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@dawriter

सुकून वाली चाय की प्याली

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हम स्त्रियों के जीवन मे सुकून, फुर्सत और तसल्ली जैसे कीमती शब्दों का बहुत अभाव है,कीमती शब्द? जी हाँ बेहद कीमती ..! हम नारियों के जीवन में सुकून शायद बिल्कुल नही है ...जब हम लड़कियाँ थे तब स्कूल, प्रोजेक्ट,सहेलियां घर-बाहर की अनेकों जिम्मेदारियां जैसे परीक्षा, कोचिंग और सिलेबस से जुड़े सैंकड़ों काम होते थे जब हम दो चोटियां बांध जल्दबाजी में निकल जाते थे और फिर आया हमारे कॉलेज का टाइम जब हम नोट्स दबाये मुँह में नाश्ता ठूंस कर भाग जाते थे. फिर चाहे माँ हो या बाबूजी पीछे से चिल्लाते रह जाते "अरे चाय तो पी लेती.."

फिर ये कीमती वक़्त हमारी जिंदगी से फ़ास्ट फॉरवर्ड में भाग जाता है और उस वक़्त हमें उस चाय के कीमती होने का तनिक भी भान नही होता. अब वक्त आता है विवाह का और हमारी जिंदगी का प्रथम अध्याय समाप्त होकर हम अपनी गृहस्थी में प्रवेश करते हैं.." तब नए नए जीवन की उठापटक में,और नए रिश्तों की खींच तान व सामंजस्य के बीच शायद हम स्त्रियों का आत्म ही कही छुप के बैठ जाता है,सुबह उठ घर की जिम्मेदारियों,सास ससुर नन्द व देवर के बहुत से काम,सभी की प्रत्यशाएँ और जिम्मेदारियों के निर्वहन में हम शायद भूल ही जाते हैं कि, एक सुकून वाली चाय पिये तो हमें बरसों हो गए..! नास्ते के बाद खाना, उसके बाद बर्तन, उसके बाद बच्चे स्कूल से आ गए, उनका खाना पीना पढ़ाई लिखाई सब हमारे ही तो माथे पर है...! और फिर शाम का समय,फिर चाय के समय सबका मनपसन्द नाश्ता देने के चक्कर मे हमारी चाय ही बेस्वाद हो उठती है। और फिर तो रात के वक़्त डिनर की तैयारियों में हम व्यस्त हो जाते हैं। 

अगर आप वर्किंग हैं तब थोड़ी ज्यादा आफत हो जाती है,जल्द से जल्द घरेलू काम निपटा कर हमें ऑफिस के लिए निकलना होता है ऐसे में चाय बनाकर रख कर औरों को देकर हम अन्य कार्य में व्यस्त हो जाते हैं और हमारी चाय रखे-रखे ठंडी हो जाती है. अंत में घर से निकलते वक्त चाय का कप दिखता है पर उसे गर्म करने का न तो समय होता है न ही इच्छा ..और हम उसे उठाकर एक सांस में खाली कर निकल जाते हैं। 

तो हुए न जीवन में सुकून तसल्ली और फुर्सत जैसे शब्द कीमती.? सच में हम स्त्रियों के जीवन में वाकई सुकून नही..! सोते वक्त भी हम अगले दिन क्या सब्जी बनेगी ये प्लान करके ही सोते हैं..! सही कहा न? 

पर दोस्तों ये उचित नही हमें खुद के लिए थोड़ा सा वक़्त निकालना ही चाहिए ..और अपनी खुशी के लिए वो सब करें जो हमें हमारी रूटीन जीवन शैली से भिन्न अनुभव प्रदान करे। और हम उन सब यादों को पुनर्जीवित करें जो हम मायके में किया करते थे. 

ताकि हमें अपना घर ही स्वाभाविक लगे, ये नही कि खुद को दोबारा जीने की लालसा में हम मायके का ही रुख अपनाये, और हाँ खुद को खुशी देने वाले काम भी करें जैसे गाने सुनना, आर्ट पेंटिंग बनाना, डायरी लिखना, या फिर कढ़ाई और सिलाई जिस काम में भी हमें खुशी मिले, अपने घर के एक कोने में जैसे आप खुद को सँजो कर रखती हैं वैसे ही, अनेकों जिम्मेदारियों के साथ, दिल के एक कोने में अपनी सेल्फ हैप्पीनेस को भी जिंदा रखें. शीशे में खुद को निहारें,खुद को सँवारें,आत्मविश्वास से भरी हुई दिखें ... यदि मेरी बात करें तो दोस्तों मैं भी वर्किंग हूँ एक बेटे की माँ और संयुक्त परिवार की बहू हूँ किन्तु, खुद के लिए वक़्त निकालती हूँ.

लेखन, संगीत, गायन,नृत्य, पेंटिंग ये सब मुझे करना अच्छा लगता है, इन सबके लिए मैं वक़्त निकालती हूँ,हालांकि ज्यादा तो नही पर कभी न कभी मौका मिल ही जाता है जब घर पर कोई नही होता, सब कहीं गए होते हैं..तो मैं सब कुछ जी लेती हूं !  

और हां मुझे चाय पीना तो बेहद पसंद है मैं संडे को तो जरूर पतिदेव के साथ चाय पीती हूँ सुबह की । और फिर जब सारे काम समाप्त हो जाते हैं तो अपने फेवरेट राइटर की अच्छी सी किताब लेकर, हाथ मे गर्म भाप छोड़ता चाय का कप लेकर आराम से अपना क़्वालिटी टाइम बिताती हूं...! और सच बताऊं जब से मैंने ये रवैय्या अपनाया है मैं बेहद खुश और तरोताज़ा महसूस करती हूँ..! मुझे विश्वास है मेरे इन शब्दों ने आपके मन मस्तिष्क में एक नवीन जीवेषणा भर दी होगी तो सखियों आप भी इन सुकून वाले पलों को बटोरने का लिए तैयार हो जाइए.! और हां अपनी उन भूली बिसरी यादों और शौकों की लिस्ट के बारे में मुझे बताना न भूलियेगा ! 

कविता जयंत श्रीवास्तव



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