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@dawriter

द ब्यूटीफुल फेस(द्वितीय अंक)

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ujbak by  
ujbak

 

 

पार्ट टू

‘माँ!’

‘बोलो बेटा!’ माँ ने मुरझाई सी आवाज में उत्तर दिया।

‘माँ! मुझे देख कर तुम डरती तो नहीं ना?’ शीनम के भीतर यह सवाल न जाने कब से खौल रहा था? उसने देखा था जब वह बाहर जाती है तो बच्चे डर से जाते हैं। उसे यह भी लगता था कि राह चलते लोग, उसे देख कर रास्ता बदल लेते हैं। वह नहीं जानती लोग ऐसा क्यों करते हैं? सच यह था कि जब वह खुद का चेहरा शीशे में देखती थी तो डरती थी। उसने समझने की ही गरज से यह सवाल अपनी माँ से पूछा था, क्योंकि उसके पास और कोई चारा नहीं था। वह बात करना भी चाहती तो किस से करती? सब उस से कटना ही तो चाहते थे?

‘क्या बात कर रही है शीनम बेटा? मेरे लिये तू अभी भी वही है, संसार की सबसे सुंदर बेटी। मैं अपनी बेटी से डरूंगी भला?’ माँ ने सोचा था कि इस से उनकी दुहिता को संबल मिलेगा, जो जीवन सूत्र उसे खुद से दूर जाता हुआ लग रहा था उसे वह अपने साथ पाएगी, लेकिन शीनम की सोच व्यष्टि तक सीमित नहीं रह गई थी। वह अब समष्टिगत सोचती थी और उसकी समष्टि में खुद की तरह और चेहरे थे।

अगर शीनम सामान्य रही होती तो आसानी से पता चल जाता कि माँ का जवाब सुन कर वह मुस्कुराई है, लेकिन वह सामान्य कहां थी? इसलिये उसके चेहरे पर खिंच आई विद्रूपता की स्मित, महीन सी रेखा उसकी मां न पढ़ सकीं।

‘अगर मैं आपकी बेटी न होती तब?’ शीनम ने अगला सवाल पूछा।

माँ इस प्रश्न के लिये शायद तैयार नहीं थीं। सम्भावित उत्तरों में कई उत्तर हो सकते थे और उनमें एक यह भी था कि शायद उसकी माँ भी उस परिस्थिति में वही करतीं जो आज शीनम को देख कर अन्य लोगों की माँएं करती हैं।

उनका सर झुक गया था और वो चुप ही रही थीं। सच है कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं होते लेकिन सामने वाला समझ जरूर जाता है कि सम्भावित उत्तर क्या रहा होगा? शीनम भी समझ गई थी।

सोचते-सोचते शीनम प्रज्ञा के पास पहुंच चुकी थी। शीनम समझ गई कि वह अपना अतीत याद कर रही है। सुख भी क्या ही चीज है, दुख के क्षणों में इसी की स्मृति सबसे अधिक पीड़ादायक होती है।

‘जो हुआ उसे भूल नहीं सकती तुम, इसलिये मैं ऐसा कुछ नहीं कहूंगी प्रज्ञा।‘ शीनम ने उस से कहा। प्रज्ञा ने जब सर उठा कर उसकी ओर देखा, शीनम को लगा उसकी आंखें कभी बड़ी-बड़ी रही होंगी।

प्रज्ञा की सिसकी अब विद्रोह कर बैठी। कितना रोकती वह खुद को? रह-रह कर बीते समय की सुखद यादें उसे चिढ़ा जाती थीं और वह बार-बार उनको दिखाती ‘देखो! मुझे फर्क नहीं पड़ता।‘ लेकिन यह दिखावा भी निस्सीम नहीं हो सकता था।

‘माँ! घर की याद आ रही है। सोचा था कम से कम उनके सामान्य जीवन में रुकावट नहीं बनूंगी लेकिन…’

शीनम मौन रही।

‘दिल का खिलौना हाय टूट गया.. कोई लुटेरा..’ प्रज्ञा गाने लगी।

माहौल विषादयुक्त हो गया।

शीनम के लिये यह और भी कठिन था।

‘माँ! मैं कुछ करना चाहती हूँ अपने जैसी लड़कियों के लिये।‘ शीनम ने अपनी माँ से कहा था। शीनम नहीं जानती थी कि उसकी माँ ने कहीं न कहीं जीवन के संघर्षों के सामने घुटने टेक दिये हैं। पति मिला तो शराबी, बेटी अच्छी मिली तो वहाँ भी दुर्भाग्य ने साथ न छोड़ा।

माँ सोच में थीं। उन्होनें अपने गहन चिंतन से न जाने यह निष्कर्ष कैसे निकाल लिया कि वह असल में अभागी हैं। जीवन के कष्ट उन्हें मृत्यु के सामने बड़े लगने लगे थे। अब वे अपनी बेटी का दुल्हन बना दैदीप्यमान चेहरा कभी नहीं देख पाएंगी। अब शायद ही उनका नाती उनकी वृद्धावस्था की लाठी भी बन सकेगा? कौन होगा जो आखिर अब कुरूप, कुछ हद तक डरावनी हो चली मेरी बेटी का हाथ थामेगा? ‘ईश्वर? यही है तुम्हारा न्याय? मेरी क्या गलती थी जो मुझे इतने दुख देखने पड़े?’ गहन अवसाद के क्षणों में उन्होनें उस परम सत्ता से कई बार सवाल पूछे थे, जिनके जवाब उन्हें कभी नहीं मिल सके।

शीनम के इस सवाल के साथ ही उन्होनें भी वही गीत गाया था।

‘दिल का खिलौना हाय टूट गया....’

उसके बाद वह एक ओर को लुढ़क गई थीं।

‘शीनम! मैं हार गई बेटा लेकिन तुम मत हारना, तुम लड़ना! मैं अब रुकावट नहीं हूँ। जाती हूं, लड़ना बस...’

कहते हैं दिव्य आत्माओं की रूह आंख के रास्ते निकलती है। शीनम ने देखा था कि माँ की आंखें खुली रह गई हैं।

माँ की लाश को नहलाने के समय शीनम ने सुना था, लोग कह रहे हैं, ‘बड़ी अभागी थी बेचारी, कोई सुख न देख सकी।‘ उसके बाद लोग कोने में खड़ी शीनम को देख लेते थे, संवेदना उन आंखों में कम हिकारत ही ज्यादा शीनम को नजर आई थी।

माँ की देह पर पुराने चोट के निशान अब भी थे, जिन्हें शीनम छूकर उनके दर्द को महसूस करना चाहती थी लेकिन शायद लोगों के बीच जाने पर वितृष्णा उनके बीच एक बार और तैर जाती। शीनम माँ की अंतिम यात्रा में यह भाव नहीं चाहती थी, इसलिये किनारे खड़ी सुबकती रही और भीतर ही भीतर बुदबुदाती रही थी, ‘मैं लड़ूंगी माँ।‘

और आज फिर वही गाना...

शीनम का मन बैठ रहा था पर उसके पास यह प्रदर्शित करने की सहूलियत नहीं थी। वह एक ऐसा अवलंब थी जिस पर समाज के सबसे दुखी लोग अपनी आशा के केंद्र अवस्थित पाते थे। अगर वही कमजोर हो बैठी तो?

‘वह प्रेमी था तुम्हारा प्रज्ञा?’ शीनम ने खुद को सम्हालते हुए पूछा।

प्रज्ञा मौन रही, लेकिन उसका मौन बहुत कुछ कहता था। कम से कम स्वीकृति उसके उस मौन में जरूर थी।

‘मैं उसे चाहती थी और वो मुझे।‘ प्रज्ञा ने कहना शुरू किया, ‘लेकिन उसके प्रेम में ऑबसेशन था माँ! बताइये मैं अपने परिवार को कैसे छोड़ देती?’

शीनम सुनती रही। यह युगों-युगों की एक ही सी कहानी थी जिसमें बदलते हैं तो सिर्फ पात्र।

‘समझाया था उसे, लेकिन नहीं माना।‘

‘अब?’ शीनम ने उस से पूछा।

‘नफरत है मुझे उस से। मैं उसके साथ न भी रहती तो भी उसके प्रेम को महसूस करती रहती लेकिन अब? अब अगर वो सामने आ जाय तो मैं उसे भी जला देना चाहूंगी, कहूंगी देखो! कितना दर्द होता है जब कोई जलता है।‘

शीनम ने प्रज्ञा के चेहरे को गौर से देखा। उसके चेहरे पर उसे बेचारगी में डूबा गुस्सा ही नजर आया।

‘केस किया तुमने?’

‘जी, लेकिन अज्ञात के विरुद्ध।‘ प्रज्ञा ने उत्तर दिया।

‘क्यों? तुम तो जानती थीं कि गुनाहगार कौन है फिर भी?’

प्रज्ञा रोते हुए बोली,

‘मेरे जीवन के साथ जो होना था वो हो गया। मुझे प्रतिशोध जरूर चाहिये लेकिन उसके लिये मैं कानून का रास्ता नहीं लूंगी, मैं इन्हीं हाथों से उसे जलाउंगी। मेरा प्रातिशोध ये होगा।‘

‘लेकिन बेटा कानून का काम है न्याय देना, प्रतिशोध लेना नहीं। फिर ये सोचो, अगर वह खुला ही घूमता रहा तो फिर इन चीजों पर लगाम कैसे लगेगी?’

प्रज्ञा संयत होती हुई बोली,

‘माँ! कोई भी कानून इन चीजों पर लगाम नहीं लगा सकता, लेकिन जब लोग उसके जले हुए चेहरे को देखेंगे तब जरूर वे सोचेंगे कि कभी-कभी बाजी पलट भी जाती है। तब. . . इन सब पर लगाम लगेगी। कानून आप भी जानती हैं माँ, वह रास्ता इतना पेंचीदा है कि अमीर कभी सजा ही नहीं पाता।‘ प्रज्ञा की आंखों में वही भाव थे जो प्रतिशोधातुर आंखों में होते हैं।

प्रज्ञा की मनोदशा और उसके विचार शीनम के लिये नितांत नए नहीं थे। हॉस्टल की सारी लड़कियां कभी न कभी इस स्टेज से गुजरी थीं।

‘घर पर कौन-कौन है?’ शीनम ने माहौल को हल्का करने की कोशिश में कहा। यह सवाल इन परिस्थितियों में वह हमेशा करती थी।

प्रज्ञा को सामान्य होने में वक्त लगा। जब वह सामान्य हुई तब उसकी आंखों में किसी छोटी सी बच्ची की तरह चमक थी। शीनम को यह देख कर थोड़ा हल्का महसूस हुआ।

‘रुकिये! कुछ दिखाती हूँ।‘ प्रज्ञा ने पर्स से अपनी फैमिली फोटो बाहर निकालते हुए कहा।

प्रज्ञा के पापा की तस्वीर पर शीनम की निगाह जम सी गई।

‘मेरे साथ ऐसा तुम क्यों कर रहे हो?’ उसने तब लगभग चीखते हुए कहा था।

‘क्योंकि तुम बहुत सुंदर हो और तुम मेरी कभी नहीं रहोगी, मैं जानता हूँ। इसलिये. . . तुम किसी की नहीं रहोगी।‘

आज वही चेहरा शीनम के सामने किसी एसिड- अटैक विक्टिम लड़की के पिता के रूप में खड़ा था। शीनम का मन हुआ वह आज खूब जोर से चीखे, अपने दुख को कम कर ले, लेकिन वह ये नहीं कर सकती थी।

कारण?

आज उसके सामने प्राकृतिक न्याय का वह उदाहरण खड़ा था जिसके अपने लिये न्याय-संगत होते हुए भी वह खुश नहीं थी। होती भी कैसे? सामने जली हुई लड़की प्रज्ञा नहीं थी, वह केवल एक और शीनम थी।

‘क्या नाम है तुम्हारे पापा का बेटी?’ प्रज्ञा से पूछते समय उसकी आवाज लड़खड़ा सी गई थी।

‘श्री शेखर वर्मा। वे बहुत अच्छे हैं, मेरा हमेशा ख्याल रखते हैं।‘ प्रज्ञा के चेहरे पर हल्की खुशी सी थी।

‘श्री शेखर वर्मा!’ शीनम ने यह नाम दुहराया। श्री पर उसका चेहरा विकृत सा हो गया लेकिन वे मनोभाव कोई पढ़ न सका।

शीनम को आज अपने अपराधी का असली नाम पता चला था। पहली बार।

न जाने क्यों उसे माँ की पीठ के वे लाल निशान याद आ गए?

 

क्रमशः

द ब्यूटीफुल फेस (पहला अंक)

द ब्यूटीफुल फेस(तृतीय अंक)

द ब्यूटीफुल फेस (अंतिम अंक)

 

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