Dhiraj Jha

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साढ़े तीन ऑंखें

एक कहानी मानवीय प्रेम की, एक कहानी एक आम औरत की, एक कहानी एक माँ की

क्या इतना ही था प्यार ? (कहानी)

एक लड़की जिसका एक चाहनेवाला है। जो दावा करता है कि वो उसे बहुत प्यार करता है। लड़की मान जाती है उससे प्यार करने के लिए मगर फिर कुछ ऐसा होता है कि उसके चाहनेवाले का प्यार कुछ पलों में ही हवा हो जाता है।

सफ़र 'जिंदगी के पतंग से परिंदा हो जाने की कहानी'

यह कहानी निम्मी नामक लड़की की है, जिसे ना चाहते हुए भी अपने पिता की खुशी के लिए एक एन आर आई से शादी करनी पड़ती है। यह शादी उसकी जिंदगी बदल देती है। निम्मी के ज़िंदगी की डोर इस हाथ से उस हाथ होते हुए ना जाने किस मुकाम तक पहुंचे।

सुलोचना....( सच्ची कहानी )

बदलाव का अधिकार हर किसी के पास है । पर इस अधिकार का पूरा फायदा उसी को मिलता है जिसमें लड़ने की ताकत है, जिसमे हक़ छीन लेने की हिम्मत है । जो लड़ सकता है अपनों के ख़िलाफ, जो चुनौती दे सकता है सनातन से चले आ रहे बेकार के रिवाज़ों को

समझ

एक पुरानी रचना पर नज़र पड़ी तो सोचा आपकी नज़र भी कर दूँ। शायद कोई मुझ जैसा गलती करने से पहले संभल जाए।

पापा के लिये

निडरता इंसान में समय के साथ अपने आप आ जाती है | परिस्थितियाँ खुद लड़ना सिखा देती हैं | बच्चपन में बड़ा डरपोक था अकेलो सोना तो सीखा ही नही था कभी |

पिता के रंग

पिता उस छेनी और हथौड़े की तरह होते हैं जो खुद के चेहरे की उदासी छुपा कर चोट करते हैं , इतनी चोट जो तुम जैसे पत्थर को नायाब मूर्ती में तराश दे |

और फिर मनीशंकर भाग गया (एक कहानी युवाओं की)

अब वो अपने दायित्वों के निर्वाह से बिल्कुल नहीं डरता था और ना ही कहीं भाग जाने के बारे में सोचता था । कुल मिला कर वह अपनी उलझनों से बाहर निकल चुका था ।

मरने के बाद सम्मान

​मरने के बाद सम्मान होगा मेरे शब्दों को तवज्जो तब मिलेगी

मेरी और नियती के बीच की लड़ाई

इन दिनों मैं खुद को मजबूत कर रहा हूँ क्योंकि आने वाले वक्त में मुझे इस मजबूती की बहुत ज़रूरत पड़ने वाली है दरअसल मुझे नहीं ये ज़रूरत मेरी ज़िम्मेदारियों को पड़ने वाली है । कुछ सालों पहले ऐसे ही दौर से गुज़रा था मगर तब डर नहीं था

पापा

​पहले ही क्षमा के साथ ये बात बता दूँ की कुछ महीनों तक जब मेरे सामने उन मनहूस दिनो की कोई पोस्ट आएगी तो मैं पापा पर ना चाहते हुए भी लिखने पर मजबूर हो जाऊँगा । क्या करूँ खुद से अपना हाल कह कह कर थक गया हूँ इसीलिए यहाँ लिखने पर मजबूर हो जाता हूँ ।

“पिता से पहले पिता के बाद”

डेढ महीने हस्पतालों चक्कर काटे थे उन भाईयों ने अपने पिता को लेकर । वो पिता जिसका घूरना ही काफी होता था इन बेटों के मन में वो डर पैदा करने के लिए जो एक बाप को लेकर हर बेटे में होता है उस बाप को थप्पड़ तक मारे थे इन बेटों ने ।

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  • Male
  • 09/10/1988

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