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@dawriter

मानवता के खिलाफ तेजाबी हमला

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समाज में महिलाओं पर निरंनतर बढ़ रही हिंसात्मक घटनाओं खासकर घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, दुष्कर्म, निर्भया कांड, सामूहिक दुष्कर्म , एसिड अटैक, यौन शोषण, मानव तस्करी आदि में से सबसे दर्दनाक और निर्मम एसिड अटैक है। 


इन वारदातों ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अंततः महिलाओं के प्रति हमारी सोच कहां जा रही है? हम समाज में किस ओर बढ़ रहे हैं? हम अपने भविष्य की और आगे आने वाली नई पीढ़ी के लिए किस प्रकार की रुपरेखा तैयार कर रहे हैं? महिलाओं पर लगातार बढ़ती इंसानी हैवानियत पुरुषों की रुढ़िवादी और कुंठित मानसिकता का परिणाम है। क्या हम महिलाओं का आदर करना भूलते जा रहे ।हैं? या उनके प्रति हमारा सम्मान और प्रेम भाव कम हो रहा है? पुरुषों द्वारा महिलाओं पर इस तरह की हिंसात्मक घटनाओं ने उनमें भेद पैदा कर दिया है।

क्यूं पुरुष महिलाओं के समान सहनशील नहीं होते? पुरुषों की इंसानियत इतनी धूमिल हो चुकी है कि वह एसिड अटैक जैसी दर्दनाक घटनाओं को अंजाम दे रहा है। वे एक क्षण के लिए भी यह नहीं सोचते कि वो जो करने जा रहे उससे किसी के जीवन पर क्या असर होगा और यदि सोच सकते तो बात कुछ और ही होती।

अगर हमारे चेहरे पर एक छोटा सा पिम्मपल भी आ जाता है तो हम उसे हटाने के लिए कितने बेचैन रहते हैे। एक छोटी-सी चोट का दाग छुपाने के लिए लाखों का उपचार करा लेते हैं। तो उस महिला के विषय में विचार कीजिए जिसका पूरा चेहरा तेजाब से जला दिया जाता है। उस वक्त महिला की पीड़ा असहनीय होती है जिसका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। चेहरा ही नहीं कभी-कभी तो इन हमलों में महिला की आंख और कान भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। जिससे वह आजीवन नेत्रहीन और बधिर हो जाती है। कुंठित विचारधारा एक सम्पूर्ण शरीर वाली महिला को दिव्यांग बना देती है।

उनका जला चेहरा कोई नहीं देखेना चाहता। जो उन्हें घुट-घुट कर जीने पर मजबूर कर देती है। इन वारदातों को अंजाम देने वालों को इस बात का तनिक भी ज्ञान नही कि वे अपने प्रतिशोध के लिए किसी की जिंदगी किस हद तक बर्बाद कर रहे हैं। एसिड अटैक केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक हिंसा भी है।

उन्हें लोगों से मिलने व उनके बीच जाने में हीन भावना महसूस होने लगती है। इस हीन भावना के पीछे उनकी नहीं हमारी गलती है। हमारा समाज ही ऐसा है कि जो उनको सम्मान नहीं देता। सम्मान तो छोड़ दीजिए कुछ हमले तो हमारी आंखों के सामने होते हैं और हम खड़े-खड़े तमाशा देखते हैं। हमलावर हमारे सामने से निकल जाता है और हम मूक दर्शक बने रहते हैं।

अगर हम इस घटना की जड़ तक जाये तो यह पाते हैं कि इस घटना के पीछे छुपी वजह बहुत तुच्छ और निम्न कोटि की है। उसने मेरे प्यार को ठुकराया, उसे अपने चेहरे पर बहुत घमंड है, किसी पुरानी बात का बदला, दहेज, विरोध करना, किसी से नफरत, घर की आपसी नोंक-झोंक आदि इन घटनाओं के घटने का कारण बनतीे है।

बदले की भावना हमारी सोच को और हमारे भीतर मौजूद इंसानी तत्वों को खत्म करती जा रही है। हम स्वयं नफरत के बीज बोते जा रहे हैं मोहब्बत के वृक्षों को काट कर। सोचिए अगर महिला भी बदले की भावना रखने लगीं और वे भी पुरूषों की तरह हिंसात्मक हो गई तब इस समाज का वातावरण कैसा होगा? इसके विपरीत महिला अपने धैर्य और सहनशीलता को नहीं खोती वरन इसे स्वीकार कर लेती हैं। कुछ महिला एसिड अटैक के बाद अपने परिवार और रिश्तेदारों को दुख न हो इस कारण आत्म हत्या कर लेती है। तो क्या यह सच में एक आत्महत्या है? नहीं यह हत्या है और इसका जिम्मेदार वह हमलावर ही है।

कुछ महिला इस हमले का जवाब अपनी जिंदगी की दुबारा नई शुरुआत कर देती है। उनके इस साहस को हमें सलाम करना चाहिए। ऐसी महिलाओं द्वारा जिंदगी की नई शुरुआत समाज के उस वर्ग के मुंह पर जोरदार तमाचा है जो यह जघन्य और शर्मनाक कार्य करते है और जो हमले की पीड़िता को कमजोर व लाचार समझते हैं।
अब अगर हम बात करें एसिड अटैक में उपयोग होने वाले एसिड की तो इनमें सलफुयरिक अम्ल H2SO4 और नाइट्रिक अम्ल HNO3 हैं।

आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि अधिकांश हमले में जिनमें पीड़िता किसी स्कूल या कॉलेज की छात्रा होती है उनमें हमलावर अपने कालेज की रसायन प्रयोगशाला से ही एसिड चुराते हैं। बाजार में खुले आम तेजाब बेचने वाले क्या इन हमलों के दोषी नहीं हैं? ऐसा नहीं है कि एसिड अटैक केवल महिलाओं पर ही होता है पुरुषों पर भी यह हमले होते हैं। किंतु इन हमलों क शिकार 80% महिलाऐं ही होती है।

एसिड अटैक के आंकड़े नित्य बढ़ते ही जा रहे हैं। यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। 1990 ई. में बांग्लादेश में एसिड अटैक की घटना सबसे ज्यादा थी। भारत में 2014 ई. में हमलों की संख्या 300 से अधिक थी, जो पिछले वर्षों से कहीं अधिक थी।(स्तोत्र- इंटरनेट)

इन वारदातों को रोकने के लिए हमें आवश्यकता है कठोर कानूनों की। ऐसे नियमों की जिनमें कड़ी से कड़ी सजा का प्रवधान हो। दोषियों की गिरफ्तारी ऐसी हो कि उन्हें जमानत न मिले। पीड़िता की चिकित्सा के लिए कोष स्थापित किया जाये क्योंकि अधिकांश महिलाएं जो गरीब घरों से सम्बंध रखतीं हैं, वे उचित इलाज से वंचित रह जाती हैं। उनके लिए प्लास्टिक सर्जरी का खर्च वहन करना आसान नहीं है। इसका इलाज भी कुछ महंगे और बड़े अस्पतालों में ही हो पाता है।

उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए एक ऐसा संगठन बनाना चाहिए जो पीड़िता को आर्थिक सहयोग प्रदान करे। पीड़ितों की सहायता के लिए कुछ हाथ आगे आते हैं, इनमें कौन सच्चा है और कौन झूठा यह कहना कठिन है। कुछ टीवी चैनलों पर इन हमलों के खिलाफ का जोरदार आगाज होता है किंतु वह केवल टीआरपी बढ़ते ही सिमट जाते हैं। कुछ को तत्काल इंसाफ़ मिलता और कुछ को मरने के बाद। कुछ लोगों को तो उचित चिकित्सा सुविधा भी नहीं मुहैया होती। किसी ने क्या खूब कहा है "If justice is delay, justice is denied". ऐसे में भला हो उस सरकार का जिन्होंने फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया और भला हो उनका जो एनजीओ के माध्यम से पीड़ितों को न्याय और सुविधा मुहैया कराते हैं। ऐसा ही एक सराहनीय कार्य महज 23 वर्ष की रिया शर्मा ने कर दिखाया।

एसिड अटैक की शिकार हुई महिलाओं के दर्द बांटने के लिए 2014 में 'मेक लव नाट स्कार्स' नामक एनजीओ का गठन किया (स्तोत्र- इंटरनेट)।

DAWRITER के योगदान को भी नजरअंदाज नही किया जा सकता जिसने हमें ऐसा मंच दिया जहां हम इन घटनाओं के प्रति अपना रोष प्रकट कर सकते हैं। हमें वचनबद्ध होना होगा कि हम अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार हमलों की शिकार महिलाओं की सहायता करेंगे। विचार करने वाली बात यह है कि एसिड अटैक किसी गली, मोहल्ले, शहर, कस्बे या देश की नहीं बल्कि समूचे विश्व की समस्या है।

कम्बोडिया , पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और भारत आदि में इनकी संख्या अधिक है। हमें इसे गंभीरता से लेना होगा और इसके विरुद्ध अभियान को तेज और तेज करना होगा। हमे इस घटना के कारकों को जड़ से खत्म करना होगा। एसिड अटैक के खिलाफ हमारा संघर्ष अद्योपांत तक चलता रहेगा।

"स्टाप एसिड अटैक"

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