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घरेलू हिंसा: एक संकीर्ण सोच

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21 वीं सदी की इस दुनिया में आज भले ही हम चांद तक पहुंच गये हैं, और भले ही हमने कितनी ही तकनीकी प्रगति कर ली हो। लेकिन आज भी हम महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा को रोकने में नाकामयाब हैं।

भारतीय समाज सदियों से ही पुरुष प्रधान समाज रहा है। अपनी प्रधनता को बनाये रखने के लिए उसने महिलाओं को हमेशा दबा कर रखना चाहा है। फिर चाहे वो उनका अपना घर हो या शादी के बाद पति का।

प्रचीन काल से ही हमने महिलाओं को घर के भीतर काम करने वाली, घर को सम्भालने वाली और परिवार का पालन-पोषण करने वाली एक अनावश्यक साधन माना है। शायद आज भी हम उन्हें मनोरंजन का साधन मात्र मानते हैं।

हमारे समाने आय दिन एक न एक ऐसा मामला सामने आता है जिसमे घर की चार दीवारी के भीतर किसी न किसी महिला के अधिकारों को हनन होता ही रहता है। किसी के साथ शारीरिक, किसी के साथ मानसिक या भावनात्मक और किसी के साथ दहेज़ के लिए आर्थिक, तो किसी के साथ लैंगिग हिंसा होती है। घर के भीतर हो रही इस प्रकार की हिंसा ही घरेलू हिंसा को जन्म देती है।

शरीरिक हिंसा के अन्तर्गत महिला के साथ मार-पीट करना, थप्पड़ मारना, किसी अस्त्र या शस्त्र से मारना, और उसे धक्का देना इत्यादि आते हैं।

किसी महिला को बुरा-भला कहना, पुत्र प्राप्ति के लिए उसे बार-बार बांझ कहना, अपशब्द कहना या गालियां देना, चरित्र पर दाग लगाना और जबरदस्ती विवाह करवाना आदि मानसिक या भावनात्मक हिंसा के उदाहरण हैं।

दहेज के लिए उसे परेशान करना, पैसों के लिए जबरन काम करवाना, डरा धमका कर नौकरी करवाना या छोड़वाना, उसकी आर्थिक आवश्कताओं को पूरा न करना, और उसके कमाये धन को छीन लेना आदि आर्थिक हिंसा का भाग हैं।

लैंगिग हिंसा में बिना इच्छा के बलपूर्वक उसके साथ शारीरिक सम्बंध बनाना, जबरन अश्लील चित्र व चलचित्र दिखाना, छेड़खानी करना, और इधर-उधर हाथ लगाना आदि आते हैं।

इन सभी प्रकारों की हिंसा को करना न ही महिला के प्रति अत्याचार है, बल्कि इससे नारी शक्ति की प्रतिष्ठा को भी आहत करना हैै। महिलाओं के प्रति जारी हिंसा आज समाज का एक अहम मुद्दा बन गया है। हमें इन हिंसात्मक गतिविधियों को रोकना ही होगा। हमें महिलाओं के प्रति अपनी संकीर्ण सोच बदलनी होगी और बाहर निकलना होगा ऐसी रूढ़िवादी परम्पराओं से जो उन्हें सम्मान व बराबरी का दर्जा नहीं दे सकती हैं।

आज समाज में अनगिनत महिलाएं घरेलु हिंसा का शिकार हो रहीं हैं । इसे कानूनी अपराध के अन्तर्गत रखते हुए सारकार ने घरेलू हिंसा कानून यानि Domestic Violence Act, 2005 बनाया जो 26 अक्टूबर 2006 को लागू हुआ। उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 को सुचारू रूप से चलाया जा रहा है।

एक सर्वे के अनुसार, भारत में घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की संख्या ढाई करोड़ से भी अधिक है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि इनमें से नाममात्र ही महिलाएं अपना केस दर्ज करावाती है और कानूनी मदद लेती है। जबकि हमारे सविंधान में एक महिला को बहुत से अधिकार दिये गये हैं।

घरेलू हिंसा के एक पक्ष में जहां महिलाओं का एक समूह इस हिंसा का बहुतायत में शिकार हो रहा है वहीं दुसरी ओर स्वंय महिलाओं का एक अन्य समूह वृद्ध माता-पिता, सास-ससुर और सौतेले बेटे-बटियों के प्रति इस हिंसा को जन्म दें रहा हैं।

अपने सास-ससुर की सेवा से तंग आकर महिलाएं उनके साथ हिंसा करती है। उन्हें घर से निकालने के लिए रोज नई-नई योजनाएं बनाकर उन्हें प्रताड़ित करती है। और इस पर भी काम न बना तो उनके स्वंय के बेटे को भी उनके खिलाफ भड़काने लगती है। अचंभित करने वाली बात तो यह है कि कई बार तो बेटा बहकावे में आ भी जाता है। और जाने अंजाने वह भी इस हिंसा का सहभागी बन जाता है।

यह भी देखा गया है कि पुर्नविवाह में जब पति की पुुरानी पत्नी से कोई संतान होती है तो नई आयी पत्नी उसके पुत्र या पुत्री को दिल से नही अपनाती। जबकि शायद उसने दूबारा शादी अपने बच्चों के लिए ही की हो। लेकिन नई मां उसे मारना-पीटना, परेशान करना, खाना न देना और अकेले कमरे में बंद कर देना इत्यादि अलग-अलग तरीको से सताती है। ऐसे में नई मां के प्यार की आश में वो मासूम घरेलू हिंसा का शिकार हो जाता है। कई बार घरेलू हिंसा के परिणाम बड़े भयावह भी होते है। जैसे, हत्या, आत्मदाह, जला देना, आत्महत्या, दुष्कर्म और एसिड अटैक आदि।

ऐसे में महिलाओं को भी जरूरत है, अपने विचारों में परिवर्तन की, अपनो को अपना समझने की और उन्हें प्यार देने की।

आखिर क्यूं हम अपराधों को सहते हैं? क्यूं हम यह सब देखते हुए भी चुप हैं? क्यूं हम मूक दर्शक बनें हुए हैं? क्यूं नहीं हम इसके खिलाफ़ आवाज उठाते हैं? और क्यूं नही हम कानूनी मदद लेते हैं? हम अपनों के लिए कैसे कल का निमार्ण कर रहे है? यह कुछ बड़े सवाल हैं। जिनका जवाब हमें समय रहते खोज लेना होगा वरना शायद बहुत देर हो जायेगी।

मैं धन्यवाद देता हूं DAWRITER COMMUNITY का, जिन्होनें ऐसा मंच प्रदान किया, जहां मैं इन कुरीतियों पर अपना रोष प्रकट कर सकता हूं और अपने विचार समाज के सामने रख सकता हूं।

#stopdomesticvoilence



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