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@dawriter

पल ..

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बारह दिवसीय पत्रकारिता कार्यसाला का समापन समारोह समाप्त हो चुका था। सभी प्रतिभागी बातचीत में लगे हुए थे। सभी एक - दूसरे से अपना मोबाइल नंबर की अदला बदली कर रहे थे। हँसी मजाक का माहौल था।

अनिमेष ने उसी बातचीत के दौरान सभी से हाथ मिलाया। और अंत में हँसते हुए अर्जुन से कहा -
“अर्जुन जी, आपको सबसे अधिक मिस करूँगा। हम दोनों अगल बगल बैठ कर इस क्लास को कॉमेडी क्लास बना दिया था। इन बारह दिनों में तीन बार तो हम दोनों को क्लास से बाहर भी निकाला गया। आपके चेहरे पर यह मुस्कान हमेशा रहे। यह सारे पल काफी याद आएंगे”।

पल से याद आया, कि हम भी आपकी तरह दो कहानी लिखे हैं। “सुख वाला पल” और “दुख वाला पल” - अर्जुन ने कहा।

अर्जुन के बोलने के ढंग पर एकबार फिर सभी लोग हँस पड़े।

आप केवल बोलते हैं कि लिखें है। कभी पढ़ने को दिया ही नहीं। माँगने पर आप केवल हँस देते हैं - अनिमेष ने कहा।
।।।
शाम का वक़्त,
अनिमेष के मोबाइल पर व्हाट्सएप्प पर एक संदेश आया।
उसने मोबाइल पर देखा संदेश अर्जुन ने भेजा था ...

“वो दुःखी वाला पल ये है कि मेरे माता पिता नहीं हैं! मैं हँस कर गम को भुलाता हूँ। अौर किसी से ये बात सामने कहने का हिम्मत मेरे पास नहीं होता है। क्योंकि उस समय मैं रोने पर विवश हो जाता हूँ। थोड़े समय में यही है मेरा ‘दुःख वाला पल’ जो छपरा जाते समय बस में लिख रहा हूँ।



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