RAGINEE SRIVASTAVA

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बहू या अलादीन का चिराग?

हमारे देश में बहु को अलादीन का चिराग माना जाता है जो कभी भी कुछ भी करने के लिए उपस्थित रहती है।

यह कैसा बधावा? ज़रूरत या दिखावा!

आज हम एक दिखावटी समाज में जी रहें हैं। यह भवना इतनी गहरी हो चुकी है कि कुछ बेटिया ससुराल में दिखावे के लिए अपने मायके से वक्त बेवक्त डिमांड करती रहती हैं और वे बिचारे भी बेटी का ससुराल है सोच कर किसी तरह उसकी मांगों को पूरा करते रहते हैं।

क्या आपके घर में भी कोई सौम्या है...???

हमारे समाज में हम अपनी बेटियों को चाहें कितना भी पढ़ा लें हमारी बेटिया चाहें कितनी भी गुणी और सुसंस्कृत हों उनकी शादी देखते समय हम खुद को बहुत कम समझने लगते है...यह एक बहुत बड़ी विडंबना है जो आज भी देश के कई भागों में विशेष रूप से मध्यम वर्गीय समाज में प्रचलित है।

माँ की ममता बदल गई...

माँ माँ होती है मगर वही माँ जब एक सास बनती है जो कि माँ का ही रूप होता है तब उसकी भावनाये क्यूँ बदल जाती है समझ में नहीं आता है।।

बचपन कहाँ खो गया??

बचपन सभी को प्रिय होता है और बचपन के दिन यादगार पर क्या अपको नहीं लगता कि आज के बच्चों बचपन में वो बात नहीं रही?

मायका: ‘कुछ अहसास’ ‘कुछ उम्मीदें’... जो हर दिल में जगती है।।।

मायका हर लड़की के जीवन में बेहद अहम होता है। किसी भी लड़की का मायका उसे याद करता हो या नहीं मगर उसे ‘मायका’ का सम्मोहन हमेशा होता है।

खुशियों का पासवर्ड...

आज के युवा वर्ग के पास साधन सुविधा एवं सम्पन्नता है इस सर्व समर्थ पीढ़ी के पास अगर कुछ नही है तो वह है वास्तविक खुशिया जो की अमूल्य होतीं हैं।

बच्चों का बचपन जी लें...

दैनिक जीवन की भागदौड़ भरी दिनचर्या में हम रोज़ बेहद कीमती पलों को नही जी पाते। वो है हमारे “बच्चो का बचपन” जिसकी कसक बाद में बेहद टीसती है।

निशा तुम डरती क्यों हो??

ससुराल में अपनी जिम्मेदारियों को बखूभी निभाती निशा को सासु माँ से मायके जाने की इजाज़त लेने में बहुत डर लगता है

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  • Female
  • 07/08/1974

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