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@dawriter

वो मैला सा आदमी

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वो मैला सा आदमी

पी जी से ऑफिस और ऑफिस से पीजी की रोज की भागदौड़ , बस यही जिंदगी रह गयी मेरी इस दिल्ली शहर में। यहां इंसान सुबह से रात तक मशीन की तरह काम करता है।।

इसी भागम भाग में अच्छा - बुरा कुछ सोचने का समय नहीं मिलता फिर लिखना तो बहुत दूर की बात है।।
कितनी ही बातें होती है जिनपर हम ध्यान भी नहीं देते पर यही बाते आपको बहुत कुछ सीखा जाती हैं।।।

ऐसा ही एक वाकिया मेरे साथ हुआ आज ।।।

रोजमर्रा की ही तरह ऑफिस में मेरी डेस्क के पास ही "डिस्कशन" ( गॉसिप) का माहौल बना हुआ था सुबह सुबह।

दरअसल मेरी डेस्क मेन डोर के सबसे नजदीक है जहां से बॉस दूर से ही नज़र आते हैं और सबको अपनी अपनी सीट पर जाने का पूरा समय मिल जाता है।।

मैं हर रोज इसी मेन डोर से बॉस, कलीग्स, क्लाइंट को आते जाते देखती हूँ।

कोई बड़ी सी मुस्कान लिए अंदर आता है तो कोई घर में हुई बहस की झुंझलाहट लिए कोई रोजमर्रा की बोरियत लिए तो कोई अपने ओहदे का ग़ुरूर लिए कहना गलत नहीं होगा की तरह तरह के लोगो को देखती हूँ।।

गॉसिप चल ही रही थी तभी नज़र दरवाजे के उस पार खडे आदमी पर पड़ी जो अंदर की तरफ ही झांके जा रहा था ..थोड़ी देर बाद सकुचाते हुए उसने दरवाजा खोला और अंदर की तरफ बढ़ा उसके अंदर आते ही सब उसे घूरने में लग गए जबकि वो असहज से भाव लिए ऑफिस की दीवारे और सजावट को बड़े ध्यान से देख रहा था..डरते हुए उसकी नज़रे हम तक भी पहुंची ऐसा लग रहा था जैसे पहली बार किसी 'बड़ी' जगह आया हो।।।

उसका रंग बहुत सांवला था, कपड़े पसीने में तर थे.. लुंगी कुर्ता पहने हाथ में गमछा लिए था। उसकी चप्पलें जिंदगी की ठोकरे खा कर घिस चुकी थी और उसने टूटती - बिखरती जिंदगी की तरह टूटी चप्पल को भी कई जगह से सिल रखा था... कुर्ते पर जगह जगह रफ्फू उसकी तंग हालत को छुपाने की भरपूर कोशिश कर रहे थे।।

उसकी उम्र लगभग 35 या 40 रही होगी पर जिंदगी का तजुर्बा उसकी सिकुड़ी आँखों से साफ़ झलक रहा था।।

वो कोई मैला, मजबूर सा आदमी था।।

खैर ये सिर्फ मेरा आंकलन था मेरे साथ खड़े मिथुन, श्रेया और दिनकर उसे उपहास की नजर से देख रहे थे... उसे देखते ही दिनकर ने जो की एक सज्जन की तरह दिखता है उसने जहरीली जुबान चलाई - लो आ गए shameless भिखारी... इनका धंधा अब ऑफिस में भी शुरू हो गया..सिक्यूरिटी ने भी नहीं रोका इसे.. चलो बाबा कहीं और मांगो।।।

और एक साथ तीनो हंस दिए।।।

सुना नहीं तूने जा किसी मेट्रो पर यहां कुछ नहीं दे रहा कोई मिथुन के लहजे में इतनी कड़वाहट थी जितनी शायद उस मैले आदमी की जिंदगी में भी नहीं थी।।

वो आदमी ये सब सुनकर झेंप गया पर कंपकंपाते हाथों से फ़टे कुर्ते की जेब में हाथ डालकर कुछ निकालने लगा।।

लो अब कोई बीमारी की पर्ची दिखायेगा श्रेया ने पूरी तरह से परेशान होकर बोला।।।

नहीं साहब।।। इतने शब्द में भी बहुत दर्द था उसके।।

उसने आगे कहा - मैं और मेरा बेटा यही पास में जूता पोलिश का काम करते हैं..आज जब बेटा दुकान पर था तब एक साहब आये थे जूते पोलिश कराने और पैसे देकर जाते वक्त उनका बटुआ वहीं गिर गया।। जब बेटे ने देखा तो आस पास बहुत ढूँढा उन साहब को पर मिले नहीं।।
बेटे को स्कूल जाना था तो मुझे बटुआ थमा कर चला गया जाते जाते उस बटुए में से एक कारड " visiting कार्ड" में से साहब का नाम और पता बता गया था जो पता यहां का था।।।

मैंने सोचा शाम को दुकान बन्द करके लौटा दूंगा पर फिर लगा साहब परेशान हो रहे होंगे बटुआ खोने से।।

तो दुकान समेट के यहां चला आया।।

आप मिथुन साहब को बुला दें तो बड़ी कृपा होगी।।
वो आदमी अपनी बात कहकर चुप हो गया था पर मेरी डेस्क के आस पास सन्नाटा चीख चीख के आज की सज्जन पीढ़ी पर जोर जोर से हंस रहा था।।

शर्म से सर झुकाये मिथुन ने अपनी पॉकेट चेक की तो उसके होश उड़ गए.. उसे पता ही नहीं था की उसका पर्स खो चुका था।।।

मिथुन ने आगे बढ़कर अपना पर्स उस आदमी से लिया।।

शर्म के बारे मिथुन के मुह से सज्जनता का प्रमाण देने वाला अंग्रेजी शब्द थैंक यू भी ना निकला।।।

पर वो अनपढ़ आदमी अपनी ईमानदारी का प्रमाण देना भली भांति जानता था तभी उसने हाथ जोड़कर कहा .. साहब आप चाहे तो बटुए का सामान और पैसे जांच लें।। वह भी जानता था की उसे चोर ना समझ लें ये सभ्य समाज के लोग।।

मिथुन अपराधबोध के साथ बोला इसकी जरूरत नहीं है।।

वो आदमी इतना सुनकर आँखों में चमक लिए वहां से चला गया।। मैं उसे जाते देख रही थी।। उसका आत्मसम्मान और ईमानदारी मुझे किसी पढ़े लिखे इंसान से ज्यादा प्रभावित कर रही थी।। हमारी दिखावटी पीढ़ी में कुछ लोग उस आदमी के मैले कपड़ों से भी ज्यादा मैले मन लेकर घुमते हैं ।।

खैर मिथुन, दिनकर, श्रेया अपनी अपनी सीट पर वापिस चले गए।।।

पर आज वो मैला सा आदमी मुझे बहुत साफ़ सुथरा लग रहा था और हम सब महंगे कपड़ो के पीछे छुपे मैली सोच की तरह।।।

निधि खरे।।



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