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@dawriter

सुभागी बस नाम की..

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सुभागी यही नाम है उसका। माँ बाप ने यह सोचकर रखा होगा कि भाग्यवती निकलेपर........बेचारी😢यही संबोधन मिलता है उसके लिए। ऐसे इलाके में जन्म लिया जहां लड़की होना मतलब कसूर। बचपन में ही ब्याह तय कर दिया गया....पास के ही गांव वाले मास्टरजी के बड़े छोरे से..,नाम था सुंदर।

पढ़ाई लिखाई के नाम पर पांचवी पास की थी बस। सोलह पूरे भी नहीं हुए कि ब्याह की तैयारी शुरू और अठारह के सुंदर से ब्याह हो गया उसका। बेचारी को यही सिखाकर भेजा गया जो पति और ससुराल वाले कहे चुपचाप मान लेना। कहने को पांच सदस्यीय परिवार था दो ननद,सास ससुर,पति और वह हो गयी छठवी सदस्य। ससुर जी की नौकरी के चलते पूरा परिवार गांव छोड़ पास के कस्बे में आन बसे थे। लगभग हर दिन मेहमानों का आना जाना लगा ही रहता।

सास ने एकाध साल तो काम सिखाने की गुरेज से उसका साथ दिया फिर बैठ गयी सास के सिंहासन पर। मास्टर जी की पत्नी होने का उन्हे बड़ा घमंड था और उनकी बेटियों को भी। अब सारा काम सुभागी के जिम्में। बेचारी से कुछ ठीक से होता ही नहीं था। तीनों सास ननद मिलकर खूब परेशान करते ताना मारते। दूसरों के सामने हमेंशा यहीं कहते जाने कैसे कर्म किए थे जो ऐसी बहू मिली। सुंदर जी तो बाहर पढ़ने गए थे। छुट्टियों में ही आते थे।

कितनी ही कोशिश कर ले सुभागी सच में उससे कुछ ठीक से न होता शायद डर के कारण। कभी सोचती इससे तो अच्छा किसी गरीब के गोबर मिट्टी के घर में सुख से रहती। यहाँ तो हर रोज आत्मसम्मान छलनी होता था। नहीं चाहिए ऐसा बड़ा घर। ऐसे ही अठारह पूरे भी नहीं किए कि गर्भवती हो गयी।

हालत ऐसी थी उसकी कि अगर सभी सदस्यों की तुलना पांच उंगलियों से की जाए तो सबसे छोटी अंगुली सुभागी। खैर अब तक तो सुभागी अभागी ही बनी हुई थी। कम उम्र में गर्भवती हुई ऊपर से देह भी कृशकाय ऐसे में डिलीवरी के वक्त न जाने क्या गड़बड़ हुई कि लड़का तो हुआ पर कमजोर और मंदबुद्धि। शामत ही आ गई बेचारी की। सास ननद के ताने बढ़ गए(इसी पर गया है मंदबुद्धि । ये देखों ये भी तिरछा पैर रखकर चलती है)। अब मानसिक त्रास बढ़ गए थे। दिनभर की कसर रातभर रोकर निकालती। किसी के सामने जाने न दिया जाता न कभी बाजार का मुँह देखा। पंसद की साड़ी शायद ही कभी पहनी हो। कोई इज्जत नहीं थी उसकी।

ऐसे ही कट रही है उसकी जिंदगी। हर रोज गालियां और ताने। ठीक है किसी को कुछ भी न आए पर इतना अपमान तो मत करो। बेचारी कितना सहती है पर कुछ नहीं कहती ये क्या कम है। क्या आप उसे प्यार से समझाकर सिखाएंगे तो क्या वह नहीं सीखेगी। तानों से तो और आत्मविश्वास डगमगा जाता है उसका। उसने तो अब प्रयत्न करना ही छोड़ दिया क्योंकि कुछ भी कर ले सबकी नजरों में है तो वह गांव की गंवार। अब यही उसकी पहचान है। पिस रही है,क्योंकि मायके से भी बेसहारा है,और अपनी ही मानसिकता की गुलाम भी। कहती है,ये जन्म तो ऐसे ही बिताना है पर भगवान से प्रार्थना है,कि अगले जन्म में मुझे पढ़ाने लिखाने वाले परिवार में जन्म देना,,और सबकुछ सिखा भी देना।

क्या इज्जत देने के लिए इतना काफी नहीं कि वह आपके घर की बहू है? क्या बहुए सिर्फ काम वाली होती है,थोड़ा प्यार और सम्मान देकर तो देखिए।

Image Source: sbs



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