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@dawriter

माफ करना

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

माफ़ कर देना मुझे
ये दर्द ना लिख पाऊँगा
थोड़ी वाह वाही के लिए
इस बार ना बिक पाऊँगा

कैसे लिखूँगा एक बेबस
से पिता के दर्द को
कैसे बयान करूँगा
उसके अधूरे फर्ज़ को
कैसे बताऊँगा की कैसे
वो रस्सियों में जकड़ा रहा
एक आँखों के सामने लूटता
रहा आबरू बीवी बेटी की
कैसे दो ने उसे पकड़ा रहा
इस दर्द के आगे और ना टिक पाऊँगा
थोड़ी वाह वाही के लिए
इस बार ना बिक पाऊँगा

कैसे लिखूँगा उस पत्नी के
के वादों को
सात जन्मों तक सिर्फ
पति का हो कर रह जाने के इरादे को
कैसे लिखते हुए अनसुना
कर दूँ उसकी ह्रदयभेदी गुहारों को
कैसे कहूँ है ईश सब जगह
जो सुन ना पाया उन पुकारों को
कैसे कल्पना करूँ उस अबला की
लुटती टीख पुकारों की
कैसे लिखूँ हरकतें उन
इज्ज़त के हत्यारों की
टूट चुका हूँ पूरी तरह
अब और ना झुक पाऊ
माफ़ करना मैं वाह वाही के लिए
अब और ना बिक पाऊँगा

एक बेटी जो होती है
बाप के सर की पगड़ी
रही वो पगड़ी हैवानो के
हाथों में जकड़ी
फूल सी देह जो एक चोट ना झेल पाती
कैसे वो उन हैवानों का
सामना कर जाती
पिता के सामने वो बेबस
लाचार पड़ी रही
चलती रहीं आँधियाँ और
वो मासूम चुप चाप खड़ी रही
उसकी वेदना के बारे में
तो सोच तक ना पाऊँगा
इन आँसुओं को मैं अब और
ना रोक पाऊँगा ।

किसे दोषी कहूँ किसको
गुनहगार मानूँ
इस अंधे गूँगों की जमघट को
कैसे मैं देश और राज्य की सरकार मानूँ
क्या ये जो भीख भेजी है
ये दो इज्ज़तों के लिए काफी है ?
क्या सरकार के मन में
फिर से उन दरिंदों के लिए माफी है ?
क्या फिर सिलाई मशीने और
रूपयों का पुरस्कार मिलेगा
इस घिनौने अपराध के लिए
फिर से उन्हे उपहार मिलेगा ?
फोड़ लूँ आँखें की ये अन्याय ना देख पाऊँगा
इन सब की तरह जल रही इज्ज़तों
की आग पर रोटियाँ ना सेक पाऊँगा

अपील बहनो से की भाईयों
का अब आसरा छोड़ें
रस्मों रिवाज़ की जंग लगीं
जंज़ीरें तोड़ें
बने चंडी की अब सीता का वक्त बीत रहा है
धरती।में समाने से बात ना बनेगी
के अब अधर्म खुले आम जीत रहा है ।
अब और ना सहारे पर रहो
ना गुहार करो
तुम खुद हो जगदम्बा उठो और वार करो
मैं अब इस बारे में और ना कह पाऊँगा
सच कहूँ तो मारूँगा या मरूँगा
क्योंकी।ये सब और पा सह पाऊँगा ।



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