86
Share




@dawriter

पीली चुनरी

2 194       


पीली चुनरी :

पिछले वर्ष सावन की छुट्टियों में रक्षा बंधन मनाने अपने गाँव गया था l मुझे मेरा गाँव बहुत प्यारा लगता है l वहाँ के हरे लहलहाते खेत, पंछियों की प्यारी मधुर आवाजें , और खासकर वो पिली सरसों के खेत, शाम को सभी का चौपाल पर एकत्रित होना और किसी विषय पर चर्चा करना, जिन्हें मैं जानता तक नि था वो भी अपनापन दिखाते थे l ये सब कुछ मुझे बहुत ही अच्छा लगता है l ये सब शहर में कहाँ मिलता है l

 

तो मैं चार पांच घंटे का सफ़र करके गाँव पहुंचा तो काफी थक गया था l तो जल्दी से हाँथ मुँह धो कर अपने कमरे में जाकर लेट गया l दादी कमरे आईं और मेरे पास बैठ गयीं और प्यार से सर पर हाथ फेरते हुए हालचाल पूछने लगीं l दादी से बात करते करते कब मुझे नींद आ गयी मुझे पता ही नहीं चला l करीब एक डेढ़ घंटे की अच्छी नींद लेने के बाद मेरी आँख खुली तो मेरी नज़र दरवाजे के बाहर लहराती हुई पीली चुनरी पर गयी l

 

दादा जी गाँव के सरपंच जमीदार थे तो उनके पास गाँव के लोग अपनी फरियाद ले के आते रहते थे l तो मैंने सोचा कि कोई फरियादी ही होगा, दादा जी से किसी केश के सिलसिले में मिलने आये होंगे l मैं उठ कर बाहर गया तो देखता हूँ की पिली लहंगा चुनरी में एक लड़की खड़ी थी l प्यारा मासूम सा गोल चेहरा, दूध स गोरा रंग ,बड़ी बड़ी स्वच्छ निर्मल आँखें, गालों पर खेलती हुई कुछ लटें, बिल्कुल अप्सरा सा सौन्दर्य, मैं उसे एकटक देखता ही रह गया l जी कर रहा था कि बस देखता ही रहूँ l

 

तभी पीछे से मेरी छोटी बहना ने हाथ पकड़ के हिलाया “भैया कहाँ खो गए , कब से आवाज लगा रही हूँ.... ये मेरी दोस्त है.....पूजा , और ये हैं मेरे भैया..... प्रकाश भैया.....

 

पूजा मेरी तरफ देख कर मुस्काई और फिर छोटी के कान में चुपके से कुछ बोला, दोनों ही सहेलियां मेरी तरफ देख कर हंसी, और फिर वहां से चली गयी....

 

मैंने आवाज लगायी अरे क्या हुआ l मुझे भी तो बताते जाओ कि किस बात पर हँस रहे हो l मेरी बात सुन कर और जोर से हंसने लगे l और बिना कोई जवाब दिए वहां से चले गए l

मैं मन ही मन पूजा के बारे में सोच कर मुस्करा रहा था l कि प्यारी लगती है , और उसपे वो पिली चुनरी कितनी जचती है l बिलकुल अप्सरा लगती है..... अप्सरा l

 

शाम को मैं छोटी के साथ अपने खेतों की ओर घूमने निकला l तो अनायास ही उस से पूजा के बारे में पूछ बैठा कि “ये पूजा तुम्हारी दोस्त कब बनी, पहले तो कभी उसे नहीं देखा तुम्हारे साथ, अच्छा वो रहती कहाँ है, बहुत प्यारी है तुम्हारी दोस्त, पिला रंग बहुत अच्छा लगता है उस पर l

 

छोटी ने मुझे पकड़ कर रोका और घूरते हुए बोली : भैया सच सच बताइए क्या बात है ? आप पूजा के बारे में इतना कुछ क्यूँ पूछ रहे हैं ?

 

मैंने चौंकते हुए कहा कि ; अरे नहीं छोटी ऐसा कुछ नहीं ..... वो तो बस मैं यूँ ही....


छोटी बोली : आपको मेरी दोस्त पूजा पसंद है क्या ? चलिए हम उसी के घर चल रहे हैं l आज उसका जन्मदिन है, और उसने आपको भी बुलाया है... 

 

उसके घर पहुंचे तो पता चला कि हमरे वकील साहब की बेटी थी l वकील साहब ने मुझे देखा और बोले : अरे प्रकाश.....! कब आये ? आओ बैठो l और पढ़ाई कैसी चल रही है तुम्हारी....

 

हमारे बीच यूँ ही कुछ बाते होने लगी l और छोटी पूजा के कमरे में चली गयी l मैं वकील साहब से बातें कर रहा था कि तभी मेरी नजर पूजा के कमरे की ओर गयी l पूजा पर्दे से झांक कर मुझे देख रही थी l जैसे ही मेरी नज़र उस पर पड़ी वो मुस्काई और फिर परदा बंद कर दिया l

 

थोड़ी देर बाद ही छोटी ने मुझे बुलाया : भैया यहाँ आइये ..... !


मैं उठ कर छोटी के पास पूजा के कमरे में चला गया l मेरे पहुँचते ही छोटी ने बठने के लिए इशारा किया l


पूजा : तो पीला रंग हम पर जचता है ? सही कह रहे हैं न हम ?


मैंने छोटी की ओर देखते हुए सोचा कि हे भगवन इस ने सब कुछ बता दिया l


मैं कुछ नहीं बोला बस उसकी ओर देख कर मुस्करा दिया l वो भी मुस्काई, थोड़ी देर तक हम बिना कुछ बोले यूँ ही बैठे रहे l फिर थोड़ी देर में उसके दोस्त रिश्तेदार आना शुरू हो गए l केक काटने का वक्त आया तो मैंने देखा की उसने पीले रंग का बहुत ही प्यारी ड्रेस पहनी हुई थी l बिलकुल अप्सरा लग रही थी l

 

खैर फंक्शन ख़त्म होने के बाद जब हम घर जाने लगे तो पूजा ने उन्मुक्त हो कर कहा कि अपने मन में कोई बात दबा कर मत रखियेगा, अगर आप सही समझे तो मुझे निःसंकोच अपने मन की बात बता दीजियेगा l

 

मैंने भी कह दिया की ठीक है मैं लिख कर तुम्हे भिजवा दूंगा l


घर पहुँचे तो , मन से उसका ध्यान जा ही नहीं रहा था l फिर मैं अपने कमरे में गया और लिखने बैठ गया ......

उर्वशी हो या मेनका हो तुम ।
लोग कहते हैं लाइबा हो तुम ॥
आरज़ूओँ का मरहला हो तुम ।
जिंदगानी का फ़ल्सफ़ा हो तुम ॥
मैं तो प्यासा जनम-जनम का हूँ ।
साक़ी हो तुम कि मैकदा हो तुम ॥
सोचता हूँ जिसे तसव्वुर में ।
मेरे ख़ाबों की दिलरुबा हो तुम ॥
मंज़िलों का मक़ाम है तुम तक ।
मंज़िल -ए -इश्क़ बाख़ुदा हो तुम ॥
है तुम्हारा ही अक्स तो सब में ।
हुस्न का एक क़ायदा हो तुम ॥
अब भी उसका वुजूद क़ाइम है ।
आज 'प्रकाश' का हौसला हो तुम

 

बस इतना ही लिखा और सुबह छोटी के हांथो पूजा को ख़त पहुंचा दिया गया l मैं उसके जवाब का इंतज़ार करता रहा मगर उसका जवाब नहीं आया l डर था की कहीं कोई और न पढ़ ले खैर पढ़ भी ले कौन सा मैंने कुछ साफ़ साफ़ लिख दिया था l कह दूंगा कि मैंने कविता लिखी थी कागज ही खो गया l

 

मैंने कई दिनों तक इंतज़ार किया लेकिन उसका जवाब नहीं आया l फिर मेरी छुट्टियाँ ख़त्म हुईं तो मैं शहर चला आया l कई साल गुजर गए l इस सावन फिर से गाँव जा रहा हूँ , बहन को तोहफा देने के लिए एक प्यारी सी ड्रेस लेने मार्किट गया तो वहां पर एक खुबसूरत सी पीली चुनरी देख कर अनायास ही वो पीली चुनरी याद आ गयी l

 

इक पीली चमकीली चिड़िया काली आँख नशीली-सी ।
बैठी है दरिया के किनारे मेरी तरह अकेली-सी ।
किसको ख़बर मैं किस रस्ते की धूल बनूँ या फूल बनूँ,
क्या जाने क्या रंग दिखाए उसकी आँख पहेली-सी ।
कम रौशन इक ख़्वाब आईना इक पीला मुरझाया फूल,
तब मेरे मन में लहराती एक चुनरिया पीली-सी ।

 



Vote Add to library

COMMENT