Mohit Trendster

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काल्पनिक निष्पक्षता

“...निष्पक्ष पत्रकारिता, एथिक्स वाला मीडिया नाम की कोई चीज़ नहीं होती। बस के खाई में गिरने से 5 लोगों की मौत जैसी प्लेन ख़बरों के अलावा बयान, घटना, विवरण, निष्कर्ष सब इस बात पर निर्भर करते हैं कि किस मीडिया में पैसे का स्रोत क्या है और ऊपर के मैनेजमेंट से कौन लोग जुड़े हैं।”

हम सब (आंशिक) पागल हैं! #लेख

किसी साधु-संत को अक्सर कहते सुना होगा, "दुनिया पागल है!" क्या वाकई हम सब पागल हैं?

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

अपने रचे पागलपन की दौड़ में परेशान समाज की कुत्सित मानसिकता "अच्छा-अच्छा मेरा, छी-छी बाकी दुनिया का" पर चोट करती "वीभत्स रस" में लिखी नज़्म-काव्य....

“…और मैं अनूप जलोटा का सहपाठी भी था।”

नशे से नज़र ना हटवा सके… उन ज़ख्मों पर खाली वक़्त में हँस लेता हूँ, मुफ़लिसी पर चंद तंज कस देता हूँ… बरसों से एक नाव पर सवार हूँ, शोर ज़्यादा करती है दुनिया जब… उसकी ओट में सर रख सोता हूँ।

यादों की तस्वीर (लघुकथा)

बीते ज़माने की धूल में सने पन्ने केवल यादों में रह जाते हैं....

खौफ की खाल (नज़्म)

खौफ की खाल उतारनी रह गयी, रुदाली अपनी बोली कह गयी... रौनक कहाँ खो गयी? तानो को सह लिया, बानो को बुन लिया। कमरे के कोने में खुस-पुस शिकवों को गिन लिया।

जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख)

बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं?

समूह वाली मानसिकता (लेख)

समूहों की रेखाओं में उलझे समाज का विश्लेषण।

चाहे दरमियाँ दरारें सही!

दरारों के बीच से अपनी दूरियों पर मुस्कुराती मल्हार....

खाना ठंडा हो रहा है…

काश की आह नहीं उठेगी अक्सर, आईने में राही को दिख जाए रहबर, कुछ आदतें बदल जाएं तो बेहतर, दिल से लगी तस्वीरों पर वक़्त का असर हो रहा है… …और खाना ठंडा हो रहा है।

गुलाम-ए-हिन्द (करगिल काव्य श्रद्धांजलि)

छंट गया सुर्ख धुआं कब का....दब गया ज़ालिम शोर .... रह गया वादी और दिलो में सिर्फ....Point 4875 से गूँजा "Yeh Dil Maange More!!" ज़मी मुझे सुला ले माँ से आँचल में ....और जिया तो मालूम है ... अपनी गिनती की साँसों में यादों की फांसे चुभ जानी ... रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी....

झुलसी दुआ (कहानी) #ज़हन

उसकी दिनभर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए...

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