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@dawriter

स्मृति

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[05/11, 14:04] Manju Singh: बात उन दिनो की है जब हम नये नये दिल्ली शिफ्ट हुए थे। पापा की बदली पटियाला से दिल्ली हो गयी थी तो हम सब भी दिल्ली आ गये थे। उस समय उम्र कुछ 5-6 रही होगी। यहां आने के बाद कुछ दिन तक स्कूल नहीं जा पाये थे क्योंकि स्कूल में दाखिला मिलने में कुछ दिन लग गये थे। घर पर ही मस्ती करते रह्ते थे। दिन भर खेलते पड़ोस के अंकल होमयोपेथ थे। उनकी बेटी हमसे काफी बड़ी थीं यानी दीदी। उन्के घर खेलने चले जाते थे। वो बहुत प्यार करती थी हमें। मैं और मेरी छोटी बहन चुपचाप अंकल के कमरे में जाते जहां वे अपनी दवा रखते थे। जी हाँ वही मीठी -मीठी , नन्ही - नन्ही सी सफेद गोलियां। हमने एक दिन चुपके से खा के देखीं। अहा! मज़ा आ गया था। बस फिर क्या था रोज का काम हो गया हमारा। जाते और मुँह मीठा करके आ जाते थे। कभी किसी को पता नहीं चला।

खैर, हमारा दाखिला हो गया स्चूल में। जब स्कूल गये तो बहुत खुश थे लेकिन वहां का माहौल बिल्कुल नहीं भाया हमें। टीचर नई , बच्चे नये , सब कुछ अलग सा। कुछ दिन बाद टीचर जी के क्रोध का शिकार भी बने। क्लास के कुछ दादा टाइप बच्चे मारते, झूठी शिकयत कर डांट भी पड़वा देते। घर पर बताया तो सबको लगा कि हम स्कूल जाना नहीं चाहते इसलिये बहाने बना रहे हैं। किसी ने हमारी यानि मेरीऔर मेरी बहन की एक ना सुनी

हमने सोचा कि अगले दिन से हम स्कूल तो बिल्कुल ही नहीं जायेंगे चाहे कुछ भी हो जाये। सुबह सवेरे जब माँ ने स्कूल के लिये भेजा तो हम घर से तो निकल गये लेकिन स्कूल ना जाकर स्कूल के पास वाले पार्क में जाकर बैठ गये। खूब मजे किये। बस्ता रखा एक तरफ और झूलों पर झूले, मस्ती की, भाग-दौड़ की और लंच की घंटी जब स्कूल में बजी तो खाना खा लिया। हाहा--और छुट्टी की घंटी बजी तो घर चल पड़े। कई दिनों तक यह सब चलता रहा। आज का समय होता तो पहले दिन ही पकड़े जाते पर उस समय स्कूल वालों ने कोई ध्यान नहीं दिया। अगर उस दिन हम अपना लंच बॉक्स घर पे ना भूल आये होते और दीदी हमें खाना देने स्कूल न आयी होती तो पता नहीं कितने दिन हम ऐसे ही मजे करते। मेरी छोटी बहन ने भी अपना मुंह नहीं खोला किसी के सामने। जानते हैं क्यों ? क्योंकि यह आईडिया उसी का था। मै बहुत सीधी सादी थी ज़्यदातर शैतानियां उसे ही सूझती थीं। खैर दीदी स्कूल पहुंचीं तो पता चला कि हम तो कई दिन से नदारद थे, स्कूल आये ही नहीं थे। उस दिन हम भूखे प्यासे ही खेलते रहे पार्क में। ढूंढा किसी ने इसलिये नहीं कि सब को पता था हम हर रोज की तरह समय पर घर पहुंच ही जायेंगे। और हुआ भी यही हम पहुंचे घर। उस समय मम्मी कपड़े धो रही थीं। बस एक ही बात पूछी। आ गये बेटा स्कूल से?

हम ने बड़े मजे से बस्ता पलंग पर फेंका और कह दिया "आ गये "। बस फिर क्या था ! मम्मी ने तो आव देखा न ताव लगीं हमें थपकी से धोने। इतनी मार पड़ी कि आज भी रूह कांप जाती है याद करके। भई अब तो याद करके सोचते हैं कि इतना दिमाग चला कैसे और इतनी हिम्मत आयी कहां से हमारे अन्दर। हंसी भी आती है अपनी बाल बुद्धि पर। लेकिन बच्चे तो बच्चे होते हैं। फिर शाम को जब पापा आये तो शिकायत कर दी गयी झट से हमारी। लेकिन उन्होने हमे कुछ नहीं कहा और बोले बच्चों की नहीं गलती हमारी है उन्होने हमें बताया था लेकिन हमने उनकी सुनी कब !

अगले दिन पापा स्कूल गये सारी बातचीत की और वापस स्कूल मे छोड़कर आये। टीचर ने हमारी परेशानी समझी और बच्चों की भी डाँट लगायी। उस दिन के बाद न हमे किसी ने तंग किया , न हमने कभी ऐसा कुछ सोचा। फिर तो प्यार हो गया उसी स्कूल से।



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