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@dawriter

सरस्वती

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सरस्वती अरी कहाँ मर गई री सुरसति ओ सुरसतियाँ.. तंबाकू मलता हुआ,मुंह में फक्का मारता हुआ बिरजू झोपड़े में दाखिल हुआ। चाल री,जरा पानी तो तपा दे,हाथ मुंह धोऊंगा..चूल्हा जल रहा है..ना। सुरसतियाँ तो अपना पोटला बांधने में मगन थी,कहाँ जा रही है..तू बिरजू ने पूछा। और ये बाहर बेर गिरे पड़े है,उठाए ना तूने,झाड़ बुहार कौन करेगा।झोपड़ा है..तो क्या झाड़-बुहार ना करेगी।या पेड़ कटवा दूँ। बेर के पेड़ पर काहे गुस्सा कर रहे हो,ये कंटीला पेड़ मेरे जीवन की तरह है,इसके कांटे मुझे मेरी मुश्किलों की तरह लगते है पर जिस तरह इस पर ये मीठे-मीठे बेर आए है,मेरे जीवन में भी मिठास आएगी,मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रहने वाली और अत्याचार ना सहूंगी सुरसति बोली।मैं अब यहां ना रहने वाली.. क्या बकवास कर रही है,,आज सुबह से..बिरजू बोला।आज का डोज ना मिला तुझे.. रुक तेरे बाल पकड़कर खींचता हूंँ।पिटेगी तभी मानेगी,बात तो ऐसे कर रही है,कौन सा खजाना हाथ लग गया,कहाँ जाएगी, कहाँ रहेगी। रे बिरजवा सुरसतियाँ गरजी..अब नाहीं सहेंगे हम..जा रहे है..हमेशा के लिए तेरी झुपड़ियाँ छोड़कर।रोज पीकर उत्पात मचाता है,काली कमाई करता है..हमें तेरी दरकार नहीं।अभी बीस की भी नहीं हुई मैं,पूरा जीवन बाकी है,ऐसे निर्वाह ना होगा,अब। मिल गई है..वो शहर के बाहर वाली चमड़ा फैक्ट्री में नौकरी.. पगार भी अच्छा है..हम तेरी मोहताज ना है..अब। अच्छा तो लाटसाहबनी अकेले रहेगी कहाँ और सब किराया भाड़ा..का क्या। तू चिंता ना कर..मिल गई है..हमारी तरह तीन और अभागी..दो तो बच्चों वाली है। सब मिलकर ही रहेगी.. साथ।और हम अब अपनी आगे की पढ़ाई भी करेंगी.. जो बचपन में ब्याह के चलते छूट गई थी,और आगे भी अच्छी नौकरी करेंगे। और हाँ..अब कोई हमें सुरसतियाँ ना कहेगा.. आज से हमारा नाम सरस्वती है..सरस्वती। बाहर खड़े बेर के वृक्ष ने भी एकसाथ ढेर सारे बेर बिखेरकर जैसे सहमति जताई।

©कविता नागर



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