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@dawriter

डायन

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ujbak by  
ujbak

 

 

'चाची, बचि जाब हम? बस बचाय ल्यो चाची यह बेर, नाय बड़ी बेइज्जती होई।'

 

इमली के पेड़ की छोटी-छोटी पत्तियां हवा में बही जा रही थीं। सर्र-सर्र की आवाज़ करती पत्तियों ने जैसे ठान लिया हो कि मदनी के इस रहस्य को वे और डरावना बना देंगी।

 

गांव के इस ओर गोंड लोग रहते हैं। देसी शराब पीना, झगड़ा करना और खाना खाकर सो जाना। हां, यह सब ऐसे ही नहीं हो जाता, वे सपरिवार मजूरी भी करते हैं जिससे यह क्रम निर्बाध जारी रहे। न कुछ साथ ले जाना है न बहुत बड़ा आदमी बनने की कोई लालसा, इसलिए संचय की प्रवृत्ति भी ज्यादा नहीं है।

 

लोग कहते हैं कि निचली जातियों में औरतों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है। उनकी हाड़ भी उनके मरद की हाड़ से जुड़ती है तब जाकर दो जून की रोटी इन गांवों में उन्हें मिल पाती है, यह बराबरी वहां जरूर है। वैसे कमोबेश गांव में यही हाल सब जातियों का है, लेकिन फर्क है। अधिकतर 'ऊंची' जातियों में जो पर्दा होता है, वह 'इन लोगों' में कम दिखता है।

 

इमरतिया बड़की डाइन थी। लड़ लेती थी जवानी के दिनों में अगर किसी ने ऊंच-नीच बात की जरा सी भी तो। वो गेहुआं रंग और ऊपर से तीखे नैन-नक्श। कुल मिलाकर ऐसा आकर्षण जो रस ढूंढती आंखों को खुद पर ठहरा लेने का माद्दा रखता हो। ऐसी औरतें किसी भी समाज में आराम से खप नहीं पातीं तो इमरतिया कैसे खप पाती?

 

वैसे बात और भी थी। बच्चा न जन पाना लगभग हर तबके में बुरा माना जाता है, लेकिन कामगार तबके में यह दंश बड़ी बात है। यहां बच्चे का मूल्य केवल वंश-वृद्धि तक सीमित नहीं है, उसका कुछ और महत्त्व है। वह महत्त्व है 'कमाने लायक हाथों' की कमी हो जाना। इमरतिया ने एक बार बच्चा जना था लेकिन बच्चा मर गया। मरद शराब के नशे में अपना पुंसत्व भी घोल कर पी चुका था लेकिन एक अदद बच्चे के लिए इमरतिया किसी और से संसर्ग कर ले, ऐसी वह नहीं थी। लाजिम था वह लोगों को चुभती। वह चुभी और खूब जोर से चुभी। किसी ने कभी कुछ मजा लेना चाहा तो इमरतिया बुरा-बुरा कहती। लोग उससे डरते थे।

 

यह उसका विद्रोह था, और विद्रोह भी कैसा? समाज उसे दिखाता था कि उसके पास कोई कमी है, समाज वह कमी पूरी करने को प्रस्तुत भी रहता था पर इमरतिया इस पूरे उपक्रम को झटक कर दूर कर देती थी। समाज सोचता था कि वह समर्पण क्यों नहीं करती, इमरतिया जो था, जितना था उसी में संतुष्ट रहती। यह 'संतुष्टि' विद्रोह नहीं तो क्या है?

समय बदला था।

 

मदनी पढ़ना चाहती थी। न जाने क्यों हुआ ऐसा लेकिन जब हुआ तब घर में भीषण उत्पात भी हुआ। इमरती ने मदनी का पक्ष लिया तो बात और बिगड़ गई। अंत में इमरती ने अपने रौद्र रूप से सबको चित्त कर दिया। सबकी कमज़ोर नस वह यूँ भी जानती थी। कौन अपनी नसों को दबवा कर दर्द झेलता, इसलिए लोग सिर्फ अपने गुस्से में इजाफा कर मन मसोस कर रह गए। वह अब लोगों की नजरों में और बड़ी डायन बन गई क्योंकि अब वह जात की लड़कियों को बरगलाने में भी कामयाब होने लगी थी।

 

इमरतिया भी जानती थी कि वह अपने समाज से धीरे-धीरे काटी जा रही है। लोग अपने बच्चे उसके पास नहीं फटकने देते थे, औरतें उसकी हमजोली बनने से कतराती थीं और कारे-परोजने वह आमंत्रित नहीं होती थी।

 

उसका अपना अवलंब अगर कुछ बच गया था तो वह था मदनी का उसके जीवन में होना। वह उसके भले के लिए जितना सोचती लोग उतना ही सोचते कि वह मदनी को फांस रही है। उसने इन बातों पर कभी ध्यान न दिया। सब उड़ाते तो वह पैसे जोड़ती, स्वप्न देखती कि शायद मदनी एक दिन उसे इस दंश से मुक्ति दिला पाने में सफल रहेगी। एक दिन शायद इमरतिया को मदनी अपने विवाह में सबके सामने बुला सकेगी। पता नहीं यह स्वार्थ था या सहज मानवीय आकांक्षा, लेकिन जो भी था, इमरतिया के लिए भविष्य की एक सुमधुर कल्पना जैसा तो था ही।
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'सुक्खू दरवाजा खोल।'

दरवाजे पर दस्तक हुई थी।

 

सुक्खू ने अंदाजा लगाया, यह दस्तक नहीं थी। यह भड़भड़ाहट थी। अनिष्ट की आशंका बड़ी बलवती होती है। अर्द्धरात्रि को यूं दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से पीटा जाना निस्संदेह किसी अशुभ कारण से है। सुक्खू सोच में पड़ कर कुछ न बोला, शायद सोता जान कर भीड़ हट ही जाय।

 

लेकिन आज भीड़ लौटने के लिए नहीं आई थी। आज वह प्रतिशोध के लिए आई थी। इमरतिया द्वारा इतने वर्षों तक नज़रन्दाज किए जाने के अपराध का प्रतिशोध। भड़भड़ाहट बढ़ती गई।

सुक्खू ने आवाज़ पहचानी। पहली आवाज़ बड़हरवा की थी। उसका अपना छोटा भाई।

'देखते क्या हो, तोड़ दो पल्ला।' यह परमोदवा था। कहते हैं जवानी में इमरतिया ने इसे सबके सामने बेइज्जत कर दिया था।

 

दरवाज़ा कितनी देर प्रतिरोध कर पाता? धम्म की आवाज़ के साथ वह आखिरी प्रतिरोध भी गिर गया।

 

इमरतिया ने सुक्खू को देखा। सुक्खू की आंखों में जैसे सवाल हों, 'बोल क्या करूँ?' ये सवाल विवश थे, वे जानते थे उनके पास उत्तर नहीं हैं।

 

'जाती हूँ। अब न बचूंगी।' इमरतिया की आंखों में उत्तर था। इस उत्तर में एक हार थी। इस उत्तर में आत्म-बलिदान था। इस उत्तर में एक निराशा थी। निराशा कुछ न बदल पाने की।

सुक्खू भीड़ को इमरतिया को पीटते-घसीटते देखता रहा। वह जानता था प्रतिरोध बेकार है।
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इमली का वह पेड़ अभी भी सर्र-सर्र लहरा रहा था। नदी किनारे इस पेड़ के इर्द-गिर्द आज भीड़ इकट्ठा थी।

नदी मौन थी।

 

पेड़ के तने से बंधी डायन को जला दिया गया था। जलते हुए भी उसने कोशिश की कि वह चीखे मत, ताकि उसकी शांति इनलोगों के सामने प्रश्न खड़े कर सके।

 

लेकिन वह डायन नहीं थी एक साधारण महिला भर थी, कैसे न चीखती?
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मदनी घर में पड़ी हुई थी। 'डायन' की हौलनाक चीख से उसका करेजा बैठा जा रहा था। एक अजीब सा अपराधबोध उसके मन में जगह बना रहा था।

चाची ने कुछ रोज पहले उसको उल्टी करते देख मजाक में सबके सामने कह दिया था कि 'गाभिन हौ का मदनिया?'

चाची सच थीं, और यह सच उनके डायन होने का अंतिम प्रमाण था।

उसी इमली के पेड़ के नीचे इमरती चाची ने वह गोली भी उसे दी थी, ठीक आज ही।

मदनी ने वह गोली खा ली।

चाची का यही अंतिम आदेश था।

कुछ देर मदनी को वे डरावनी चीखें सुनाई पड़ती रहीं।

फिर सब शांत हो गया।
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कुछ दिनों बाद मदनी का गर्भ भी झड़ गया।

झड़ता कैसे नहीं, डायन के साथ उसके जादू-टोने का असर भी तो ख़तम हो जाता है न?

खैर.....

मदनी ने पढ़ाई छोड़ दी है।

अब वह नदी किनारे नहीं जाती, उसमें इमली के उस पेड़ से आंख मिलाने की हिम्मत नहीं है।
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समाप्त।



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