Mohit Trendster

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1984 की टीस (Pogrom 84)

यह कविता समर्पित है सिख विरोधी हिंसा (1984) में मारे गये और पीड़ित लोगों को.... उस बेरहम वक़्त को झेलती एक जवान सिख लड़की की कहानी....

भीगी बैसाखी

बड़ा गहरा है तेरा कुआँ.... जो गुम हुई इसमे माँ की दुआ... खुदगर्जी में तूने अपनी दीवारों को लाल कर डाला... कितना ज़ालिम है तू ओ जलियांवाला... Jallianwala Bagh Massacre (Amritsar, 13 April 1919)

सुनहरी जो मीरा

तानो की अगन यूँ सही, काँटो की सेज पर सोयी, रूखी सी ऋतुओं में निश्चल वो रही, सुनहरी जो मीरा स्याह कान्हा में घुली। Poem on Mirabai

मेरी आज़ादी का रुआब

जंग तुझसे नहीं तेरे खयालो से है... बात मेरे ज़हन मे जलते सवालो से है... गलत होकर भी सही ठहराये गये जवाबो से है... जिनके पीछे रहकर तू राज करता उन हिजाबो से है...

इज़्ज़त की भीख

जहाँ हम प्रमोशन, वेतन, अवार्ड आदि में उपलब्धि ढूँढ़ते हैं....ये तो बस पति और परिवार में ही अपने सपने घोल देती हैं।

दांव

किसको मनाने के ख्वाब लेकर आये हो? घर पर इस बार क्या बहाना बनाये हो? रहने दो और बातें बढ़ेंगी, पहरेदार की त्योरियां चढेगीं। चलो हम कठपुतली बनकर देखें, जलते समाज से आँखें सेंके...

रिक्शेवाली चाची

...वो तो बेचारे सबके पंचिंग बैग होते हैं। अन्य लोगो के अहंकार को शांत करने वाला एक स्थाई पॉइंट। ऐसा ही कुछ सीधे लोगों के साथ उनके घर और बाहर होता है। कई बार तो सही होने के बाद भी ऐसे लोग बहस हार जाते हैं।

सच्चा सैल्यूट

विमलेश - "अच्छा, थाने के आस-पास ये बुढ़िया कौन घूमती रहती है? इतना मन से सैल्यूट तो सिपाही नहीं मारते जितने मन से वो सैल्यूट करती है।" दीवान - "अरे वो पागल है सर कुछ भी बड़बड़ाती रहती है। डेढ़ साल से तो मैं ही देख रहा हूँ..."

ख्याल...एहसास

शख्सियत को स्याह में समेटती हरजाई मद्धम कमज़र्फ तेरी परछाई...

रोग में मिला जोग…

डॉक्टर, कभी-कभी दो दर्द एक-दूसरे का ध्यान बँटाकर ख़त्म हो जाते हैं।

झूठी भावना पर सच्चा आशीर्वाद

"क्या यार! थोड़े दिन बाद नहीं जा सकती थी मम्मी? इतना मटेरियल जमा कर रखा था मैंने....थोड़ा-थोड़ा करके ऑनलाइन डालती। अब खुद उनकी डेथ की अपडेट नहीं कर सकती...सब कहेंगे मातम की जगह नौटंकी कर रही हूँ।"

एड्रनलिन रश वाली झुरझुरी (कहानी)

आज दिलीप उसी दुनिया में सांस लेने को तड़प रहा था...जिसे अक्सर भाड़ में भेजकर उसे एड्रनलिन रश वाली झुरझुरी मिलती थी।

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