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@dawriter

डाकटिकट

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शाम की सैर से जब लौटा तो दरवाजे पर कुछ रंगीन लिफाफे रखे थे । 

 

उठाकर देखा तो लगभग सभी मेरे द्वारा ही भेजे गए थे । वैसे ही बंद थे जैसे मैंने किया था। हां एक गुलाबी लिफाफा जो कदरन नया था वो मेरे पते पर भेजा गया था ।

 

उसे खोलते वक्त यूं लगा जैसे किसी के अंतर्मन को खोल रहा हूं । उसने लिखा था ।

 

तुम्हारे खत लौटा रही हूं । पागल हो क्या । खुद को खत लिखते हो । खुद से अलग मान लिया तुमने । हाँ सभी लिफाफों के टिकट निकाल लिए हैं । ये कीमत जो तुमने टिकट खरीदकर अपनी बेवकूफी की वजह से चुकाई है मुझे हमेशा याद रहेगी । कहाँ चूक गई जो तुमने ये समझ लिया ।

 

इस छोटे से वर्के के बाद पूरा पन्ना खाली पड़ा था और वैसे तीन खाली पन्ने जुड़े थे । तीसरे पन्ने पर फुटनोट में लिखा था .. सोचा था मायके से तभी वापस आऊंगी जब तुम माफी मांगते हुए लेने आओगे लेकिन नहीं हो रहा यार दो दिनों से सोच रही हूं तुम किस बात की माफी मांगोगे परंतु याद नहीं आ रहा । सुबह स्टेशन आ जाना लेने ।

 

उसने उस लिफाफे का डाकटिकट निकालकर पर्स में रख लिया । जेहन में वो शरारतें घूमने लगीं जो उसने सिर्फ इसलिए की थीं ताकि सॉरी बोलने का बहाना मिल सके ।



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