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@dawriter

लघुकथा-- नजरिया

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sunilakash by  
sunilakash

दंगे के बाद नगर में अब स्थिति बिलकुल सामान्य हो चुकी थी। चहल-पहल दुबारा हो गई थी। ऐसे ही एक दिन, हम दोनों मित्र पैदल सड़क पर चलते हुए चौराहे की ओर बढ़ रहे थे। दंगे ही हमारी बातचीत का केंद्रीय विषय थे। मित्र कुछ अधिक मुखर हो रहे थे।
निकट ही ऑटो रिक्शा स्टेंड आ गया था। एक ऑटो रिक्शा ले लेने का विचार बना। ऑटो-रिक्शा स्टैंड की ओर बढ़ते हुए मेरी बात काटकर वे बोले, "मैं बताऊंगा आपको कि इस झगड़े को कैसे दूर किया जा सकता है? साम्प्रदायिक दंगे तो हो ही नही सकते, यदि हम चाहें... आओ, ऑटो रिक्शा लें।"


मैं उनकी बात मानकर उनके पीछे हो लिया। सामने से एक दाढ़ी वाले मुसलमान युवक का ऑटो मुझे पास ही आता दिखा तो मैं अपने मित्र से बोला, "इसी के ऑटो में बैठते हैं ?"
"हुंह!" उन्होंने मेरा हाथ झटककर धीरे से कहा, "समझते क्यों नहीं हो ? किसी हिन्दू का ऑटो लेंगे।"

मैं कुछ न बोला। इधर दो सवारियों को एक साथ देखकर कई एक ऑटो वाले चिल्लाने लगे, "आओ बाबूजी, आओ भैयाजी।" उनमें आपस में होड़ लग गई थी। एक सिक्ख युवक तेजी से अपनी ऑटो रिक्शा लेकर एकदम हमारी दायीं ओर आ गया, "किदर जाना ए बाऊजी?"

मेरे मित्र उसकी इस हरकत पर आँखें निकाल कर डपटते हुए बोले, "क्यों सिर पर चढ़ा जा रहा है, पीछे हट।" और वे दूसरी ओर जाकर एक हिन्दू ऑटो वाले से बात करने लगे। जब तक मैं लपककर उनके पास पहुंचता, उन्होंने ऑटो वाले को चलने को तैयार भी कर लिया और भाड़ा भी तय कर लिया था। मित्र ने मुझे तुरन्त ऑटो में बैठने का इशारा किया।
हम दोनों के बैठतेही ऑटोवाले ने ऑटो-रिक्शा चलानी शुरू कर दी और मेरे मित्र द्वारा बताए हमारे गन्तव्य की ओर तेज़ी से चल पड़ा।

मुख्य मार्ग पर ऑटो आ गया तो मित्र महोदय ने आराम से सीट पर पहलू बदलते हुए कहा, "...हाँ तो मैं कह रहा था? क्या कह रहा था? हाँ, याद आया। तो मैं कह रहा था कि साम्प्रदायिकता के इस कैंसर को देश से कैसे दूर किया जाये? इसके लिए सबसे पहले हमें अपने सोचने का दृष्टिकोण बदलना होगा। इस तरह कि....।" और वे मुझे एक परम्परागत भाषण देने में जुट गए। और मुझे तुरन्त याद आ गया कि अभी कुछ देर पहले उन्होनेे कैसे एक सिक्ख व मुस्लिम ऑटो वाले को डांटकर भगा दिया था।

 : लेखक सुनील आकाश



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