भी मुझे बहुत परेशान करने लगा था। बच्चे की,घर की हर जिम्मेदारी सिर्फ मेरी थी। अंश की तबियत खराब होने पर डॉक्टर को दिखाना बस मेरा काम था। राशन लाना,अंश की और मेरी जरूरत का हर सामान लाना बस मेरा काम था। बेेशक आप कमाते थे लेकिन महीना का खर्चा भी आप अहसान की तरह देते थे। बात-बात पर गाली देना,मेरे मायके वालों को भला-बुरा कहना आपका पसंदीदा काम बनता जा रहा था,वो घर वाले जो मुझे हमेशा "पति" शब्द का महत्व ही समझाते रहते थे।

अंश बड़ा हो रहा था,खर्चे बढ़ रहे थे और बढ़ रही थी आपकी गैर जिम्मेदार सोच। घर में रहकर भी आप हमारे साथ नहीं होते थे। टीवी,मोबाइल और लैपटॉप के बीच आपकी अपनी दुनिया थी। मैं घण्टों आपका चेहरा देखती थी और सोचती थी कि अब आप देखेंगे और पूछेंगे क्या हुआ? पता है इन सबके बावजूद भी मैं आपसे बहुत प्यार करती थी। हर रोज इस उम्मीद में रहती थी कि आप बदल जाएंगे। आपके साथ बिताये हर अच्छे पल का भगवान से शुक्रिया करती थी। लेकिन आप का व्यवहार मेरे साथ ही नहीं मेरे बच्चे के साथ भी उदासीन ही रहता था। आप अपने मन के बादशाह थे आपका मन करे तो हम हंसें जब आपका मन न हो तो हम आपके सामने भी न पड़ें।

अंश अब सब कुछ समझने लगा था। अक्सर मुझसे पूछता,"पापा ऐसे क्यों हैं"??वो जब अपने दोस्तों के पापा को उनके साथ खेलते देखता तो बहुत मायूस हो जाता था। मुझे लगा उसे किसी साथी की जरूरत है और इस तरह वंश हमारी जिंदगी में आ गया। बहुत कुछ बदल गया मेरी जिंदगी में एक आपके सिवा। आपकी मत्वाकांक्षाओं की राह में हमारी छोटी छोटी खुशियां कुर्बान हो रही थीं। हम एक सामान्य परिवार की सामान्य सी जिंदगी के लिए तरसते थे। हर व्रत,पूजा कर के मैं थक चुकी थी लगता था भगवान भी सो गए हैं। आपका पुरुष होने का घमंड आपको आपकी कमियाँ स्वीकार नही करने देता। आपको लगता,आप जैसे हैं अच्छे हैं। आप जो करते हैं सही है। महीने में 6 दिन के आपके अच्छे रूप के लिए मैं पूरे महीने का कष्ट झेल जाती थी। इसलिए नहीं कि मेरे पास और कोई चारा नहीं था बल्कि इसलिए कि मैं आपसे बहुत प्यार करती थी।

अब तो मैंने इसी जिंदगी को अपनी नियति मान लिया है,जब पार्क में किसी जोड़े को बात करते देखती हूँ तो एक अजीब सी कसक उठती है दिल में......काश इस दुनिया में कोई मुझे भी समझने वाला होता,जिससे मैं अपने दिल की हर बात कर पाती। सब कुछ होने के बाद भी मैं बिल्कुल अकेली हूँ। लोग कहते हैं बाहर निकलो,खुद में मन लगाओ। कैसे निकलूँ??आपको तो वो भी नहीं पसंद। शादी के 15 साल बाद भी मुझे यही डर लगता है कि जाने किस बात पर आप नाराज हो जाएं,जाने कौन सी बात आपको बुरी लग जाये। कभी-कभी सोचती हूँ क्या आपका मन नहीं करता होगा एक सामान्य जिंदगी जीने का,जिसमे पति-पत्नी दोस्त की तरह रहते हैं। बच्चे अपने माँ-पापा के बीच का प्यार और सम्मान देख खुश होते हों।

अब ये अकेलापन ये उदासी मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं और अब मुझे कोई फर्क भी नही पड़ता। मैंने अपनी जिंदगी से पति के नाम से जुड़ी हर भावना को निकाल दिया है। आप अब बस मेरे बच्चों के पिता हैं,आपकी बेरुखियों ने मुझे बहुत मजबूत बना दिया है,लेकिन एक दिन आएगा जब आप मेरे साथ के लिए तरसेंगे और मैं आपसे बहुत दूर जा चुकी रहूँगी। एक दिन आएगा जब आप अपने बच्चों के अपनेपन को तरसेंगे और उनके पास आपके लिए समय नहीं रहेगा। आपके पास सिर्फ और सिर्फ अफसोस रहेगा आपका साथ देने के लिए। आप रोयेंगे,तड़पेंगे लेकिन कोई नहीं होगा आपके आँसू पोंछने के लिए और ऐसा होगा जरूर पतिदेव ये जीवन चक्र है आज मैं रो रही हूं कल आप रोयेंगे। तब तक के लिए डायरी के पन्ने ही मेरे सच्चे साथी हैं।

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दोस्तों एक औरत के लिए पति के प्यार और सम्मान से बढ़कर कोई दौलत नहीं होती लेकिन दुनिया में कुछ ऐसी बदनसीब औरतें हैं जिन्हें यह सुख नहीं मिलता। अगर आपके आस-पास भी कोई ऐसा शख्स हो तो उसे जरूर समझाईयेगा, कि इस जिंदगी को झूठे दम्भ और दिखावे से दूर होकर समझे,परिवार और प्यार से बड़ी न कोई दौलत है ना कोई प्रतिष्ठा। ।

Pallavi vinod

Image Source:pmg



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