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@dawriter

माँ

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

माँ को शुरू से ही  कभी ज़्यादा मेकअॅप वेकअॅप करते नही देखा । उन्हे कभी से रुचि ही नही रही या फिर शायद हम सब की छोटी छोटी ज़रूरतें पूरी करने और घर के काम काज के बीच ऐसा उलझी की उन्हे कभी खुद को संवारने का मौका ही नही मिला । फिर भी जब कभी खास दिन वो सुंदर सी साड़ी , हल्का लिपिस्टिक एक बिंदी और माँग में सिंदूर लगाती तो बस उन्हे देख इतना ही कहता मैं ” वाह माँ ! आज तो पूरी जच रही हो । ” और फिर माँ की तरफ से हमेशा ही जवाब में उनकी मनमोहक और शरमाई हुई मुस्कान देखने का सुख मिलता । मैं ये नही कहता वो बहुत सुंदर हैं मगर मेरे लिए उन से सुंदर कोई नही । पहले पहले पटना से गया था पंजाब तो माँ के लिए एक साड़ी ले गया था उन पर वो सुगापंखी रंग की साड़ी खूब खिली थी । उन्हे उस साड़ी में देखना सच में सुख को पा लेने जैसा होता था । मैने सोचा अब जब जाऊँगा तो माँ के लिए ऐसी ही।साड़ियाँ लूँगा क्योंकी खुद तो वो अपने लिए लेंगी नही।, हमेशा ये कह कर टाल देंगी की बहुत साड़ियाँ हैं और साड़ियाँ क्या करूँगी । 
मगर अब वो मेरी लाई साड़ी कभी नही पहनतीं । ना ही अब अब माथे पर बिंदी होती है ना माँग में सिंदूर ना होंठों पर कोई रंग ना चेहरे पर कोई चमक । मुस्कुराती अब भी हैं मगर जो यहाँ इधर दिल के पास बड़े प्यार से लग जाया करती थी ना वो बात अब नही रही । दस महीने दो दिन चौदह घंटे और दस मिनट पहले हमने दो अनमोल चीज़ें खो दीं एक पिता और दूसरा माँ की वो शरमाई हुई मुस्कुराहट , वो चेहरे की चमक । दोनों का दुख टीस बन कर चुभता है यहाँ सीने के बीचों बीच । 
हमारे यहाँ सति प्रथा तो आज भी कायम है । जिस दिन पति का अंतिम संस्कार होता है तो चुपके से उन्ही आग की लपटों में पति के साथ सजी धजी चेहरे पर चमक लिए एक पत्नी भी जल जाती है । उस संस्कार के बाद ज़बरदस्ती मुस्कुराती एक माँ ही ज़िंदा बचती है जिसे अब अपने बच्चों के लिए सिर्फ नाम का ज़िंदा रहना पड़ता है । ये वो दुख है जो हर वक्त आँखों के सामने आ कर दिल में चुभ जाता है मगर अफ़सोस कुछ किया भी नही जा सकता सिवाए इसके की माँ को खुश रखा जाए किसी ना किसी बहाने से । मगर मुझसे तो वो भी नही हो पाता सही से । खैर नियती का सबसे भयानक और कड़वा सच है सब को सामना करना पड़ता है । उन सभी।माँओं को प्रणाम करता हूँ जो वक्त से पहले ही इस हाल से गुज़र रही हैं और प्रार्थना करता हूँ भगवान उन सबको कोई ऐसी वजह दें जिस से उनकी बेरंग मुस्कान में कुछ रंग भर जाऐं ।
माँ मैं आ रहा हूँ
धीरज झा



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